
संजय कुमार सिंह
आज मेरे आठ के आठ अखबारों की लीड एक ही है – सेना को खुली छूट। नवोदय टाइम्स ने शीर्षक में विजयी भवः भी लिखा है लेकिन यह समझ नहीं आया कि सेना को यह छूट पहले नहीं थी क्या और क्यों नहीं थी। क्या सीमा पार कर आने वाले आतंकी को पहले रोकने की मनाही थी या अब ही छूट दी गई है। प्रेस कांफ्रेंस के बाद खबर छपने से इस तरह के सवालों का जवाब मिल जाता है पर एक तरफा मन की बात में बहुत सारी चीजें रह जाती हैं। आज भी यही हुआ है और जो सूचना है वह कई सवालों को जन्म देती है पर इनका जवाब नहीं है। कहां मिलेगा कोई नहीं जानता। सरकार ने जो किया वही सबसे अच्छा है और उसका प्रचार करने के लिए अमर उजाला का शीर्षक है, आतंकवाद को करारा जवाब हमारा दृढ़ संकल्प कब-कहां, कैसे करनी है कार्रवाई… सेना को खुली छूट। जाहिर है सरकार के पास ना कोई योजना है ना रणनीति। सरकार (भाजपा नेतृत्व) अपनी जिम्मेदारी सेना को सौंपने के लिए ‘खुली छूट’ का प्रचार कर रहा है। देशहित में सेना को खुली छूट हमेशा से है, रहनी चाहिये पर तीन आतंकियों को पकड़ने और मारने के लिये सेना को खुल छूट देने का कोई मतलब नहीं है। यह चूहे पकड़ने के लिये तोप लगाने जैसा है। आतंकवाद की समस्या सेना से नियंत्रित होने वाली नहीं है और वह पूरी तरह राजनतिक मामला है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार हो या अब नरेन्द्र मोदी की – खुली छूट का उपयोग करते रहे हैं और फिर भी मामला नियंत्रित नहीं हुआ तो इस तरह की छूट से मौके पर सेना को जिम्मेदार ठहराने के अलावा क्या फायदा होने वाला है, समझना मुश्किल है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा भी है, सुरक्षा बलों ने 22 अप्रैल के हमलावरों को पकड़ने के लिए वनों की कांबिंग की। दूसरी बात यह भी है कि नियंत्रण रेखा पर तनाव बना हुआ है क्योंकि पांचवें दिन भी फायरिंग जारी है। जाहिर है कि सरकार का कहना है कि 22 अप्रैल के हमलावर पाकिस्तान से आये थे और अभी भारत की सीमा में हैं और उन्हें पकड़ा जाना है। सेना को छूट क्या इस काम के लिए है या पाकिस्तान पर हमले का निर्णय़ भी सेना को ही करना है – यह खबरों से स्पष्ट नहीं हो रहा है। आतंकियों या अवैध घुसपैठियों को सीमा पर रोकने-देखने की जो व्यवस्था है उसे भेद कर और अब खुली छूट का मतलब है कि इसे भेदने की कोशिश करने वालों को किसी भी तरह रोका जायेगा। पर मामूली सी समझ है कि यह पहले भी होना चाहिये था। मुझे लगता है कि होगी ही और तब सवाल है कि आज नया क्या है और पहले नहीं था तो क्यों? कौन बतायेगा? मैंने यहां पहले भी लिखा है कि पाकिस्तान युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा है – यह बड़ी खबर है। आज हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि पांचवें दिन जारी है पर खबर कहीं दिखी? खबर तो यही है कि पाकिस्तान की फायरिंग जारी और भारत की सेना को खुली छूट। क्या इसकी जरूरत है? क्या इससे कम में या किसी और तरीके से पाकिस्तान को रोका नहीं जा सकता था? पाकिस्तान का पक्ष वहां की मीडिया से मालूम हो सकता है पर वह यहां प्रतिबंधित है और यहां वाले जो खबर देते हैं वह मैं रोज बताता ही हूं।
दिलचस्प यह है कि तीन आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिये सेना को खुली छूट देने के बावजूद सुरक्षा कारणों से कश्मीर में 48 पर्यटन स्थल बंद कर दिये गये हैं। यह खबर आज अमर उजाला में लीड के साथ छपी है। दूसरे अखबारों में भी है लेकिन वैसे नहीं जैसी खबर है। कुल मिलाकर मामला तीन आतंकियों को पकड़ने या मारने के लिए भारतीय सेना को खुली छूट देने और इसके बावजूद पर्यटकों को वह आजादी नहीं देने की है जो आम तौर पर यूं ही उपलब्ध होनी चाहिये। मीडिया दिखा रहा है कि डर के इस माहौल में भी लोग घूमने पहुंच रहे हैं। कहीं भी किसी पर्यटक को उपलब्ध होती है। फिर भी सरकार की सख्ती और बड़ी कार्रवाई की खबरों से अखबार भरे पड़े हैं। क्या पढ़ा जाये और क्या देखा जाये। आझ तो कुछ पढ़ने लायक नहीं है। द टेलीग्राफ के पहले पेज पर लीड इन दो खबरों की है। सिंगल कॉलम की दो खबरों में एक पेगागस पर सुप्रीम कोर्ट और दूसरा कोलकाता की एक किशोरी से शहर के गेस्टहाउस में बलात्कार की खबर है। आईपीएल और कनाडा चुनाव की दो खबरें हैं। बाकी में विज्ञापन। इंडियन एक्सप्रेस में विज्ञापन तो नहीं है लेकिन 48 की जगह 49 पर्यटक स्थलों को बंद करने की खबर है और यह खबर टेलीग्राफ की खबर से भी छोटी छपी है।


