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कानपुर में पत्रकारों का वसूली गैंग बड़ा जबरदस्त और इरिटेट करने वाला है!

विवेक त्रिपाठी-

बीते एक दशक के दौरान कानपुर में पत्रकारिता की हालत क्या हो गई? जिस शहर में खबरें अखबार का कागज जला देती थीं, वहां स्याही को ग्रहण क्यों लग गया?

जिस नगर की डगर-डगर गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों की नजर हो, वहां पत्रकारिता को किसकी नजर लग गई? कानपुर के पत्रकारों की गरिमा, उनका मान-सम्मान कहां खो गया!

पत्रकारों का रुआब, उनका इकबाल किसने छीन लिया! जिस शहर के पत्रकार देशभर के बड़े अखबारों में संपादक हुआ करते थे, आज वहां के पत्रकारों का नाम भी कोई लेना नहीं चाहता.. ऐसी हालत क्यों बनी!

पत्रकार और पत्रकारिता की इन परिस्थितियों का जिम्मेदार कौन है? पिछले कुछ दिनों से कानपुर में हूं तो ऐसे सवाल मुझे बार-बार कचोट रहे हैं. साल 2013 में जब कानपुर छोड़कर लखनऊ गया था तब भी स्थितियां बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन पत्रकारों और पत्रकारिता का कुछ सम्मान बचा था। अधिकारी पत्रकारों की बात सुनते, समझते और मानते थे।

कई मर्तबा अधिकारी कानून व्यवस्था या अन्य गंभीर मसलों पर पत्रकारों से सलाह भी लेते थे। पत्रकारों में जूनियर-सीनियर का सम्मान होता था। प्रेस कांफ्रेंस या इवेंट में लूट-खसोट नहीं होती थी। आज परिस्थितियां बिल्कुल बदली हुई हैं। कानपुर में पत्रकारों की दशा दयनीय हो गई है। बड़े अखबारों और टीवी चैनलों के पत्रकार किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस या इवेंट में जाने से कतराते हैं। नए-नवेले पत्रकार मर्यादाएं तोड़ रहे हैं। सीनियर जर्नलिस्ट अपनी मान प्रतिष्ठा बचाए बैठे हैं।

हम लोग जब किसी अधिकारी से मिलने उनके ऑफिस जाते थे तो कभी पहले से बताते ही नहीं थे.. न कभी अनुमति ली, न ही पर्ची भेजी.. न इंतजार करते थे.. सीधे दरवाजा खोलकर धड़धड़ाते हुए भीतर घुस जाते थे. ये विडंबना ही है कि आज पत्रकारों को किसी अधिकारी से मिलने के लिए उसके दफ्तर के बाहर घंटों इंतजार करना पड़ता है।

पत्रकारों की इसी दशा पर आज सुबह ही दिल्ली में एक संपादक जी से चर्चा हो रही थी। वो भी कानपुर के ही हैं। उन्होंने जो किस्सा सुनाया, वो शर्मसार करने वाला है।

बोले कुछ दिन पहले मैं कानपुर में था। एक परिचित डॉक्टर ने अस्पताल शुरू करने की जानकारी दी। उसने कहा, थोड़ा मीडिया कवरेज मिल जाए। आप पत्रकार हैं तो अपने और अन्य अखबार के साथियों को सूचना दे दें।

संपादक जी ने एक बड़े अखबार के लोकल चीफ का नंबर दिया। अब संपादक जी की बात थी तो लोकल चीफ ने भी अखबार के दैनिक जानकारी वाले कॉलम में अस्पताल के उद्घाटन की एक लाइन की सूचना डाल दी। अस्पताल में सुबह ही 15 से 20 पत्रकार आकर बैठ गए।

चाय-नाश्ता किया। अस्पताल के विजुअल्स बनाए, डॉक्टर साहब की बाइट ली। चलते समय डॉक्टर साहब से खुलकर पैसों की डिमांड कर दी। डॉक्टर साहब भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा, पैसे किसलिए??

पत्रकार भी बेबाक बोले, इतनी दूर से आए हैं.. पेट्रोल खर्च किया है.. पैसे लगते हैं न कवरेज के। पत्रकारों ने डॉक्टर साहब से 2/2000 रुपए मांगे. डॉक्टर साहब मानते कैसे नहीं.. मजबूरी में 5/500 रुपए में कवरेज तय की।

खैर, पत्रकार साथी 5/500 रुपए लेकर चले गए। जब पैसे बंटने की खबर अन्य पत्रकारों को लगी तो कुछ देर बाद 15/20 पत्रकार और आ गए। डॉक्टर साहब को उनको भी रुपए देने पड़े। कुछ देर बाद 30/40 पत्रकार और आ गए। डॉक्टर साहब के पसीने छूट गए..

उन्होंने संपादक जी को अस्पताल बुलाया और पत्रकारों को हैंडल करने की गुहार लगाई.. संपादक जी ने ऐसे पत्रकारों को डांट कर भगाया.. संपादक जी भी हतप्रभ रह गए.. कह रहे थे वहां किसी बड़े अखबार या चैनल का कोई पत्रकार नहीं आया था। ये सब इतने सारे पत्रकार कहां और कैसे पैदा हो गए.. कहां और किस अखबार में छपेगी या किस चैनल में चलेगी इनकी खबर, कुछ पता नहीं.. उन्होंने सीधे साफ शब्दों में कहा, हर जगह इस तरह के पत्रकार होते हैं लेकिन कानपुर का वसूली गैंग बड़ा जबरदस्त और इरिटेट करने वाला है..

गणेश शंकर विद्यार्थी जी, आप तो चले गए, छोड़ गए हमें.. मैं शर्मसार हूं.. कानपुर की पत्रकारिता और कानपुर के पत्रकारों के लिए।

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