
संजय कुमार सिंह
अखबारों में कल छप चुका है कि, भारत को आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए अमेरिका का समर्थन मिला। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि वह आतंकवादियों का समर्थन करता है और उनके संगठन को प्रशिक्षण देता है। इससे पहले छपता रहा है कि वहां आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जाता है। तमाम हस्तियों की स्वीकारोक्तियां छपी हैं और आज भी अमर उजाला ने छापा है, अब बिलावल ने खोली पोल, आतंकी गुटों से हमारा पुराना नाता। खबर के अनुसार, बिलावल से एक न्यूज चैनल ने पूछा कि क्या वह रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की टिप्पणी से सहमत हैं कि पाकिस्तान पिछले तीन दशकों से आतंकियों को समर्थन, प्रशिक्षण और पैसा मुहैया करा रहा है। इस पर पूर्व विदेश मंत्री बिलावल ने कहा कि यह कोई रहस्य नहीं है। आतंकी गुटों के साथ संबंधों का पाकिस्तान का एक अतीत है। उन्होंने कहा, हम अपने समाज के इस्लामीकरण व सैन्यीकरण से गुजरे हैं, पर हमने जो कुछ भी सहा, उससे हमने सबक भी सीखे। अपनी मां व पूर्व पीएम बेनजीर भुट्टो की आतंकी हमले में हुई हत्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, यह हमारे इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा है। दूसरी ओर, यह भी तथ्य है कि भारत एक गिरफ्तार आतंकी को न सिर्फ आजाद करने बल्कि जहां कहा गया वहां तक पहुंचाने के लिए मजबूर किया जा चुका है।
छप्पन ईंची सीना होने की जरूरत बताने और चीन को लाल आंखें दिखाने की अपेक्षा करने वाले नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उस समय के प्रधान नवाज शरीफ को शपथग्रहण में बुलाया, दोस्ती करने, पारिवारिक संबंध बनाने की कोशिश की और अब पाकिस्तान से युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि युद्ध से किसी का फायदा नहीं है और नुकसान उसका नहीं होता है जिसके कारण या जिसके लिये युद्ध होता है। जहां तक भारत पाकिस्तान का मामला है, हम उसे युद्ध में हरा चुके हैं, बांग्लादेश आजाद करा चुके हैं और संभव है वह इसका बदला लेना चाहता हो। मुझे नहीं लगता कि इसका जवाब युद्ध और निर्दोष नागरिकों को मौत के मुंह में ढकेलना है। संभव है, चुनावी राजनीति में लगी भाजपा और निस्वार्थ समाज सेवा करने वाले परिवार को यह सब समझ नहीं आता हो या इसमें उनका स्वार्थ हो। पर मीडिया कैसे ऐसी सरकार की इस रणनीति का समर्थन कर सकता है? आम नागरिकों में देश भक्ति का उत्साह भरा जा सकता है लेकिन संपादक भी ताली-थाली बजाने लगें तो देश की चिन्ता करनी चाहिये। खास तौर से तब जब मीडिया को भी पता है कि हम युद्ध के लिहाज से भी अच्छी स्थिति में नहीं हैं। सेना में खाली पदों से लेकर विमानों की कमी तक कई कारण हैं।
इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है और नवोदय टाइम्स में सेकेंड लीड का शीर्षक है, “भारत की ताकत सिर्फ हथियार नहीं, हमारी एकता भी : मोदी”। और भारत की इस ‘ताकत’ के बावजूद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वांस ने उम्मीद जताई है और इंडियन एक्सप्रेस ने लीड बनाया है, “उम्मीद करता हूं कि भारत की प्रतिक्रिया टकराव के विस्तार का कारण नहीं बनेगी”। कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि कल के अखबारों में जिस अमेरिका का समर्थन मिलने की बात कही गई थी वही अमेरिका आज कह रहा है कि भारत की प्रतिक्रिया के कारण टकराव न बढ़ जाये। दूसरी ओर, अमर उजाला की खबर जो लीड के रूप में छापी गई है का शीर्षक है, पहलगाम साजिश में आईएसआई और पाकिस्तानी सेना भी शामिल है। खबर के अनुसार एनआईए की जांच में यह खुलासा हुआ है और एजेंसी आतंकियों के 20 मददगारों से पूछताछ कर रही है। यहां आपको यह याद दिला दूं कि एनआईए इस सरकार की पसंदीदा एजेंसी है और 2008 के मालेगांव धमाके में प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित सहित छह आरोपियों को फांसी की सजा की मांग की है। हिन्दी सामना डॉट कॉम ने लिखा है, 17 साल बाद जागा एनआईए। पूर्व भाजपा सांसद के लिए मौत की सजा मांगी! इस मामले में आठ मई को फैसला आना है। खबर के अनुसार, जमीयत उलेमा महाराष्ट्र के लीगल सेल के वकील शाहिद नदीम का कहना है कि किसी आरोपी के खिलाफ धारा 302 के तहत चार्ज फ्रेम होता है तो उसे मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान है।
भाजपा और आरएसएस के बीच संबंध ठीक–ठाक थे, तब साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कर्नल पुरोहित सहित अन्य चार आरोपियों पर से मकोका हटा लिया गया था। इतना ही नहीं, आरोपियों पर से यूएपीए की कई धाराएं हटा दी गई थी। केवल धारा 18 और अन्य धाराओं के तहत केस चलाया जा रहा था। यही नहीं, साध्वी प्रज्ञा को भाजपा ने सांसद भी बनाया था जो सरकारी एजेंसियों को यह बताने के लिए पर्याप्त था कि सरकार उन्हें पसंद करती है। जो भी हो, हिन्सा, विस्फोट या आतंकवाद के एक मामले में सरकार का यह रुख रहा है और दूसरे में पाकिस्तान से युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है। खबर छप रही है कि पहलगाम हमले में पाकिस्तानी सेना भी शामिल है। मुझे लगता है कि ऐसा होता तो नाम पूछकर या धर्म देखकर मारने की क्या जरूरत थी और कुछ मुसलमान भी मर जाते तो आतंक फैलाने का उनका मकसद तो पूरा होता ही। मुसलमान मरे ही हैं और मुसलमान होने के लिए किसी को छोड़ा गया, ऐसी खबर भी नहीं है। इसलिए मामला वैसा स्पष्ट नहीं है जैसा बताया जा रहा है। कई अनुत्तरित सवाल हैं और पुलवामा के समय भी ऐसा ही था। उसके तो कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। अभी तक उस मामले में कुछ नहीं हुआ या उसके बाद हमने जो किया उसके बावजूद पहलगाम हो गया तो युद्ध के बाद फिर नहीं होगा – ऐसी कोई गारंटी नहीं हो सकती है। इसलिए बचाव का काम अपना है और उसपर कोई बात नहीं हो रही है। यह वैसे ही है जैसे तमाम मुद्दों पर नहीं होती है। अखबार मुंह सिले रहते हैं।
जहां तक पाकिस्तान से युद्ध और अमेरिका के समर्थन की बात है टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वांस ने कहा है कि पहलगाम की जांच में पाकिस्तान को भारत से सहयोग करना चाहिये। आज ही खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने जबरन वापस पाकिस्तान भेजे जाने पर रोक लगाई है और यह द हिन्दू में सेकेंड लीड है। खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने (अब) भारत में रह रहे पाकिस्तानी नागरिकों को वापस भेजने के लिए टाइम लाइन तय किया है। आप समझ सकते हैं कि भारत सरकार की कार्रवाई से दोनों देशों के आम नागरिक परेशान हैं और परिजनों से बिछुड़ने की मजबूरी में वैसे ही रो रहे हैं जैसे आतंकवादियों की गोली के शिकार लोगों के परिजन रो रहे थे। ऐसे में भारत सरकार ने जो किया वह सरकारी आतंकवाद से कम नहीं है और अब अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने भी इसका संकेत दे दिया है। भले यह सरकार का समर्थन करने के लिए मजबूर और दबाव झेल रहे संपादकीयकर्मियों को बड़ी खबर और लीड न लगे। टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस की लीड तो है ही। द टेलीग्राफ ने आज एक अनूठा प्रयोग किया है। पहले पन्ने पर सबसे नीचे आठ कॉलम में चार-चार कॉलम की दो खबरें छपी हैं। दोनों का एक साझा फ्लैग शीर्षक है। इसके अनुसार, तनाव कम करने के अपने संदेश में वांस ने पाकिस्तानी आतंकवाद को हल्के में ही लिया।
आप जानते हैं कि पहलगाम हमले के समय वे भारत में थे और यह सब शीर्षक में है। चार कॉलम की पहली खबर का शीर्षक है, वांस ने इस्लामाबाद पर हल्के-हल्के बात की। दूसरी खबर का शीर्षक है, पाकिस्तानी जो कुछ चाहते हैं उनमें युद्ध अंतिम है। इस तरह स्पष्ट है कि कल जो माहौल बनाया गया था आज उसकी हवा निकल गई है लेकिन एक-दो अखबार देखने वालों तक शायद यह संदेश नहीं पहुंचे। इसीलिये, हरिशंकर व्यास ने दो टूक लिखा है, न जंग होगी न पीओके लेंगे! क्योंकि युद्ध होना होता तो उसकी कथित तैयारियों के बीच क्या सरकार जातिगत जनगणना कराने का फैसला करती? क्या प्रधानमंत्री मोदी तैयारियों की कमान अपने पास ऱखने की मैसेजिंग के बजाय सूत्रों से यह छपवाते कि प्रधानमंत्री ने सशस्त्र बलों को “पूरी अभियानगत छूट” दी है? सेना ही जवाबी कार्रवाई का तरीका, लक्ष्य और समय तय करेगी। भला युद्ध (या कि परंपरागत लड़ाई जैसे 1965 की भारत-पाक लडाई, 1971 की बांग्लादेश लड़ाई या 1999 की सीमित कारगिल लड़ाई) होता तो प्रधानमंत्री मोदी खुद सेनापति के अंदाज में कमान लिए हुए नहीं दिखते?
ऐसे समय में प्रधानमंत्री की बात की जाये तो कल फिर उनकी मुलाकात अदाणी से हुई। मौका केरल में अदाणी के बंदरगाह के उद्घाटन का था और वहां उन्होंने जो कहा उसी पर चुटकी लेते हुए द टेलीग्राफ ने लिखा है, समुद्री बंदरगाह पर ‘नीन्द न आने’की बात। इस पूरे मामले को दि एशियन एज ने शीर्षक में विस्तार से बताया है और यह खबर लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर तो है। कल ही सोशल मीडिया पर अदाणी को तलाशा जा रहा था। आप जानते हैं कि अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने अरबपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के खिलाफ 265 मिलियन डॉलर की कथित रिश्वतखोरी का मामला दर्ज किया है। अमेरिकी रेग्युलेटर द्वारा कोर्ट फाइलिंग में बताया गया है कि इस मामले में जांच के लिए भारत से मदद मांगी गई है। खबरों में इस बारे में प्रमुखता से कुछ नहीं है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री अदामी का बचाव करते रहे हैं और अब कहा है, केरल के आयोजन में मुख्यमंत्री और शशि थरूर के साथ मौजूद प्रधानमंत्री ने कहा, इंडिया ब्लॉक की नीन्द उड़ जायेगी।
द हिन्दू ने प्रधानमंत्री के ज्ञान की बात की है और बताया है कि प्रधानमंत्री के अनुसार बंदरगाह की अर्थव्यवस्था भारत के विकास को गति देगी। इंडियन एक्सप्रेस में अदाणी के करीबी पर सेबी के इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोप की एक खबर है। यह एक ऐसा काम है जो कायदे से किया ही नहीं जाना चाहिये। किसी कंपनी के प्रोमटर को तो बिल्कुल नहीं। पर जिस अदाणी को सेबी ने बचा लिया उसके भतीजे पर सेबी ही आरोप लगा रही है तो आप समझ सकते हैं कि मामला कितना खराब हो चुका होगा कि सेबी को ऐसी कार्रवाई करनी पड़ी होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि सुदूर दक्षिण के केरल में एक निजी बंदरगाह के उद्घाटन की खबर दिल्ली में सबसे बड़ खबर के रूप में छापने के लिए कुछ जतन करने ही पड़ेंगे और इसी को हेडलाइन मैनेजमेंट कहा जाता है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने केरल में समुद्र किनारे नींद उड़ने की खबर को दिल्ली में पहले पन्ने पर नहीं रखा है। हिन्दुस्तान टाइम्स की मानें तो भारत पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने की कोशिश में है।
कहने की जरूरत नहीं है कि भारत सरकार को कायदे से यह बताना चाहिये कि पहलगाम हमले के बाद उसने क्या कार्रवाई की है। सरकार की कार्रवाई न सिर्फ हमलावरों को सजा दिलाने के लिए होनी है बल्कि भविष्य में ऐसी घटना फिर न हो इसे भी सुनिश्चित किया जाना है और उसके लिए भी कार्रवाई होनी है। कोई दो राय नहीं है कि इस हमले के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है या उसकी चूक के कारण ही यह वारदात हो पाई और अभी तक तीन मूल हमलावर नहीं पकड़े जा सके हैं। इसमें घने जंगल हैं, पाकिस्तान भाग गये जैसी बातों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि यह कोई नई बात नहीं है और सबको पहले से पता है। देश भर में खासकर डबल इंजन वाले भारत में रोज आम लोग किसी ना किसी कारण से पीटे जा रहे हैं, परेशान किये जा रहे हैं ऐसे में सुरक्षा का आश्वासन बहुत बड़ी चीज है और जब डबल इंजन वाले राज्यों में नहीं है तो कश्मीर में क्या की जाये। हमले के 10 दिन से ज्यादा हो चुके हैं. सरकार ने जो किया और कर रही है उससे नहीं लगता है कि उसके पास कोई योजना या कार्यक्रम है लेकिन अखबार सरकार को मजबूत और हर बार न सिर्फ मास्टर स्ट्रोक चलने वाला बताते हैं बल्कि ऐसी खबरें देते हैं जिससे लगे कि सरकार ने नहले पर दहला मारा है। यह हाल है, 3 मई के अखबारों का जो विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस भी है। झेलिये। उदाहरण के साथ अमृतकाल की पत्रकारिता समझने के लिए यहां आते रहिये।


