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भारतीय मीडिया के ढर्रे पर चलने की वजह से संजय सिन्हा की बीबीसी में नौकरी नहीं लगी! पढ़ें ये किस्सा

संजय कुमार सिंह-

मित्र संजय सिन्हा ने आज अपनी कहानी में बीबीसी के इंटरव्यू में पूछे गये सवाल और अपने जवाब का उल्लेख करते हुए बताया है कि भारत में टेलीवजन चैनल जो आज कर रहे हैं वर्षों से करते आ रहे हैं और इसी कारण उनका चुनाव बीबीसी के लिए नहीं हुआ था। (बाद में भारत सरकार ने बीबीसी का जो किया वह भी एक कहानी है।)

संजय का मुद्दा यह है कि जैसा समाज होता है लोग वैसे ही हो जाते हैं। मुझे लगता है कि धारा के साथ बहने वाले ही ऐसा करते हैं। सवाल उठाने वाले हमेशा सवाल उठाते है। उस दिन मेरी चिन्ता यही थी कि इंडियन एक्सप्रेस वाले खबर क्यों नहीं छाप रहे हैं। जो मैंने जाना-देखा (दुनिया कुछ और देख रही थी) उससे तय हुआ कि पत्रकारिता नहीं करनी है। मैंने इस पर किताब लिखी पर खरीद कर कौन पढ़ता? उसका कोई प्रायोजक नहीं मिला। दो लाख तो छोड़िये दो सौ प्रति खरीदने वाला नहीं मिला। कोई पत्रकारिता संस्थान भी नहीं।

भाजपा सरकार ने पीटीआई, यूएनआई को तो कमजोर किया ही है। एएनआई का जबरदस्त विकास हुआ है और मृतप्राय हिन्दुस्तान समाचार में स्फूर्ति आ गई है। जो हुआ हम उसके अभ्यस्त हैं। वही सामान्य है।

वरिष्ठ पत्रकार की मूल पोस्ट… नीचे पढ़ें


संजय सिन्हा-

भरोसे के मानचित्र पर मूरख मीडिया

मेरा बेटा दिल्ली में स्कूल की परीक्षा में ‘बुद्धिमान’ का विलोम ‘मूरख’ लिखकर चला आया था। जानते हैं क्यों? क्योंकि हम घर में हिंदी बोलते हुए भी बिहारी टोन में ‘मूर्ख’ को ‘मूरख’ बोलते थे, और बेटा दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ते हुए भी घर से ‘मूरख’ शब्द सीख ही गया था। बाद में टीचर ने उसे समझाया था कि सही शब्द ‘मूर्ख’ होता है, ‘मूरख’ नहीं।

बेटे ने मुझसे पूछा था, तो मैंने कहा था कि टीचर सही कह रही हैं। ‘मूर्ख’ ही होता है, हम गलत बोलते हैं। तुमने हमसे गलत सीख लिया था।

यही सच है। हम जो देखते हैं, जो हम सीखते हैं, वही हमारा चरित्र बन जाता है।

24 साल पहले बीबीसी लंदन में नौकरी के लिए मुझसे पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर मुझे मिल गया है। आपको पहले भी बता चुका हूं कि मुझे बीबीसी लंदन में नौकरी नहीं मिली थी।

मुझसे जो प्रश्न पूछा गया था, उसका मैंने जो जवाब दिया था, वही मुझे नौकरी नहीं मिलने के कारण था। और मैंने जो जवाब दिया था, वह भारत की पत्रकारिता के मूल में है, जिसका शिकार मैं भी था। मैं भारतीय मीडिया समाज से अलग नहीं था।

बीबीसी लंदन में नौकरी के लिए मुझे नहीं चुना गया था, और तब नहीं चुना गया था जब मैं भारत में इंडियन एक्सप्रेस समूह के अखबार ‘जनसत्ता’ और ‘ज़ी नेटवर्क’ में कई साल काम कर चुका था। मैं टीवी पत्रकार था, हिंदी और इंगलिश भाषा पर अच्छी पकड़ थी, इसके बावजूद बीबीसी के इंटरव्यू में मैं फेल हो गया था। पूरी कहानी पहले भी सुना चुका हूं लेकिन दुर्भाग्य से वही संदर्भ आज फिर आपके सामने प्रकट हो गया है।

असल में भारत में टीवी पत्रकारिता की शुरुआत मूरखता (मूर्खता) से हुई है। उसका इतिहास फिर कभी लिखूंगा। अभी आप लगातार खुद उस मूरखता का सामना कर कर रहे हैं, इसलिए मेरी आपबीती सुन लीजिए। बात ये है कि भारत-पाकिस्तान युद्ध की रिपोर्टिंग में इन दिनों आप रोज़-रोज़ खुलेआम भारतीय मीडिया की मूरखता से वाकिफ हो रहे हैं।

मुझे बीबीसी लंदन में नौकरी नहीं मिली थी। साल था 2001 और मैं तब अमेरिका में रह रहा था। बीबीसी ने अमेरिका में ही मेरे लिए लिखित परीक्षा की व्यवस्था की थी। जेनरल नॉलेज, हिंदी और इंगलिश में स्क्रिप्ट, अनुवाद और किसी विषय पर लंबा-सा निबंध लिखने जैसी परीक्षा में संजय सिन्हा को बहुत अच्छे नंबर से मिले थे। फिर फोन पर इंटरव्यू हुआ।

उस इंटरव्यू में मैंने एक गलती की। गलती नहीं, प्रश्न का बेहद गैर जिम्मेदाराना जवाब दिया था।

फोन पर मेरा इंटरव्यू हो रहा था। सब कुछ स्पीकर फोन पर। मेरी पत्नी पास थी और स्पीकर पर इंटरव्यू वो सुन रही थी। इंटरव्यू में एक सवाल पर मेरा जवाब उतना ही गलत था, जितनी गलती आप आज होते हुए देख रहे हैं। मेरा जवाब कहीं बाहर से नहीं आया था। मैंने भारतीय मीडिया से जो सीखा था, वही था। तब मुझे पहली बार अहसास हुआ था कि संसार में ख़बरों में भरोसे के मानचित्र पर भारतीय मीडिया कितने निचले पादान पर है।

अब आप सोच रहे होंगे कि वो कौन-सा सवाल था, जिसने संजय सिन्हा को बीबीसी में नौकरी मिलने से रोक दिया था? असल में वो सवाल नहीं बल्कि मेरा जवाब था, जिसने मुझे बीबीसी का हिस्सा बनने से रोक दिया था। सच कहूं तो रोक ही देना चाहिए था।

मुझसे पूछा गया था, “संजय जी, मान लीजिए रात की शिफ्ट में आप ही न्यूज़ विभाग के इंचार्ज हैं और रात में अचानक खबर आती है कि भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया है, तो खबर के प्रसारण पर आपका क्या फैसला होगा?”

ये भी कोई प्रश्न हुआ? मैं भारत में टीवी न्यूज़ चैनल में कई बार ऐसा होते देख चुका था। खबर मिली, फटाक से उसे प्रसारित कर दो। और अगर खबर गलत साबित हो जाए तो चुप्पी साध लो, कोई टोक दे तो माफी मांग लो। गर जो खबर सही साबित हो जाए तो अपनी पीठ ठोको, कहो “सबसे पहले हम”, “सबसे आगे हम”, “नंबर वन हम”, “सर्वश्रेष्ठ हम”, सबसे तेज हम।

मैंने अपनी ओर से त्वरित जवाब दे दिया था। इंटरव्यू फोन पर हो रहा था। मेरे जवाब के बाद उधर से अगला सवाल आया, “आप ऐसा करेंगे?”

“हां। हम तो इंडिया में टीवी पर ऐसा ही करते रहे हैं। हमें पता है कि सबसे आगे होने का क्या अर्थ होता है। हम खबर चला देंगे, गलत हुआ तो चुप्पी साध लेंगे या माफी मांग लेंगे। दोनों चलता है।

“लेकिन संजय जी, आप बिना खबर की पड़ताल किए, बिना परखे हुए हवा में आई खबर को रेडियो पर प्रसारित कर देंगे? टीवी पर दिखला देंगे?”

“जी हां। खबर की पड़ताल क्या करनी? खबर गलत हुई, तो बाद में सॉरी कह देंगे। खबर सही हुई तो वाहवाही मेरे हिस्से। सबसे तेज का टैग हमारे सिर पर।” और मेरा सेलेक्शन बीबीसी में नहीं हुआ था।

मेरे इस जवाब के तुरंत बाद मेरी पत्नी ने मुझे टोका था, “संजय, तुमने ऐसा कैसे कह दिया? जब से तुमने टीवी पत्रकारिता का रुख किया है, तुम पत्रकार रहे ही नहीं। जो तुमने कहा, वो निहायत गैर जिम्मेदार जवाब था। क्या तुम्हें भारतीय जन संचार संस्थान में या फिर इंडियन एक्सप्रेस समूह की ट्रेनिंग में ये नहीं बताया गया था कि ऐसी खबरों को प्रसारित करने के पहले सौ बार सोचना चाहिए कि खबर के प्रसारण से देश, दुनिया और समाज पर क्या असर पड़ेगा? उन्होंने तुमसे भारत-पाकिस्तान युद्ध पर सवाल किया था। तुमने कहा कि खबर मिलते ही तुम उसे प्रसारित कर दोगे? संजय, देश में कहीं मामूली दंगा भी भड़क जाए तो पत्रकार की जिम्मेदारी कितनी बढ़ जाती है, तुम्हें नहीं मालूम? एक छोटी-सी भूल से समाज में कितनी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, तुम्हें नहीं पढ़ाया गया? कैसे पत्रकार हो गए हो तुम इलेट्रानिक मीडिया में जाकर?”

मैं समझ गया था कि गलती हुई है। मूर्खतापूर्ण गलती। बाद में मैंने बीबीसी लंदन में काम करने वाले अपने एक दोस्त को फोन किया था, रिजल्ट जानने के लिए।

मुझे बताया गया कि इंटरव्यू में मेरे उस जवाब के बाद कि मैं युद्ध की खबर प्रसारित कर दूंगा, पूरी संपादकीय टीम अपसेट हो गई थी। “कैसा पत्रकार है, कह रहा है कि खबर की पड़ताल ज़रूरी नहीं, पहले प्रसारित कर दो खबर, बाद में देखेंगे सही गलत। मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि संजय जी, अच्छा पत्रकार बिना जांचे कभी खबर देने की जल्दी नहीं करता है। उसके लिए खबर की विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण है। आपको अपने जवाब में ये कहना चाहिए था कि अगर मेरी शिफ्ट में ऐसी कोई खबर आएगी, तो मैं रात में ही तुरंत पूरी टीम और अपने सीनियर को इसकी सूचना दूंगा। तुरंत एक मीटिंग कॉल करूंगा। पूरी टीम को इतनी बड़ी खबर में शामिल करूंगा। हर ओर से खबर की पुष्टि करूंगा, फिर खबर फ्लैश करूंगा। देर हो जाए, लेकिन चूक नहीं होने दूंगा। बिना पुष्टि के खबर नहीं दिखलाऊंगा। संजय सिन्हा अगर आपने ये जवाब दिया होता कि कनफर्म हुए बिना कोई फैसला नहीं लूंगा, तो आपको नौकरी पक्की मिलनी थी। यहां के लोग भी आपको नौकरी नहीं देने पर अफसोस कर रहे थे।”

मैं सोचूं कुछ भी, कहूं कुछ भी। सच्चाई यही थी कि उस जवाब के बाद मुझे बीबीसी में नौकरी नहीं मिली थी। ये मैं पहले भी बता चुका हूं।

कुछ साल बाद जैसे ही मैं अमेरिका से भारत आया, मुझे यहां के न्यूज़ चैनल में तुरंत नौकरी मिल गई थी। अमेरिका में कुछ साल रह कर जब मैं भारत आया था, तब यहां टेलीविजन न्यूज़ चैनल के संपादक दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार और देव आनंद नहीं थे, बल्कि मुकरी और महमूद संपादक बन चुके थे। न्यूज की दुनिया में जोकरों का आकार इतना बड़ा हो गया था कि गंभीरता खुद शर्मिंदा होने लगी थी।

मनगढ़ंत का बोलबाला चरम पर था। एलियन गाय को चुरा कर ले जा रहे थे। कुंजीलाल को यमराज का बुला रहे थे। देश के नंबर एक, दो, तीन सभी चैनल कुंजीलाल की मौत लाइव दिखला रहे थे। ये अलग बात है कि कुंजी लाल लाइव मरे नहीं और हम उनके जिंदा रह जाने पर शर्मिंदा भी नहीं हुए थे। जबकि हम सारा दिन कहते रहे थे कि अब मरेंगे कुंजी लाल। यमराज के दूत आने ही वाले हैं।

अपराध की खबरें (सत्य कथा और मनोहर कहानियां के स्तर की) लीड बनने लगी थीं। थर्ड ग्रेड एक ही बात को घुमा-घुमा कर नाक से आवाज़ निकालने का दौर शुरु हो चुका था। फिर क्यों नौकरी नहीं मिलती?

संपादक अपने फैसलों से हंसाते थे। हम संपादक पर हंसते थे। उस दौर में हमने खूब मौज काटी।

कुल मिलाकर मजे के उस दौर में हमने भारत में टीवी पत्रकारिता को वहां पहुंचा दिया, जहां से उसकी वापसी न्यूज़ की ओर संभव ही नहीं रही। और वही गलती बड़ी होकर हमारे सिर पर अब नाचने लगी है।

उस दिन मुझे दुख हुआ था कि बीबीसी ने एक मामूली गलती के लिए मुझे नौकरी नहीं दी थी।

और यहां? यहां दंगा भड़कने पर एंकर और दंगा भड़का रहा था। यकीन मानिए तब लंदन वालों ने दो टके की एक नौकरी मुझे नहीं दी थी। मैं सोचता था कि क्या हो जाता जो भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की एक खबर गलत चल भी जाती तो?

मैं सोचता था कि 24 घंटे की खबरों में सही या गलत क्या होता है? सोचिए ऐसा कहने पर कोई क्या बिगाड़ लेगा आपका? संभव है इनाम ही मिले। आप राष्ट्रवादी न्यूज़ वाले कहलाएंगे। आपको एक लाइन ही तो लेनी है।

नोट-

  • मुझे अब टीवी पर खबरें देखते हुए हंसी से अधिक रोना आता है। हम सबने मिल कर भारत में मीडिया की विश्वसनीयता को संसार में सबसे निचले पादान पर पहुंचा दिया है। पिछले चार दिनों से जो टीवी पर दिख रहा है, दिखलाया जा रहा है, उतने पर तो पता नहीं क्या हो जाता? हो जाना चाहिए था। पर करे कौन? क्यों करे?
  • मुझे अफसोस है कि भारत में सच में कोई सूचना और प्रसारण मंत्रालय नहीं है (हो सकता है आपको लगे कि है)।
  • मुझे खुशी है कि बीबीसी वालों ने मुझे मेरी औकात बता दी थी।
  • आप ये भी कह सकते हैं कि आज बीबीसी खुद…. वो जो हो, उसने जिस कारण मुझे रिजेक्ट किया था, वो कारण जायज था।
  • अब सब ठीक है इसलिये मैं तैर रहा हूं। स्वीमिंग पूल में धारा के साथ या विपरीत कुछ नहीं होता है।
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