नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में योगी, दार्शनिक, कवि, विश्व के आध्यात्मिकता महर्षि अरबिंदो के उत्तरपाड़ा भाषण के दिवस के मौके पर विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। राष्ट्रवादी पत्रकारिता के पुरोधा- महर्षि अरविंद विषयक विमर्श कार्यक्रम में विद्वानों ने अपनी राय रखी। स्वागत भाषण प्रधानाचार्या प्रोफेसर पुनम कुमरिया ने दिया। इस दौरान अतिथियों को तुलसी पौधा और उत्तरपाड़ा भाषण की प्रति भेंट की गई। उन्होंने कहा कि महर्षि अरविंद ने राष्ट्रवाद की अलख जगाई और उनके विचारों से पूरा भारत प्रभावित हुआ। आज भी उनके लेखनी का प्रभाव भारतीय मानस पर है। उन्होंने कहा कि श्री अरबिंदो युग द्रष्टा थे और उन्हें भारत की नियति का पूरा ज्ञान था। उन्होंने जब अपने लेखनी की शुरूआत इंदू प्रकाश से की इस दौरान कांग्रेस के तत्कालीन दिग्गज नेताओं की बोलती बंद हो गई थी। प्रभाव इतना रहा कि आलेखों की श्रृंखला का प्रकाशन अंग्रेजी हुकुमत के भय से रोकना पड़ा।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर किरण सूद ने उत्तरपाड़ा भाषण का अक्षरश पाठ किया और कहा कि उत्तरपाड़ा में दिया हुआ श्री अरविंद का भाषण भारत की नियति और भविष्य को बताता है। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रवाद भागवत कार्य से जुड़ा हुआ है। धर्म और राष्ट्र को महर्षि अरविंद अलग करके नहीं देख रहे थे। आज भारत के भविष्य को बेहतर समझने और इसके लिए कार्य करने के लिए जरूरी है कि श्री अरविंद के विचारों को आत्मसात किया जाए।
अध्यक्षता कर रहे इंडिया हैबिटेट सेंटर के डायरेक्टर, वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद् केजी सुरेश ने कहा कि आज के दौर में श्री अरविंद के लेखनीय कार्यों पर विचार और मनन करने और इसको बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इंदू प्रकाश से लेकर वंदे मातरम की लेखनी से भारत के राष्ट्रवाद की अलख पूरे देश में सुनाई दी।


हिन्दुस्थान समाचार के संपादक जीतेंद्र तिवारी ने कहा कि महर्षि अरविंद ने भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। लेखनी का प्रभाव ऐसा रहा कि हर आलेख के प्रकाशन के बाद उनपर राजद्रोह का आरोप लगता रहा। विद्वता ऐसी रही कि लोग अंग्रेजी हुकुमत चाह कर भी उनपर कार्रवाई नहीं कर सकी।
भारतीय विश्वविद्यालय संध के संयुक्त सचिव डॉ आलोक कुमार मिश्र ने श्री अरविंद के चेतना और लेखनी के प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की।
शिक्षाविद् मोहित सिन्हा ने कहा कि सनातन धर्म में शिक्षा का मूल उद्देश्य सिर्फ अर्थोपार्जन नहीं है। ज्ञान बांटना है। पत्रकार केशव कुमार ने कहा कि श्री अरविंद की जो राष्ट्रवादी पत्रकारिता आग्रही पत्रकारिता थी। जिसमें राष्ट्रीय चेतना आत्मगौरव और सांसकृतिक पुर्नजागरण समाहित था। उन्होंने एक क्रांतिकारी और कांग्रेस नेता के तौर पर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। भारतीयता के स्व यानी आध्यात्म की ओर मुड़ गए। उत्तरपाड़ा भाषण से लेकर स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर रेडियोत्रिचि से दिया गया उनका भाषण राष्ट्रीयता पत्रकारिता का सार है। उन्होंने श्री अरविंद के इन दो भाषणों को अध्ययन की सलाह दी।
कार्यक्रम के दौरान आगत अतिथियों ने श्री अरविंद विषयक आधारित पुस्तक के मुख्य आवरण पुष्ट का विमोचन किया। इसके साथ ही प्रशांत त्रिवेदी की भारतीय न्याय संहिता पर आधारित एक पुस्तिका का भी विमोचन किया। कॉलेज की प्राचार्या पुनम कुमरिया ने वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद् केजी सुरेश के सुझाव पर श्री अरविंद सहित अन्य राष्ट्रवादी विचारकों की लेखनी और पत्रकारिता जीवन पर आधारित एक सार्टिफिकेट कोर्स शुरू करने का आश्वासन भी दिया। धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम की समन्वयक डॉ सीमा सिंह ने किया। विमर्श कार्यक्रम का आयोजन ऑरो मीरा मीडिया एलएलपी, केबी न्यूज ने मीडिया स्कैन और इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय के सहयोग से किया था। कार्यक्रम में स्पॉन्शरशिप के माध्यम से सहयोग करने के लिए आयोजक ने स्टील ऑथोरीटी ऑफ इंडिया, गेल इंडिया लिमिटेड और मरियम स्टाफिंग एंड स्किल डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड का धन्यवाद किया।
मौके पर वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र मिश्रा, मदन कुमार, प्रभात तिवारी, डॉ अभिषेक, एआईसीटीई के निदेशक डॉ बीएन तिवारी के साथ आईपी कॉलेज के सभी प्रोफेसर एवं शिक्षक गण उपस्थित रहे।
श्री अरबिंद का संक्षिप्त परिचय
श्री अरबिंदो का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था। सात साल की उम्र में उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैंड ले जाया गया। वहाँ उन्होंने सेंट पॉल स्कूल, लंदन और किंग्स कॉलेज, कैम्ब्रिज में अध्ययन किया। 1893 में भारत लौटने पर, उन्होंने अगले तेरह वर्षों तक बड़ौदा रियासत में महाराजा की सेवा में और बड़ौदा कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में काम किया। इस अवधि के दौरान वे एक क्रांतिकारी समाज में भी शामिल हुए और भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह की गुप्त तैयारियों में अग्रणी भूमिका निभाई।
1906 में बंगाल के विभाजन के तुरंत बाद श्री अरबिंदो बड़ौदा में अपना पद छोड़कर कलकत्ता चले गए, जहाँ वे जल्द ही राष्ट्रवादी आंदोलन के नेताओं में से एक बन गए। वे भारत के पहले राजनीतिक नेता थे जिन्होंने अपने अख़बार बंदे मातरम में देश की पूर्ण स्वतंत्रता के विचार को खुले तौर पर आगे रखा। उन पर दो बार राजद्रोह और एक बार षडयंत्र के लिए मुकदमा चलाया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में उन्हें हर बार रिहा कर दिया गया।
श्री अरबिंदो ने 1905 में बड़ौदा में योग का अभ्यास शुरू किया था। 1908 में उन्हें कई मौलिक आध्यात्मिक अनुभूतियों में से पहली अनुभूति हुई। 1910 में वे राजनीति से दूर हो गए और अपने आंतरिक आध्यात्मिक जीवन और कार्य के लिए खुद को पूरी तरह समर्पित करने के लिए पांडिचेरी चले गए। पांडिचेरी में अपने चालीस वर्षों के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक अभ्यास की एक नई पद्धति विकसित की, जिसे उन्होंने इंटीग्रल योग कहा। इसका उद्देश्य एक आध्यात्मिक अनुभूति है जो न केवल मनुष्य की चेतना को मुक्त करती है बल्कि उसके स्वभाव को भी बदल देती है। 1926 में, अपनी आध्यात्मिक सहयोगी, माँ की मदद से, उन्होंने श्री अरबिंदो आश्रम की स्थापना की। उनके कई लेखन में द लाइफ डिवाइन, द सिंथेसिस ऑफ़ योगा और सावित्री शामिल हैं। श्री अरबिंदो ने 5 दिसंबर 1950 को अपना शरीर त्याग दिया।


