
आतंकवाद पर अपनी ही चलायेगी सरकार और सेना को खुली छूट का अंजाम समझना अभी मुश्किल
संजय कुमार सिंह
आज भी मेरे सभी अखबारों की लीड एक ही खबर है। शीर्षक में मामूली अंतर जरूर है पर मुद्दा यही है कि, भारत को आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए अमेरिका का समर्थन मिला। यह द हिन्दू का शीर्षक है और उपशीर्षक में बताया गया है कि अमेरिका भारत के साथ एकजुटता में खड़ा है और अपने बचाव के उसके अधिकार का समर्थन करता है। राजनाथ सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि वह आतंकवादियों का समर्थन करता है और उनके संगठन को प्रशिक्षण देता है। इस भारत परस्त और सरकार अनुकूल शीर्षक के साथ टैरिफ मामले में अमेरिका का रुख, भारत और प्रधानमंत्री की स्थिति याद कीजिये। यही नहीं, 25 अप्रैल के अंक में द हिन्दू ने प्रधानमंत्री की धमकी (या घोषणा) को नीचे रखा था जबकि पाकिस्तान की कार्रवाई को ऊपर रखा था, लीड बनाया था। पूरा हिन्दू समाज (अखबार का नहीं, भले अखबार समेत) इससे परेशान हो गया था। ईमानदारी से कहूं तो भाजपा और संघ परिवार का इको सिस्टम इससे बुरी तरह परेशान नजर आया था। इसपर मैंने उस दिन लिखा भी था। याद दिलाने के लिए बताऊ कि एस गुरुमूर्ति ने एक्स पर लिखा था, “यह इस्लामाबाद के डॉन के एडिशन का शीर्षक नहीं लग रहा है”। मालिनी पार्थसारथी ने उसे रीट्वीट करते हुए लिखा था, संपादकीय टीम की इस असंवेदनशील और गैर देशभक्तिपूर्ण ले आउट से निराश हूं। मालिनी के अनुसार इस मुश्किल समय में देशहित दांव पर है और उसकी रक्षा सर्वोपरि है तब मीडिया के लिए रचनात्मक भूमिका निभाना जरूरी है। मैंने लिखा था कि यह भूमिका, वही (होगी) जो बिना रीढ़ के केंचुआ जैसा हो। मैंने तभी लिखा था कि यह यह हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए दबाव बनाने की चाल है। जो भी हो, इन तथ्यों के आलोक में आज द हिन्दू का यह शीर्षक और आठों अखबार में इस खबर का लीड होना मायने रखता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों को सरकार की मनमानियों का समर्थन करने के लिए मजबूर करने वाली सरकार इमरजेंसी का विरोध करती है, मनमानी करने में लगातार कामयाब हो रही है और वह जनहित में नहीं, भाजपा के चुनाव जीतने की कोशिश में होता है। आज की लीड अमेरिकी टैरिफ के मामले में हुए अपमान की भरपाई की कोशिश लगती है। अमेरिका के इस ‘समर्थन’ की खबर के साथ आज एक खबर है, “एक-एक इंच भूमि से आतंकवाद मिटा देंगे, चुन-चुन कर दहशतगर्दों को मारेंगे : शाह”। यह अमर उजाला की लीड का शीर्षक है मुझे लगता है कि ऐसी बातें भाषण देने के लिए तो ठीक हो सकती हैं खबर से कई सवाल खड़े हो सकते हैं। वैसे भी, किसी पर भी आरोप लगाकर या लगने पर उसे चुन (ढूंढ़) कर मारने का अधिकार सरकार को नहीं है। यह अलग बात है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ऐसा कर रही है और आज बताया जा रहा है कि अमेरिका ने भारत के (असल में सरकार के) अपने बचाव के अधिकार का समर्थन किया है। और सरकार इसका उपयोग सत्ता में बने रहने के लिए कर रही है। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को भी बुरी तरह से मारा जा रहा है। आजतक ने छत्तीसगढ़ पुलिस के हवाले से खबर दी थी कि इस साल अब तक 105 नक्सली मारे जा चुके हैं। इनमें से 89 बस्तर डिवीजन में मारे गए हैं। यह मार्च तक की बात है। तब अमित शाह ने कहा था, 31 मार्च 2026 तक भारत होगा नक्सल मुक्त। इससे पहले अमित शाह कश्मीर को आतंक मुक्त बता चुके थे और संभव है कि जिस ढंग से उन्होंने आतंकवाद को कुचलने की घोषणा की थी उसके जवाब में ही आतंकियों ने पहलगाम की वारदात की हो।
आप जानते हैं कि 2019 के पुलवामा के बाद 2025 में पहलगाम हुआ और इस बीच अमित शाह अपने दावे करके चुनावी लाभ ले चुके थे। आतंकियों ने उन्हें गलत साबित करने के लिए अगर पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों की हत्या की उसे समझे जाने बगैर धार्मिक रंग देने का कोई मतलब नहीं था। मैं यहां लिख चुका हूं कि उस दिन हिन्दी अखबार हिन्दू हो गये थे। उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की खबर नहीं है जबकि पाकिस्तानी चैनलों के साथ सरकार विरोधी चैनलों को भारत में बंद कर दिया जाना भी आम है। यहां तक कि कार्टून के लिये भी प्रतिबंध लगया जा चुका है। जाहिर है, इससे सूचनाएं नियंत्रित हो जायेंगी और सरकार कुछ भी दावा करके चुनाव जीतती रह सकती है। (संभवतः यही हो रहा है।) वारदातें भले गलत हों, उनका समर्थन नहीं किया जा सकता है लेकिन सरकार को गलत साबित करने के लिए रोज तो नहीं होंगी। इसलिए जरूरत है कि सरकार की कार्यशैली (दरअसल) राजनीति पर नियंत्रण लगे। जाति जनगणना के लिए तैयार होना ऐसी एक स्थिति हो सकती है लेकिन भाजपा और उसका प्रचार तंत्र हर बात को अपने पक्ष में मोड़ लेता है। आज भी दि एशियन एज में एक खबर का शीर्षक है, जातिवार जनगणना का श्रेय लेने के लिए भाजपा, कांग्रेस में टकराव। आप जानते हैं कि हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा इसके खिलाफ रही है जबकि संविधान के तहत राजनीति करते हे राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इसकी मांग करके सरकार को पूरी तरह परेशान कर दिया था। इतना कि नितिन गडकड़ी का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे यह कहते हुए दिखाये गये थे कि जो जाति की बात करेगा उसे वे लात मारेंगे।
तब गडकड़ी के इस बयान को भाजपा की आंतरिक राजनीति का हिस्सा होने की अटकल भी लगाई गई थी और जब जातिवार जनगणना की घोषणा हुई उससे पहले संघ प्रमुख ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। संभव है, इसका संबंध भाजपा की आंतरिक राजनीति ने हो पर वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। ऐसे में अगर सरकार जाति जनगणना के लिए तैयार हो गई है (अभी व्यवस्था बाकी है और वास्तविक काम में समय लगेगा) तो श्रेय कांग्रेस को ही जाता है। यह भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति की हवा भी निकाल सकता है। ऐसे में भाजपा का काम था (है) कि सरकार में रहते हुए जो जरूरी है वह सब काम कराये। इसमें श्रेय लेने की कोशिश भी क्यों? वह भी तब जब सरकार अपना काम काफी देर से करा रही है और बिहार सरकार ने इस काम को पूरा कर लिया था पर सरकारी पार्टी के भाजपा का समर्थन करने के बाद सब कुछ बदल गया है। भाजपा श्रेय लेने में लगी है यह खबर तो है पर आज भी यह नहीं बताया गया है कि जनगणना कब शुरू होगी और कब तक खत्म हो जाने की बात है और जातिवार गिनती कब तक आ जाने की उम्मीद है या यह जानकारी कब आयेगी। कुल मिलाकर, कल की खबर का फॉलोअप कुछ होना था, है कुछ और। आज इसी क्रम में दिलचस्पी वाली एक और खबर है। चुनाव आयोग ने कहा है, मृत्यु के आंकड़े मतदाता सूची को साफ कर देंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला जीवित लोगों के नाम हटा देने और फर्जी नाम शामिल करने का है। वैसे भी सामान्य मृत्यु का शिकार होने वाले 70 पार के लोगों का नाम मतदाताा सूची में रह ही जाये तो उनके नाम पर वोट देने वाले फर्जी वोटर कहां मिलेंगे और अगर चुनाव अधिकारियों की मिलीभगत से उनके भी वोट डलवाने का मामला है तो पहले व्यवस्था सुधारने और अनिल मसीह जैसे चुनाव अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चत करने की जरूरत है। लेकिन इस खबर से यह प्रचार हो रहा है कि चुनाव आयोग काम कर रहा है। हो सकता है कर भी रहा हो पर वह नहीं कर रहा है जो उसे करना चाहिये। चुनाव आयोग का यह कदम मददगार हो सकता है लेकिन बीमारी का पूर्ण इलाज नहीं है। फिर भी दि एशियन एज में आज यह खबर चार कॉलम में है।
आज द हिन्दू की लीड, यानी जिस खबर और शीर्षक की चर्चा सबसे पहले की गई है उस खबर का शीर्षक टाइम्स ऑफ इंडिया में इस तरह है – अमेरिका ने भारत, पाक को साथ मिलकर काम करने, तनाव कम करने का संकेत दिया। दोनों शीर्षक का अंतर बहुत ज्यादा न भी हो तो कम नहीं है। टीओआई ने इस खबर का इंट्रो बनाया है, आतंकियों के समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिये। आप समझ सकते हैं कि सरकार क्या चाहती है और समझने वाली बात यह भी है कि पुलवामा के बाद सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार ने आंतकवाद खत्म करने के लिए या पुलवामा के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार ने क्या किया? अब जो करना चाह रही है तब क्यों नहीं किया और अब जो करना चाहती है उससे कामयाबी मिलने की कितनी गारंटी है? दूसरी ओर जो कार्रवाई हुई है उससे आतंक या आतंकियों का कितना नुकसान हुआ तथा नागरिकों को कितनी परेशानी हुई। इस सरकार ने नोटबंदी से लेकर कोविड तक में आम आदमी की चिन्ता नहीं की पर वह आतरिक मामला था इस बार तो अवैध रूप से आने वालों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर वैध रूप से आने वालों के खिलाफ कार्रवाई की गई है जिससे उन्हें परेशानी हो रही है और यह अवैध रूप से आने वालों को रोकने में किसी भी तरह से मदद शायद ही कर पाये। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा सोच-विचार कर काम नहीं करने से होता है और हम देख रहे हैं फिर भी सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के परिवार पर कोई असर नहीं है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, भारत ने अमेरिका से कहा, हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई चाहता है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बहुत सामान्य शीर्षक है और भारत को यह बात अमेरिका से कहने की जरूरत भी क्यों पड़े जब उसने कार्रवाई शुरू कर दी है, घोषणाएं हो चुकी हैं और सेना को तय करना है कि खुली छूट में कैसी कार्रवाई की जरूरत है। फिर भी यह शीर्षक बताता है कि सबके बावजूद पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के लिए भारत (या सरकार) को अमेरिका के सहयोग या अनुमति की जरूरत है। इसीलिए ऐसा कहा गया होगा और इसी को ऊपर की खबरों में अखबारों ने सरकार के प्रचार के रूप में पेश किया है। अंग्रेजी अखबारों में टेलीग्राफ का शीर्षक पूरे मामले को संक्षेप में स्पष्ट करता है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, अमेरिकी एकजुटता, तनाव कम करने का इशारा। इस शीर्षक के नीचे एक कॉलम के दो शीर्षक हैं, सेना ने युद्धविराम उल्लंघन का जवाब दिया (या मुकाबला किया) भारतीय मीडिया में इसे महत्व नहीं दिया जा रहा है और पाकिस्तानी पर प्रतिबंध होने से आप हम जान ही नहीं सकते है कि पाकिस्तान क्या कर रहा है या उसने हमारा कितना नुकसान कर दिया। दूसरी ओर, (पहगाम में) मारे गये अधिकारी की पत्नी ने कहा है कि वह नहीं चाहती कि घृणा फैले या मुसलमानों को निशाना बनाया जाये। इन तीनों के बीच भारत सरकार जो चाहती है या कर रही है उसकी कोई गंजाइश नहीं है तो विदेश मंत्री जो कहा है उसे टेलीग्राफ में अपनी पूरी खबर के बीच में लेफ्टिनेंट विनय नरवल की पत्नी की फोटो के नीचे दो कॉलम में छापा है। शीर्षक है,वार्ता के बाद जयशंकर ने न्याय का प्रण लिया। नवोदय टाइम्स ने सबके लिये एक शीर्षक दिया है, भारत ने रणनीतिक और कूटनीतिक शिकंजा कसा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भी भारत सरकार का प्रचार ही है।
इन सब खबरों के बीच आज अमर उजाला की एक खबर का शीर्षक है, सुरक्षाबलों का मनोबल न गिरायें… ऐसी अर्जी न लगायें। फ्लैग शीर्षक के अनुसार, पहलगाम हमले की न्यायिक जांच की मांग करने वालों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा – जज कब से जांच विशेषज्ञ बन गये। मैं नहीं जानता अर्जी किसने लगाई थी क्या मकसद था लेकिन यह तथ्य है कि सेना (बीएसएफ) के एक जवान ने खाना खराब होने की शिकायत की तो उसकी नौकरी चली गई। उसने प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहा तो उसका नामांकन खारिज कर दिया गया। कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। किसी ने यह तो नहीं ही कहा कि अब खाना बढ़िया मिलता है और ना सरकार या सुरक्षा बल ने अधिकृत रूप से ऐसा कोई बयान जारी किया है। मैं नहीं जानता की अपील क्या थी पर पुलवामा के बाद पहलगाम हमले में भी कई ऐसे तथ्य हैं जिससे लगता है कि हमला प्रायोजित हो सकता है और कुछ छिपाया जा रहा है। दोनों में एक पैटर्न तो है ही चुनाव से पहले होने का संयोग भी है। सरकार जो कर रही है वह किसी रीति-नीति के तहत खास परिणाम देने में सक्षम होगा इसकी गारंटी नहीं है और सरकार ने सेना को खुली छूट देकर निर्णय करने और रणनीति तय करने का अधिकार भी दे दिया है। ऐसे में सरकार जो कर रही है वह सही है कि नहीं या देशहित में है कि नहीं, कैसे तय होगा और नहीं होगा तो क्या ऐसे ही चलता रहेगा और इसमें चुनाव के समय लेवल प्लेइंग फील्ड न होने की शिकायत शामिल है, तब भी? ऐसा है तो खबर बड़ी है ही – अमर उजाला में पढ़िये।
इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक मोटा-मोटी जो है वह यह कि अमेरिका से बातचीत में राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान का नाम लिया, (और) कहा बचाव के भारत के अधिकार के लिए समर्थन मिला। इसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का मकसद स्पष्ट है और यह आपदा में अवसर वाला है। पाकिस्तान से (अच्छे) संबंध बनाने की भाजपा की कोशिश और फिर समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट, उसके आरोपी, उनका बच जाना, अदालत की टिप्पणी और ऊपर की कोर्ट में अपील नहीं किया जाना बहुत कुछ कहता है। इस संदर्भ में विनोद चंद ने फेसबुक पर अंग्रेजी में लिखा है (अनुवाद गूगल का, संपादित), सबूत न मिलना क्लीन चिट नहीं है। मामूली चोर भी सबूत नहीं छोड़ता है इसलिए बड़े मामलों में सबूत नहीं होना 2002 के गुजरात नरसंहार के लिए भी सही है। तब सुप्रीम कोर्ट ने जांच का निर्देश दिया था और एसआईटी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि गोधरा और उसके बाद पूरे गुजरात में हुई घटनाओं में नरेंद्र मोदी की भूमिका साबित नहीं हो सकी। सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने सुझाव दिया कि नरेंद्र मोदी की भूमिका की आगे जांच की जानी चाहिए, लेकिन एसआईटी ने उस सलाह का पालन नहीं किया। इस तरह नरेंद्र मोदी आगे की किसी भी जांच से बच गए और बाद में उन्होंने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से क्लीन-चिट मिल गई है। …. कई सबूत हैं, जैसे कॉल डेटा रिकॉर्ड जो मिलीभगत को दर्शाते हैं, सेना को तैनात करने में देरी, एक चश्मदीद गवाह की गवाही जो उस समय एहसान जाफरी के साथ था जब भीड़ उनके दरवाजे पर थी और उन्होंने नरेंद्र मोदी को कॉल किया था। इसके अलावा, संजीव भट्ट का शपथ पत्र कि वे 28 फरवरी 2002 को एक बैठक में मौजूद थे, जहाँ मोदी ने कानून और व्यवस्था देखने वाले तंत्र को आदेश दिया था कि हिंदुओं को अगले 72 घंटों तक अपना गुस्सा निकालने दिया जाए।
अब जब किसी और मामले में सुप्रीम कोर्ट जांच की जरूरत नहीं समझ रहा है तब इन सभी सबूतों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया था और नरेन्द्र मोदी किसी भी तरह के दोष और आगे की जांच से बचने में कामयाब रहे। इसलिए, जब कोई मामला बंद हो जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि मामला था ही नहीं, इसका मतलब केवल यह है कि कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है जो दोष सिद्धि और सज़ा की ओर ले जाएगा। ऐसे परिदृश्यों में, कानून तंत्र अंत में हार देखने के लिए मामले को आगे बढ़ाने के बजाय मामले को बंद कर देगा। यही बात जज लोया की रहस्यमयी मौत के मामले में भी सच है, जहां झूठे सबूत तैयार किए गए थे, जिनसे पता चला कि जज लोया की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थी, ठीक उससे पहले जब वे सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में #1 आरोपी अमित शाह की सजा पर हस्ताक्षर करने वाले थे। बाद में जज लोया की जगह लेने वाले जज ने अमित शाह को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।


