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बिहार

एनबीटी के आलोक मेहता हों या दिनमान के घनश्याम पंकज, सुबोध सागर की तस्वीरों के बड़े-बड़े संपादक कायल थे!

कुमार कृष्णन-

सुबोध सागर एक नाम प्रेस फोटोग्राफी की दुनिया का। छह दशक तक अखबारों और पत्र-पत्रिका के लिए पूरे जुनून और समर्पण के साथ तस्वीरें लीं, खबरों का कवरेज किया। सुबोध सागर की खींची तस्वीरों के कायल बिहार के बड़े-बड़े संपादक होते थे। कारण यह था कि वे फोटोग्राफर नहीं, फोटो जर्नलिस्ट थे। उनमें मजबूत तकनीकी कौशल तो था ही, साथ ही दृश्य कहानी कहने की क्षमता भी थी। सबसे बड़ा गुण समय-सीमा के प्रति दृढ़ता था।

तभी तो चाहे नवभारत टाइम्स के संपादक आलोक मेहता हों या दिनमान के संपादक धनश्याम पंकज, आज के संपादक सत्य प्रकाश असीम—सभी के प्रिय रहे। ‘नई बात’ के संपादक राजेन्द्र सिंह के अत्यंत निकट थे। उनके कैमरे की तस्वीरें सच्चाई को व्यक्त करने के साथ-साथ पत्रकारिता के उच्चतम मानकों पर भी खरी उतरती थीं। कैमरा उनके लिए सिर्फ उपकरण नहीं, उनका साथी होता था। कंपोजिशन, एंगल, फोकस, एक्सपोजर में उन्हें महारत हासिल थी। इस कारण वे लोकप्रियता के शिखर पर रहे।

1949 में मुंगेर में जन्मे छायाकार सुबोध सागर अपने समय के मुंगेर प्रमंडल के एकलौते प्रेस छायाकार हुआ करते थे। फोटो पत्रकारिता से उनका जुड़ाव पटना से प्रकाशित ‘समर क्षेत्र’ से हुआ। फोटोग्राफी में सिद्धहस्तता के साथ-साथ महत्वपूर्ण छायाचित्रों के संकलन में उनकी काफी दिलचस्पी रही। इसका कारण यह था कि जब पटना से नवभारत टाइम्स का प्रकाशन हुआ, तो वे उसके लिए फोटोग्राफी करने लगे। उस समय, आज के डिजिटल युग के मुकाबले, फोटोग्राफी काफी जटिल हुआ करती थी। लेकिन श्वेत-श्याम चित्रों में ही उनके कैमरे का जादू बोलता था।

दिवंगत फोटो जर्नलिस्ट सुबोध सागर जी

तस्वीरों की जीवंतता को उन्होंने कायम रखा। धीरे-धीरे ‘आज’, ‘नई बात’, ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ से जुड़े तथा बाद में ‘हिन्दुस्तान’ अखबार से भी लगातार जुड़े रहे। पहले फिल्म वाले कैमरे का इस्तेमाल करते थे, लेकिन जैसे ही तकनीक में बदलाव आया, उन्होंने अपने को डिजिटल तकनीक से जोड़ लिया। फोटोग्राफी के लिए हर तरह की जोखिम उठाने को वे तैयार रहते थे।

समाजसेवी राकेश कुमार कहते हैं कि वे एक समर्पित प्रेस फोटो जर्नलिस्ट थे, उनका व्यक्तित्व शालीनता से लबरेज था। दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि 1985 के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ होगा, जब मैं मुंगेर गया होऊं और हम दोनों न मिले हों। अब ऐसा नहीं होगा। वे निःस्वार्थ दोस्त का ऐसा कोई अन्य उदाहरण मैं नहीं दे सकता। सचमुच अद्भुत थे सुबोध जी। मुझसे करीब दस साल बड़े थे। उनसे मेरा परिचय भी फोटो पत्रकारिता के जरिये ही हुआ था।

मेरा घर मुंगेर के वासुदेवपुर मुहल्ले में जबकि ससुराल गार्डेन बाजार मुहल्ले में। दोनों के बीच की दूरी दो-ढाई किलोमीटर की है। मुंगेर में मेरा घर जरूर था, पर वहां कभी रहा नहीं, तो परिवार से बाहर किसी से परिचय नहीं था। अब सुबोध सागर। वह और भरत सागर ऐसे थे जो कम उम्र में मुंगेर छोड़कर बाहर निकल गए होते, तो पत्रकारिता में शीर्ष पर हो सकते थे। वैसे, दोनों के नाम में सागर होने से सब दिन सबको भ्रम होता रहा कि दोनों रिश्तेदार हैं, पर पत्रकारिता के अलावा दोनों में कोई रिश्ता नहीं था। भरत जी के शब्द बोलते थे, सुबोध जी के फोटो।

शंकर जी और ये दोनों ऐसे थे कि खबरों-फोटो के लिए कोई भी जोखिम कभी भी उठाने को तैयार रहते थे। मुंगेर में 11 नवंबर, 1985 को तौफिर दियारा (लक्ष्मीपुर) में बिंद जाति के एक टोले पर हमला कर उनके घरों को जला दिया गया था। तब मैं पटना में ‘आज’ में था। फील्ड रिपोर्टिंग के लिए नहीं गया था, पर घायलों को पटना में पीएमसीएच में दाखिल कराया गया था, तो उनसे और उनके परिजनों से बातचीत के आधार पर इस हत्याकांड की रिपोर्टिंग मैंने ‘आज’ में की थी।

इस हत्याकांड में मुंगेर कोर्ट ने सजा सुनाई, तो मैं नवभारत टाइम्स, पटना में था। रिपोर्टिंग के लिए मुंगेर और फिर दियारा गया। सुबोध जी और शंकर जी भी साथ थे। भरत जी को मुंगेर में रहकर कुछ अतिरिक्त काम करने को कहा। उसके एक-दो दिनों बाद नवभारत टाइम्स, पटना में एक दिन चार पेजों पर मेरी बाइलाइन सामग्री थी। तीन तो इस प्रसंग में, एक लेख संपादकीय पेज के लिए दिया था, तो वह भी उसी दिन छपने के लिए दिल्ली से एप्रूव होकर आया था।

इस हत्याकांड में रणवीर यादव को भी सजा हुई थी। वह विधायक थे। खगड़िया जेल में बंद थे। होली का समय था। मैं मुंगेर आया हुआ था। अचानक खयाल आया कि क्यों न खगड़िया जेल जाकर रणवीर यादव से मिला जाए। सुबोध जी से पूछा कि क्या वह चलेंगे। रिस्क वगैरह की बात हुई। पर हम दोनों निकल पड़े। उस वक्त मुंगेर से खगड़िया के लिए स्टीमर चलती थी। सुबह-सुबह निकले और 9:00-9:30 बजे खगड़िया जेल पहुंच गए। गेट पर हम दोनों ने बिंदास कहा कि हमलोग नवभारत टाइम्स से आए हैं और रणवीर यादव से मिलना है।

हमलोग उससे पहले रणवीर यादव से कभी नहीं मिले थे। पर उन विधायक जी की हनक ऐसी थी कि उन्हें सूचना पहुंचाई गई और हम दोनों गेट के अंदर। हमने पूछा कि कहां मिलेंगे, तो संतरी ने इशारा किया कि जेलर के ऑफिस में जाइए। ऑफिस के बाहर अच्छे और साफ-सुथरे कपड़े पहने एक सज्जन टूल पर बैठे थे। हमने अपना काम बताया, तो उन्होंने उठकर कहा, अंदर जाइए। बाहर निकलते समय उस सज्जन ने बताया कि वही जेलर हैं। हम अंदर गए, तो जेलर की कुर्सी पर झक सफेद कुरता-पायजामा पहने रणवीर यादव मौजूद थे।

मैंने नोटबुक पर उनकी बातें नोट करनी शुरू कीं, सुबोध जी फोटो क्लिक करते रहे—रणवीर के पीछे गांधी जी की फोटो लगी थी। यह फोटो और रिपोर्ट नवभारत टाइम्स में पेज 1 एंकर छपी। शायद लगभग सभी संस्करणों में। आलोक मेहता जी अब भी बराबर इसकी याद करते हैं। बल्कि चार-पांच साल पहले उन्होंने इस बारे में लिखा भी था।

सुबोध जी, भरत जी और शंकर जी—तीनों ही निडर थे, बल्कि मुझसे कहीं ज्यादा। वली रहमानी साहब मुंगेर के ही थे। वह कांग्रेस से विधायक रह चुके थे और बाद में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव भी बने। वह 1991 में मुंगेर में खानकाह रहमानी के सज्जादा नशीन बने। लगभग उसी के आसपास या उससे पहले मुंगेर के ही हवेली खड़गपुर में रात में उनकी कार पर हमला हुआ। मैं संयोगवश उस वक्त मुंगेर गया हुआ था और अपनी ससुराल में था। टीवी और सोशल मीडिया का जमाना तो था नहीं, पर सुबह तक यह खबर मुंगेर में फैल चुकी थी या कहिए, धीरे-धीरे फैल रही थी।

भरत जी और सुबोध जी सुबह-सुबह मेरे पास। मैंने कहा, महाराज, आपलोग इसी शहर में रहते हैं, यहीं रहिए, मैं मिलकर आता हूं। भरत जी ने कहा, हमलोग क्यों नहीं, साथ चलेंगे, फटाफट तैयार होइए। आधे घंटे के अंदर हमलोग खानकाह पहुंच गए। 600-700 लोग तो होंगे ही। अधिकांश विद्यार्थी और युवा। आज की भाषा में कहें, तो इन सबके बीच हम तीन ही हिन्दू थे। अंदर खबर की गई, तो वली रहमानी साहब ने तुरंत बुलाया। हंसते-मुस्कुराते हुए ही बात हुई। पूरी घटना उन्होंने बताई लेकिन कोई उत्तेजना नहीं। बाद में, वली रहमानी साहब से मुंगेर, पटना, दिल्ली में भी कई बार मुलाकातें हुईं। कम ही लोग उनकी तरह ज़हीन होते हैं। वह भी अब नहीं हैं। वे कहते हैं—”मैं आज जिस मुकाम पर हूं, पहुंच सका। मुझे दोस्तों ने ही सब दिन कंधे पर उठाए रखा। ये लोग न होते, तो मैं कुछ नहीं होता।”

सुबोध सागर व्यावसायिक कम और सामाजिक थे। सूचना एवं जनसंपर्क के हजारीबाग प्रक्षेत्र के उपनिदेशक आनंद कहते हैं कि—सुबोध जी बेहतरीन फोटोग्राफर के साथ-साथ अच्छे इंसान भी थे। वे पत्रकारों के संगठन श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव भी थे।

अपनी फोटोग्राफी के लिए पूर्वांचल के प्रसिद्ध छायाकार हरिकुंज द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया है। इसके अतिरिक्त, भागलपुर में शुभकरण चुड़ीवाला की स्मृति में आयोजित ‘तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान’ से प्रसिद्ध गांधीवादी प्रो. राम जी सिंह द्वारा और ‘आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान’ से परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।

पिछले कुछ दिनों से वे अस्वस्थ थे। 26 अप्रैल को इस दुनिया से रूखसत हुए। उनका निधन पत्रकारिता जगत के लिए पीड़ादायक है।

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