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भड़ास4मीडिया के 17 साल : संस्थापक यशवंत सिंह के लिए दो कविताएँ आईं!

रचनाकार – हेमन्त जैमन “दबंग”

ना समझौता, ना डर, ना कोई झूठ का सहारा,
भड़ास4मीडिया ने गढ़ा सच्चाई का एक नया किनारा।
जहाँ बिकते हैं चैनल, चुप रहते हैं अख़बार,
वहाँ यशवंत सिंह ने थामा सच का हथियार।

सच की मशाल, शब्दों की धार,
भड़ास4मीडिया है पत्रकारिता का आगाज़ बारम्बार।
ना झुका, ना डरा, ना बिकने दिया कलम,
हर खबर में बस सच्चाई, ना कोई भ्रम।

बेबाकी इसकी पहचान बनी,
जहाँ सब चुप थे, वहाँ ये ज़ुबान बनी।
बोल पड़ा जो किसी ने कहने से डरा,
उस आवाज़ को भड़ास ने सहारा दिया खुला।

सत्रह बरस हुए, पर जुनून वही है,
हर एक सच्चाई के पीछे जुनूनी लहर गई है।
बड़े-बड़ों की पोल खोली,
जनता की बात मुखरता से बोली।

नहीं चाहिए TRP का झूठा तमगा,
भड़ास ने चुना है सच्चाई का रस्ता।
बिंदास अंदाज़, निष्पक्ष विचार,
मीडिया के जंगल में जैसे कोई तेज़ धार।

क्रांति की कलम, बगावत की भाषा,
हर झूठी सत्ता पर ये उठी एक आशा।
कागज़ नहीं, ये आग है शब्दों की,
जो जला दे नकली खबरों की बुनियाद पुरानी।

सत्रह बरस और ना कोई थकावट,
हर खबर में है ईमान की चमक और साफ़ स्पष्टता की रवायत।
यशवंत की सोच, ना गिरवी, ना बंधक,
उनकी पत्रकारिता – लड़े हर अन्याय से सशक्त।

चमकते नामों से नहीं, मेहनतकश से रिश्ता,
भड़ास बना जनता की आवाज़ का असली नक्शा।
बेबाकी से बुनता हर सवाल का जाल,
मीडिया की दुनिया में बना एक स्वतंत्र मिसाल।

ना झुका, ना रुका, ना डिगा ये कारवां,
भड़ास का हर पन्ना बोले – “सच ही है भगवान”।
यशवंत की राह में ना कोई डर का गहना,
उनके शब्दों में बोलता है एक पूरा ज़माना।

इस यात्रा को सलाम, इस जज़्बे को प्रणाम,
हर कलमकार को देता है ये एक नया नाम।
चलो मिलकर मनाएं ये सत्रहवां साल,

तो आइए करें इस क्रांति को सलाम,

भड़ास4मीडिया की सदा बनी रहे यह मिसाल।

सत्रहवें सालगिरह पर बढ़ाएं भड़ास का काम।

सच की लौ यूं ही जलती रहे हर साँस में,
यशवंत सिंह और भड़ास रहें हमेशा इतिहास में।


लेखक- मनोज दुबे

कलम उठाई, तो डर को हराया,
हर झूठ का साहस से चेहरा दिखाया
भय से परे, निडरता की मिसाल,
यशवंत भैया, आप हो कमाल

न मुकदमे रुका सके, न जेल की दीवार,
सच कहने का रहा आपमें अपार विश्वास अपार
“जानेमन जेल” में भी बो दिया विचार,
जहाँ डर सिमटता, वहाँ गूंजा आपका उच्चार

ना रुतबा देखा, ना पद की परछाईं,
फ़कीर हो या अफसर, सबको एक सी सुनाई
जो दूसरों ने छिपाया, आपने कह दिया,
जो सबने छोड़ा, आपने वहीं से लड़ लिया

मीडिया के बाजार में जब सब बिकने लगे,
आप जैसे कुछ ही थे जो टिकने लगे
ना झुके, ना रुके, ना कभी समझौता किया,
फक्कड़पन में ही आपने धर्म निभा दिया

सहयोग भले न मिला हो सरकारों से,
पर समाज को गर्व है आपके विचारों से
आप जैसे साहसी कलमकार हों जहाँ,
सच की लौ जलती रहे सदा यहाँ

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