चंद्र भूषण-
विलियम डैलरिंपल ने हाल में आई अपनी किताब ‘द गोल्डन रोड’ में महाकवि दंडी का बहुत सुंदर चित्र खींचा है। बचपने से ही किस्मत का मारा, जहां-तहां भटकते हुए सड़कों पर ही जवान होने वाला दक्षिण भारतीय संस्कृत कवि, जिसने चालुक्यों के हाथों पल्लव वंश की पराजय और कांचीपुरम के ध्वस्त कर दिए जाने के बाद ईसा की सातवीं-आठवीं सदी की संधि पर बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिमी तट पर इस राज्य का फिर से स्थापित होना और इसका नई ऊंचाइयां छूना देखा।
इस क्रम में ही उसने ‘अवंतिसुंदरीकथा’ तथा ‘दशकुमारचरित’ जैसे फक्कड़ाना युवकोचित कथाग्रंथों की रचना करने के अलावा काव्यशास्त्र पर भी इतना सुंदर लिखा कि उसकी किताबें अनूदित होकर उसके जीवनकाल में ही चीन से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक पढ़ी गईं।
बहरहाल, यहां दंडी पर बात करने का मेरा मन अचके में दिख गए उनके सिर्फ एक श्लोक के लिए हुआ। उन्हीं के एक और श्लोक के पीछे मैं पंद्रह-बीस दिन पहले पड़ा हुआ था, लेकिन उनका ग्रंथ ‘काव्यादर्श’ डाउनलोड कर लेने के बावजूद उसमें श्लोक खोजने भर की मेहनत नहीं कर पाया। कभी बाद में यह काम किया जाएगा। उस श्लोक की एक अर्धाली सबने सुनी होगी- ‘गद्यम् कवीनाम् निकषम् वदंति'(गद्य को लोगबाग कवियों की कसौटी कहते हैं।) मुझे दूसरी अर्धाली चाहिए थी, क्योंकि व्याख्या के बिना, अलगाव में तो इस हिस्से का कुछ भी मतलब निकाला जा सकता है।
बहरहाल, दंडी के जिस श्लोक पर अभी मन अटका हुआ है, वह यह रहा-
आभीरादिगिरः काव्येष्वपभ्रंशतयोदिताः।
शास्त्रेषु संस्कृतादन्यदपभ्रंश इति स्मृतम्॥
‘आभीर (अहीर) आदि समुदायों की बोली को काव्यों में अपभ्रंश कहा गया है, जबकि शास्त्रों में इसे संस्कृत से विचलन के रूप में याद किया जाता है।’ यहां ‘आदि’ शब्द थोड़ी गफलत पैदा कर रहा है क्योंकि दंडी चाहे जितने भी बड़े घुमक्कड़ क्यों न रहे हों, अहीर जाति की गति दक्षिण भारत में कर्नाटक के उत्तरी हिस्से तक ही रही है, ज्यादा घुलाव-मिलाव उसके साथ कवि महोदय का हो नहीं पाया होगा। इस ‘आदि’ से ऐसा लग रहा है, जैसे यह कई समुदायों की भाषा रही होगी।
यह तभी हो सकता है, जब इसका मुख्य जुड़ाव समुदाय के बजाय किसी क्षेत्र से माना जाए। लेकिन ऐसा होता तो यह कालिदास से लेकर और भी कई नाटककारों के यहां कुछ खास पात्रों के लिए प्रयोग में कैसे लाई जाती। वहां इससे पात्र के सामाजिक स्तर का अंदाजा मिलता था, उसकी क्षेत्रीय पहचान का नहीं।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने शुरू के संस्कृत ग्रंथों में अपभ्रंश को सिर्फ और सिर्फ आभीरों (अहीरों) की भाषा के रूप में दर्ज होने की बात ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में कही है, हालांकि इसके लिए वहां किसी संस्कृत ग्रंथ का उल्लेख नहीं किया है। बाद में दसवीं सदी ईसवी में गुर्जर-प्रतिहार वंश के राजकवि राजशेखर के हवाले से वे इसे उनके दौर की राजसभाओं की चार भाषाओं में से एक बताते हैं- संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और पैशाची। भारत के भाषा इतिहास में कम से कम पांच सौ साल अपभ्रंश भाषा के संपूर्ण दबदबे के रहे हैं और सुदूर दक्षिण को छोड़कर ऐसा हर जगह देखा जाता रहा है। महासिद्धों और नवनाथों ने संस्कृत और अपभ्रंश, दोनों ही भाषाओं में ग्रंथ लिखे, लेकिन लोक में उनकी स्मृति अपभ्रंश से ही है।
यानी छह-सात सदियों के विकासक्रम में ही अपभ्रंश एक समुदाय की भाषा से ऊपर उठकर पूरे समाज की भाषा बन गई। महाकवि दंडी जिस समय (680-720 ई.) अपभ्रंश के बारे में अपनी राय जाहिर करते हुए इसके बारे में दोनों बातें कह रहे हैं- ‘यह अहीरों आदि की भाषा है’ और ‘यह संस्कृत का ही भ्रष्ट रूप है’, वह एक संधिकाल है, जिसके बाद पूरे पांच सौ साल अपभ्रंश ने इस देश पर राज किया। देश में ऐसा और कोई उदाहरण नहीं है, जहां एक समुदाय से जुड़ी पहचान वाली भाषा समय के साथ उससे बिल्कुल ही अलग हो गई हो।
हिंदवी जैसी आधुनिक भाषाओं और अवधी-मैथिली जैसे उसके स्थानीय रूपों के उदय से पहले हम बौद्ध महासिद्धों को इसी में ‘अवहट्ट’ नाम से और विद्यापति को ‘अपभ्रष्ट’ नाम से लिखते देखते हैं। बीच में स्वयंभू जैसे जैन कवियों ने जैन रामायण जैसी प्रसिद्धि वाली अपनी रचना ‘पउमचरिय’ के जरिये लंबे समय तक इसपर कब्जा कर रखा है और चंदवलद्दिय (चंद बरदाई) जैसे वीरगाथा कालीन कवियों की तो इसपर मोहर ही लगी हुई है।
इसमें कोई शक नहीं कि अपभ्रंश की किताबें अगर जैन ग्रंथागारों में सुरक्षित न रही होतीं तो इस भाषा का शायद पूरी तरह स्मृतिलोप हो गया होता। जैन धर्म के ही अनुयायी हेमचंद्राचार्य (1145-1229 ई.) ने अपने ग्रंथ ‘शब्दानुशासन’ में अपभ्रंश का व्याकरण लिखकर यह सुनिश्चित कर दिया कि बाद के लोगों को इसके ग्रंथों का अर्थ समझ में आता रहे, वरना जैसे हजार साल से ज्यादा समय तक ब्राह्मी लिपि के अक्षरों को हम चील-कौआ मानते रहे, वैसा ही कुछ अपभ्रंश के साथ भी होता।
अद्दहमाण (अब्दुल रहमान) जैसे न जाने किस देश-काल के कवि ने अपने ‘सन्नेहरासअ’ (संदेशरासक) के जरिये अपभ्रंश को देश में उभरती हिंदू-मुसलमान की दहलीज भी पार करा दी लेकिन बस, अहीर कवियों ने ही या तो किसी वजह से अपनी घोषित भाषा में लिखना छोड़ दिया, या लिखा भी तो शायद अपनी सामुदायिक पहचान छोड़ दी। या फिर यह भी हो सकता है कि उनके लिए अपभ्रंश को अपने साथ जोड़े रखना कोई मुद्दा ही नहीं था। उनकी नजर में यह उनकी अपनी बोली थी। अपनी मौखिक और स्मृति रचनाओं में वे समय के साथ इसको बदलते चले गए। लिखने की कला सीखकर, आचार्यों से पंगे लेकर उन्हें किताबों में दर्ज करने की जहमत ही नहीं उठाई।


