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भड़ास के 17 साल: मेरी पत्रकारिता का जो भी हासिल है उसमें यशवंत भैया का बड़ा हाथ है!

अशोक दास-

जब भी भड़ास 4 मीडिया का नाम आता है, मेरे मन में सिर्फ एक वेबसाइट का ख्याल नहीं आता – मेरे सामने एक पूरी यात्रा उभरती है। एक ऐसी यात्रा, जिसने न केवल मुझे पत्रकारिता में स्थान दिलाया, बल्कि आत्मसम्मान, स्वतंत्र सोच और निडर अभिव्यक्ति का रास्ता भी दिखाया।

हाल ही में भड़ास के 17 वर्ष पूरे हो गए हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस वैकल्पिक मीडिया की ताकत का प्रमाण है जो मुख्यधारा से अलग अपनी सख्त और साफ आवाज़ के लिए जाना जाता है। मुझे गर्व है कि मैं इसका पहला कर्मचारी रहा हूं।

जब मैंने अलीगढ़ अमर उजाला में अपनी नौकरी छोड़ी और एक्टिविजम की अपनी पहली यात्रा पर निकला, उस समय भविष्य को लेकर असमंजस था। लेकिन यहीं पर भड़ास और यशवंत सिंह ने न सिर्फ मुझे थामा, बल्कि सहारा भी दिया। यशवंत जी ने न सिर्फ मुझे काम दिया, बल्कि दिल्ली की पत्रकारिता में स्थापित होने का मौका भी मुझे भड़ास और यशवंत भैया की वजह से ही मुझे मिला।

सैकड़ों अन्य लोगों की तरह यशवंत सिंह से मेरा रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं रहा। उन्होंने मेरे लिए एक मार्गदर्शक, एक बड़े भाई और एक मित्र की भूमिका निभाई। उनकी सहजता, साफगोई और वैकल्पिक सोच ने मुझमें वो आत्मविश्वास भरा, जिसकी मुझे उस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।

भड़ास के शुरुआती दिनों में, पत्रकारिता जगत के तमाम लोग उन्हें हठी और ज़िद्दी समझते रहे। लेकिन मैं गवाही दे सकता हूं कि वे जैसे भीतर हैं, वैसे ही बाहर भी हैं। मैंने उन्हें कभी कोई आवरण ओढ़ते नहीं देखा, न ही कोई दोहरा चेहरा पाया, जैसा कि बहुत से लोग अपने साथ लिए घूमते हैं।

उनकी वजह से मुझे हिंदी पत्रकारिता के दिग्गजों – प्रभाष जोशी, रामबहादुर राय, अच्युतानंद मिश्र, संतोष भारतयी जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का इंटरव्यू लेने और उनके करीब जाने का मौका मिला। ये सिर्फ इंटरव्यू नहीं थे, बल्कि पत्रकारिता की जीवंत पाठशाला थीं। जिसने मुझे बेहतर पत्रकार बनाया। भड़ास के लिए काम करते हुए मुझे देश के तमाम मुद्दों और आवाज़ों से जुड़ने का अवसर मिला। यह मंच न होता, तो शायद मेरी पत्रकारिता यात्रा इतनी विविध, साहसी और गहरी न होती।

जब मैंने दलित दस्तक की नींव रखी, तब भी यशवंत भैया का सुझाव, समर्थन और मार्गदर्शन मेरे साथ था। आज मैं जो कुछ भी कर रहा हूं, जो भी थोड़ा-बहुत हासिल किया है – उसमें उनका भी एक हिस्सा है, उनका भी हक है। कई बार महीनों हमारी बात नहीं होती, लेकिन जब होती है, तो उनकी आवाज में वही गर्मी, वही अपनापन पाता हूं। वो मेरे जीवन में एक धरोहर की तरह हैं, जिनसे मैं कुछ भी साझा कर सकता हूं। मेरा मानना है कि हर किसी के जीवन में एक यशवंत सिंह होना ही चाहिए। क्योंकि उन जैसा इंसान आपको उड़ान भरना भी सिखाता है, और जमीन से जुड़े रहना भी।

इन 17 वर्षों में भड़ास ने कई उतार-चढ़ाव देखे होंगे, लेकिन उसकी धार कभी कुंद नहीं हुई। मेरी नजर में भड़ास एक प्लेटफॉर्म नहीं, एक आंदोलन है — उस सोच का आंदोलन, जो “भड़ास निकालो” को एक सशक्त पत्रकारिता दर्शन में बदल देता है।

लेखक दलित दस्तक के संस्थापक-संपादक हैं।

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