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आज द टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम की एक गंभीर खबर है!

आज के अखबार : आतंकवाद से ‘मुकाबले’ का सच छोड़ कर हेडलाइन मैनेजमेंट यानी प्रचार वाली सुर्खियां

संजय कुमार सिंह

आज द टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम की एक गंभीर खबर है। खबर का शीर्षक है, एफडीआई में 96% गिरावट को लेकर चिंता। जी हां यह बड़ा मामला है। बहुत बड़ा। लेकिन प्रधानमंत्री कह रहे हैं, केंद्र राज्य मिलकर काम करें तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं। अखबारों ने आज इसे प्रमुखता से छापा है। इसपर जाने से पहले यह खबर जान लीजिये। संबित साहा और पिनाक घोष की बाईलाइन वाली यह खबर कलकत्ता डेटलाइन से है। खबर के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में किए जाने वाले निवेश में वृद्धि और भारतीय फर्मों द्वारा किए जाने वाले निवेश में वृद्धि के कारण वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 96 प्रतिशत घटकर 0.4 बिलियन डॉलर रह गया। सूत्रों ने कहा कि यह आंकड़ा कम से कम एक दशक के निचले स्तर पर है। विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में किया जाने वाला सकल एफडीआई पिछले वर्ष के 71.3 बिलियन डॉलर से 13.7 प्रतिशत बढ़कर 81 बिलियन डॉलर हो गया। हालांकि, विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में किया जाने वाला प्रत्यावर्तन और विनिवेश पिछले वित्त वर्ष में 15 प्रतिशत बढ़कर 51.5 बिलियन डॉलर हो गया। इसकी तुलना में, विदेशी निवेशकों ने 2024-25 में 44.5 बिलियन डॉलर निकाले थे। शुद्ध एफडीआई की मात्रा कम होने के दूसरे कारण के बारे में कुछ लोगों का तर्क है कि यह भारत के एक व्यापारिक गंतव्य के रूप में आकर्षण को दर्शाता है और वह खराब हुआ है।

आज की सरकारी और प्रचारित खबर है, टीम इंडिया की तरह मिलकर काम करें केंद्र राज्य तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं। यह खबर अमर उजाला में टॉप पर आठ कॉलम में है। नवोदय टाइम्स में लीड का शीर्षक है, केंद्र, राज्य करें टीम इंडिया की तरह काम। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री जो कह रहे है वह नया नहीं है। जहां तक मिलकर काम करने की बात है, हम देख रहे हैं। दक्षिण से लेकर मणिपुर का हाल सामने है। पहले कर्नाटक औऱ फिर महाराष्ट्र में सरकार कैसे गिराई गई। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार कैसे भाजपा की हो गई सबको मालूम है। बिहार में सरकार कैसे बनी कैसे गिरी और कैसे चली और क्यों नहीं बदली सब दिख ही रहा है। बंगाल की सरकार कैसे गिर जाये, उसके लिए जो सब हो रहा है उसमें बहुत कुछ सार्वजनिक है। दिल्ली चुनाव कैसे जीता गया सबको पता है, उसका फायदा भी दिख रहा है। एक बच्चे ने किसी टेलीविजन कार्यक्रम में कहा, मुख्यमंत्री का नाम तय नहीं हुआ था यमुना की सफाई शुरू हो गई। ऐसे में प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उसे कहने की नहीं अमल में लाने की जरूरत है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर छपी खबर का शीर्षक है, स्टालिन, रेवंत ने सहकारी संघवाद पर फोकस किया; विपक्ष के तीन मुख्यमंत्री अलग रहे। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, गैर राजग मुख्यमंत्रियों ने सहकारी संघवाद की अ्पील की। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार नौ विपक्षी मुख्यमंत्रियों में से तीन – पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, केरल के पिनयारी विजयन और कर्नाटक के सिद्धारमैया नीति आयोग की बैठक से अलग रहे। तमिलनाडु के मुक्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपने राज्य के विकास की छलांग पर प्रकाश डाला और केंद्र सरकार की वित्तीय नीतियों पर चिन्ता जताई। कहने की जरूरत नहीं है कि ऊपर प्रधानमंत्री के जिस बयान की चर्चा की गई है और जिसे मेरे हिन्दी अखबारों ने पूरी प्रमुखता दी है, उस मौके पर जो हुआ उसकी खास बात यह भी थी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का विरोध पुराना है। हम कारण भी जानते हैं।  

द हिन्दू की आज की लीड का शीर्षक है, मोदी ने केंद्र राज्य समन्वय की अपील की। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड राजनीति से अलग, समाज की जरूरत है। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि किशोर प्रेम को अपराध मुक्त करने पर विचार किया जाये। यहां यह गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का काम नागरिकों को न्याय देना है पर उसका ज्यादातर समय बुलडोजर न्याय जैसे सरकारी और जरूरी काम से संबंधित मामलों और फैसलों में लग जाता है। ऐसे मामलों में भी तारीख पर तारीख पड़ती है। मामले समय से नहीं सुने जा रहे हैं। दूसरी ओऱ सरकार का जो काम नहीं है वह हो नहीं रहा है तो कम से कम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को कहना पड़ा है जो सरकार को पहले खुद ही सोचना चाहिये था। विवाह और तलाक से संबंधित कानून और उसके दुरुपयोग का मामला भी ऐसा है। सरकार को इसपर भी विचार करना चाहिये लेकिन वह अपने कानूनों की पैरवी करे, उन्हें बचाये या नये मुद्दे हाथ में ले। इन स्थितियों में सरकार पाकिस्तान के खिलाफ प्रचार कर रही है। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल दौरे पर है ही और उसकी भी खबरें हैं। आतंकवाद सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए उसे जिन्दा रखा गया है लेकिन तथ्य यह भी है कि इससे बिहार-बंगाल में वोट मिलने की उम्मीद है।

इसलिए, प्रधानमंत्री आतंकवाद खत्म करने के लिये अपने तरीके से ‘काम’ कर रहे हैं। इसे राजनीति भी कह सकते हैं। इसके तहत पहलगाम की घटना के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराना और युद्ध जैसी कार्रवाई का निर्णय लेना शामिल है। उसे ऑपरेशन सिन्दूर नाम दिये जाने पर शक होना और उसका प्रचार किये जाने से पुष्टि होने के बावजूद न तो कोई स्पष्टीकरण है और ना पाकिस्तान हमले से हुए नुकसान के लिये कोई सहानुभूति। यह सब तब जब जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में चेकिंग के दौरान एक दिन किसी गाड़ी से हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकियों को गिरफ़्तार किया गया तो उसमें उस वक़्त जम्मू-कश्मीर पुलिस का एक डीएसपी देवेंद्र सिंह भी मौजूद था। सुरक्षाबलों ने आतंकियों के साथ ही डीएसपी को भी गिरफ़्तार किया था। जम्मू कश्मीर पुलिस ने मामले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। आईजी विजय कुमार ने कहा था, ‘देवेंद्र सिंह ने आतंकवाद विरोधी अभियान में बहुत काम किया है, लेकिन जिन परिस्थितियों में उन्हें गिरफ्तार किया गया है, वह एक जघन्य अपराध है। वो आतंकियों को बिठाकर गाड़ी पर ले जा रहे थे, इसलिए उनके साथ आतंकी जैसा ही सलूक किया गया है। उनसे पूछताछ जारी है। यह 12 जनवरी 2020 की खबर है। देवेन्द्र सिंह का क्या हुआ – नहीं बताया गया। जम्मू कश्मीर चुनाव से पहले केंद्रीय गृहमंत्री ने दावा किया था कि आतंकवाद खत्म हो गया है। सब ठीक चल रहा था।

अचानक पहलगाम हमला हो जाता है। बाद में पता चलता है कि उसकी पूर्व सूचना थी। पर बदला लेने की कार्रवाई होती है, ऑपरेशन सिन्दूर होता है, युद्ध होता है, अचानक खत्म हो जाता है और आतंकवाद खत्म करने के प्रयास जारी हैं, राज्यों को मिलकर काम करना चाहिये पर देवेन्द्र सिंह का क्या हुआ पता नहीं है क्योंकि जांच एनआईए के पास है। अगर कश्मीर सरकार कर रही होती तो उसपर सहयोग नहीं करने का आरोप लगता ही। दूसरी ओर, गिरफ्तार किये जाने से पहले वाले साल ही देवेन्द्र सिंह को राष्ट्रपति पुलिस मेडल से नवाज़ा गया था। वर्तमान में देवेंद्र सिंह की तैनाती श्रीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर थी। पकड़े गए आतंकियों का नाम सैयद नवीद मुश्ताक और आसिफ राथर है। नवीद बाबू, हिजबुल का टॉप कमांडर है, जबकि राथर तीन साल पहले इस आतंकी संगठन से जुड़ा था। यह तो हुई निचले स्तर की बात, हाल में खबर थी कि जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले मे चार्जशीट हो गई है। जाहिर है, सरकार को न तो पुलिस अधिकारी की पहचान है ना राजयपाल बनाये जाने वाले व्यक्ति की। भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं की तो बात ही नहीं हो सकती। ये वो लोग हैं जिनके नाम की सिफारिश तमाम जांच के बाद की जाती है। और नतीजा यह है कि हमले के लिए पाकिस्तान दोषी हो भी तो यु्द्ध बीच में कैसे खत्म हो गया? और होना था तो शुरू ही क्यों हुआ? क्या पहले पता नहीं था कि युद्ध नहीं लड़ा जा सकेगा। इस अयोग्यता (चूक, लापरवाही जो कहिये) का क्या और इसकी काट क्या है? यह सब कौन कर रहा है, किसके कहने पर कर रहा है और जरूरी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। 

एनडीटवी डॉट इन की एक खबर के अनुसार,  हिजबुल आतंकी नवीद पर अक्‍टूबर और नवंबर (2020) महीने में दक्षिण कश्‍मीर में 11 गैर कश्‍मीरियों की हत्‍या में शामिल होने का आरोप है। इनमें मजदूर और ट्रक ड्राइवर शामिल थे। 5 अगस्‍त 2019  को जम्‍मू कश्‍मीर से विशेष राज्‍य का दर्जा हटाए जाने के बाद इन हत्‍याओं की श्रृंखला को अंजाम दिया गया था। मकसद स्पष्ट था, सेब उद्योग को नुकसान पहुंचाया जा सके। पुलिस सूत्रों ने बताया कि वो नवीद की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे और जब उसने अपने भाई को फोन किया तो उसके ठिकाने का पता चला। पुलिस ने वनपोह में एक गाड़ी को रोका जिसमें हिजबुल आतंकी जो कि एक पूर्व विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) भी रहा है, उसके साथी आसिफ और डीसीपी देवेंद्र सिंह यात्रा कर रहे थे। ऐसे मामले में सरकार ने क्या कार्रवाी की पता नहीं है और फर पहलगाम होता है और तब जो कार्राई होती है उसक नाम रखा जाता है – ऑपरेशन सिन्दूर। समझ कौन नहीं रहा है? बोल नहीं रहा है तो एनडीटीवी को खरीद लिया गया है और आवाज रोकने की व्यस्था हुई है, उसके साथ चुनाव जीतने की व्यस्था हुई है। आतकंवाद तो बहाना है। वरना एनडीटीवी ने तभी कहा था, देवेंद्र सिंह को 15 अगस्‍त 2019 को राष्‍ट्रपति पुलिस मेडल से सम्‍मानित किया गया था। दविंदर सिंह और नवीद बाबू की गिरफ्तारी और पूछताछ के बाद पुलिस ने श्रीनगर और दक्षिण कश्‍मीर में कई जगहों पर छापे मारे और भारी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद बरामद किया जिसे डीसीपी व अन्‍य आतंकियों ने छुपा रखा था।

आतंकवाद से संबंधित इस स्थिति, पहलगाम हमले की तारीख, नाम पूछकर मारना और उसका प्रचर सब बताता है कि मामला वो है नहीं जो बताया जा रहा है। फिर भी देश ने युद्ध के लिए सरकार का पूरा साथ दिया और सरकार ने शिक्षा, चिकित्सा, जनहित को छोड़कर रक्षा बजट 80,000 करोड़ रुपये बढ़ा दिये। जाहिर है यह सरकार वो कर रही है जो देशहित नहीं है। और अगर किसी तरह है भी तो नागरिकों को अभी अशिक्षित, बेइलाज, बेरोजगार रखकर भविष्य के लिए भलाई किसे चाहिये? ऐसे में आज दि एशियन एज में शशि झरूर का कहा छपा है, आतंकवाद से चुप नहीं रहूंगा, यह शांति का मिशन है। मेरा मानना है कि आपको सरकार का प्रचार करने के लिए सुरक्षा मिल जायेगी तो आप चुप न हों पर आप जो कर रहे हैं उसे कौन नहीं समझ रहा है। जो नहीं समझ रहा है उसे बार-बार ऐसी खबरें छापकर भ्रमित तो किया ही जा सकता है और मीडिया यही काम करता रहा है।

गिरफ्तारी के वक्त देवेंद्र सिंह ने डीआईजी से कहा था-ये गेम है खराब मत कीजिए। इसपर डीआईजी ने देवेंद्र सिंह को थप्पड़ लगाया था। पांच साल हो गये यह पता नहीं चला कि देवेन्द्र सिंह कौन सा बड़ा गेम खेल रहा था। आज तक डॉट इन की एक खबर के अनुसार, क्या जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीएसपी देंवेंद्र सिंह का करीब बीस साल पुराना अपना गेम खराब हो गया है? या फिर उसने कुछ बड़े लोगों का गेम खराब कर दिया है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए मामले की जांच जम्मू-कश्मीर पुलिस से लेकर एनआईए को सौंप दिया गया है। आजतक के लिए शम्स ताहिर खान, परवेज़ सागर ने तभी लिखा था, मामला एनआईए के हाथ जाते ही कहने वालों ने अभी से कहना शुरू कर दिया है कि डीएसपी देवेंद्र सिंह का असली गेम अब शायद ही कभी सामने आ पाए। ठीक वैसे ही जैसे पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हुए आतंकी हमले के बाद पंजाब पुलिस के एक एसपी का सच कभी सामने नहीं आ पाया। खबर में आगे लिखा था, इस गेम को समझने के लिए देवेंद्र सिंह की गिरफ्तारी से पहले की कहानी समझना जरूरी है। जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुताबिक हिजबुल के आतंकवादी नवेद पर उसकी पहले से नजर थी। नवेद का मोबाइल भी सर्विलांस पर था। शनिवार को नवेद के मोबाइल से ही उसका लोकेशन पता चला। और उसके साथ ही ये भी पता चला कि डीएसपी देवेंद्र सिंह के मोबाइल का लोकेशन भी ठीक वही है। इसी के बाद नाकेबंदी की गई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अब यहां सवाल ये है कि बीस लाख का एक इनामी आतंकवादी अपने मोबाइल पर अपने घर वालों और भाई से बात कर रहा है। ये जानते हुए भी कि मोबाइल के लोकेशन से वो पकड़ा जा सकता है। सवाल ये भी है कि उसी इनामी आतंकवादी के साथ एक डीएसपी खुलेआम उसके साथ कार में जा रहा है। ये जानते हुए भी कि उसका और आतंकवादी का लोकेशन आसानी से ट्रेस किया जा सकता है। उसी मोबाइल की मदद से। क्या एंटी हाईजैकिंग स्कवायड और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप में काम करने वाला डीएसपी देवेंद्र सिंह इतना बेवफूक था? ये फिर जिस गेम के लिए वो निकला था उसे लेकर वो पूरी तरह बेफिक्र था? पांच साल इस सवाल का जवाब नहीं है?

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