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आज के अखबार : ‘देशबन्धु’ से लेकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ तक ने प्रेस विज्ञप्ति का ही शीर्षक लगा दिया? 

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में ईरान पर अमेरिका के हमले की खबर भिन्न रूप और आकार में है। नतीजतन द टेलीग्राफ के पहले पन्ने पर कोई दूसरी खबर नहीं है। सबसे ज्यादा देसी और गैर यु्द्ध की खबरें हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने पर है। इनमें पहलगाम हमले के आतंकियों को शरण देने के लिए दो लोगों को गिरफ्तार किये जाने की खबर सबसे ज्यादा अखबारों में है। उसपर आने से पहले बता दूं कि, अमर उजाला के पहले पन्ने की लगभग इकलौती खबर का शीर्षक है, पीएम मोदी ने कहा, बातचीत व कूटनीति से ही होगी शांति। इस खबर का उपशीर्षक है, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजशकियन ने प्रधानमंत्री से फोन पर 45 मिनट बात की। यह खबर चार कॉलम का बॉटम है जबकि नवोदय टाइम्स में यह एक कॉलम की खबर है। शीर्षक है, पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से बात की। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी खबरों में एक का शीर्षक है, आपरेशन सिन्धु : इजराइल से 160 भारतीयों के पहले जत्थे को निकाला। ऑपरेशन सिन्दूर के बाद ऑपरेशन सिन्धू का यह प्रचार फोटो के साथ है जिसमें लोग तिरंगा लिये बस में बैठे हैं। तिरंगे की फोटो से भले देश भक्ति झलकती हो या उसी के लिए लगी हो पर झंडा ऊंचा रहे हमारा और पुराने फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के बाद झंडा लेकर बैठना अखरता है। अगर तिरंगे से ही देशक्ति दिखती हो तो उसे कमल की तरह सीने पर चिपकाया जाना चाहिये और उसी आकार का होना चाहिये। न हो तो जबरन देशभक्ति दिखाने के नाम पर तिरंगे की अवमानना का क्या मतलब?  

जो भी हो, मुझे लगता है कि दोनों खबरों की प्रस्तुति में खबर को प्रचार बनाने की प्रतिभा के भिन्न स्तर का उपयोग हुआ है। वैसे, आज अखिलेश यादव की प्रेस कांफ्रेंस की भी खबर है जो मेरे आठ अखबारों में सिर्फ देशबन्धु में पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, भाजपा सरकार में पुलिस का हो रहा राजनीतिक इस्तेमाल। इस तरह के शीर्षक पढ़ने-देखने की आदत छूट चुकी है और ऐसे में यह खबर आज कुछ ज्यादा ही प्रभावित कर रही है।   आज की खबरों में एक खबर, बिहार चुनाव से पहले मतदाता सूची की घर-घर जाकर जांच किये जाने की भी है। देशबन्धु ने इसे चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग के बड़े कदम की तैयारी कहा है जबकि दि एशियन एज में दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, चुनाव से पहले एनडीए के कामों से भाजपा ने ‘प्रवासी’ बिहारियों को प्रभावित किया। इसका उपशीर्षक है, साझे अभियान की शुरुआत जुलाई में होगी। भाजपा की चुनावी तैयारियों की यह खबर भाजपा की चुनावी तैयारियों का प्रचार होते हुए भी खबर तो है ही। दो कॉलम में छपी है। अक्सर होता यह है कि एक कॉलम की खबर को चार कॉलम का प्रचार बना दिया जाता है। विपक्ष के सवाल या आरोप रूपी चार कॉलम की खबर को सिंगल कॉलम में भी जगह नहीं मिलती है।

आज की इन सभी खबरों के अलावा जो और खबरें हैं उन सबमें सबसे महत्वपूर्ण खबर है, आतंकियों को शरण देने के आरोप में जम्मू व कश्मीर में दो गिरफ्तार। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, आतंकियों को शरण देने के आरोप में  दो व्यक्तियों को गिरफ्तार करने के बाद एनआईए ने कहा, पहलगाम के तीनों हमलावर पाकिस्तान के थे। कहने की जरूरत नहीं है कि आतंकियों को शरण देने के आरोप में दो गिरफ्तार तो खबर है। गिरफ्तारी सही या गलत हो सकती है पर इसके खबर होने से इनकार नहीं है। खबर में एनआईए का यह दावा शामिल है कि उन्होंने आतंकियों को शरण दी लेकिन दावा खबर नहीं हो सकती। वैसे भी, जो खबर है वह कम नहीं है। फिर भी, इंडियन एक्सप्रेस ने ही नहीं, देशबन्धु के साथ कई अन्य अखबारों का ऐसा ही शीर्षक है। इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया शामिल है। इनमें एनआईए के एक और दावे का प्रचार है कि तीनों पाकिस्तानी थे। संभव है यह एनआईए की विज्ञप्ति में किये गये दावे और उसके शीर्षक के कारण हो। अगर इसपर यकीन किया जाये तो खबर यह भी है कि एनआईए मान रहा है कि तीनों आतंकी सीमा पार करके भारत आये थे और वारदात करके चले गये। सरकार और सरकारी एजेंसियों को हवा भी नहीं लगी या पता था तब भी कुछ नहीं कर पाये।

इसमें तथ्य यह भी है कि नाम पूछकर, पैंट खुलवाकर, लिंग देखकर और ‘मोदी को बता देना’ जैसे डायलॉग देने और उसके भरपूर प्रचार के बावजूद आतंकी पकड़े नहीं जा सके। ऐसा नहीं है कि वे देश की सीमा के अंदर छिपे हुए हैं और एनआईए का दावा माना जाये तो पाकिस्तान से आकर वारदात करके वापस नहीं गये बल्कि यहां रहे, शरण पाई, रेकी की होगी, अपने आकाओ से बात की होगी पर पकड़े नहीं गये। एजेंसियों को हवा तक नहीं लगी और वे वारदात करके भाग गये। यह पाकिस्तान से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा की चौकसी या सीमा पर सतर्कता की कमी का भी मामला है या हो सकता है। कश्मीर में नागरिकों को मिल या दी जा सकी सुरक्षा का भी नमूना है। यह सीधे-सीधे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की जिम्मेदारी है। पर बांग्लादेश सीमा के लिए वे ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते हैं। एक पार्टी के रूप में भाजपा के लिए घुसपैठ साधारण समस्या नहीं है और 10 साल से ज्यादा सत्ता में होने के बावजूद ना घुसपैठ रोक पाई ना सीमा पार से आंतक। खबर यह भी है या होनी चाहिये पर यह सब खबर नहीं है तो आज के लिये इतना पर्याप्त था कि दो जने शरण देने के आरोप में गिरफ्तार किये गये हैं। वे पाकिस्तानी भी थे, यह प्रचार क्यों जरूरी है समझना मुश्किल नहीं है। दुर्भाग्य यह कि सरकार का प्रचार इंडियन एक्सप्रेस ने भी किया है। इस खबर का शीर्षक हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू की तरह, पहलगाम के हमलावरों को शरण देने के लिए दो गिरफ्तार, भी हो सकता था।

अखबारों की ऐसी संपादकीय गलतियां अखरती हैं। छोटी-मोटी गलतियों पर लिखना जरूरी नहीं लगता है और आज चूंकि खबरों की चर्चा कम हैं तो बता दूं कि नवोदय टाइम्स के 21 जून 2025 अंक में छपी खबर थी, बेटे की आत्महत्या के बाद सामान लेने आये पिता को बेड में मिली युवती की लाश। अखबार ने इसे लिव इन ट्रेजडी बताया था और फ्लैग शीर्षक था, प्रेमी ने प्रेमिका को मारकर खुद भी जान दी। 20 जून की इस खबर में लिखा था, 6 जून को पुलिस ने फ्लैट मालिक की मौजूदगी में दरवाजे का ताला तोड़ा। योगेश का शव एक पंखे से लटका मिला। पुलिस ने इसे आत्महत्या का मामला मानकर शव को कब्जे में ले लिया। लेकिन फ्लैट की छानबीन नहीं की और बेड में युवती का शव पड़ा रह गया। गुरुवार की शाम योगेश के पिता फ्लैट से अपने बेटे का सामान लेने के लिये पहुंचे। वे बेड को भी ले जाना चाहते थे। जब उन्होंने  बेड को उठाने का प्रयास किया तो उसमें युवती का शव था। एक बार फिर धारूहेड़ा थान पुलिस फ्लैट पर पहुंची।

मुझे लगता है कि खबर में जो कहा या बताया गया है वह सही नहीं भी हो सकता है और खबर किसी के कहने पर या एक सोच के आधार पर लिखी गई है जो वैसे थप गई । उदाहरण के लिए, 20 जून को यह लिखना कि 6 जून की आई पुलिस ने छानबीन नहीं की। उस समय मौके पर तमाम लोग मौजूद रहे होंगे, खबर के अनुसार युवती की हत्या पहले हुई थी और उसके शव से बदबू नहीं आ रही थी? पुलिस की यह लापरवाही बड़ी है कि उसी फ्लैट में दूसरा शव भी था जो उसे नहीं मिला। इसके कारण भी हो सकते हैं। दूसरे, बेड को हटाने से पहले उसका बिछावन हटाया जाता है, बॉक्स वाला बेड अमूमन खोल कर खाली किया जाता है और घर वाला न हो तो कोई क्यों मानेगा कि वह खाली है और बिना खोले, देखे उठाने की कोशिश करेगा। मुझे लगता है कि इसमें विवरण पूरा नहीं है और संपादन की कमी रह गई है। अमूमन ऐसी गलतियों पर मैं पहले पन्ने की रिपोर्ट में नहीं लिखता हूं इसलिए इसपर उस दिन नहीं लिखा लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में समेत कई अखबारों के एक जैसे शीर्षक से लग रहा है कि आजकल संपादन की बजाय पन्ना भरने की जल्दबाजी रहती है।

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