हरीश पाठक-
अरसे तक रुलाएगा, अरुण रंजन का जाना। अरुण रंजन नहीं रहे।
यह छोटी सी खबर हिंदी पत्रकारिता के एक जगमग कालखंड के खत्म हो जाने की सूचना है। यह सूचना है उस कभी न भूलने वाले बेहतरीन पत्रकार और संपादक के न रहने की जिसकी घटनास्थल से की बेख़ौफ़ रिपोर्टिंग आज भी बंद दराजों से बोलती है। ‘धर्मयुग’ हो या ‘रविवार’ या ‘नवभारत टाइम्स’ अरुण रंजन का मतलब था धड़कता हुआ, बोलता हुआ और बोलती बंद कर देनेवाला सच।
बिहार की पत्रकारिता के वे शिखर थे। मेरी पीढ़ी ने उस शिखर पत्रकार से बहुत कुछ सीखा। तथ्यों पर गरजना।हिम्मत से लिखना। खबर के पीछे पीछे दौड़ना और कभी भी, किसी भी कीमत पर आत्म सम्मान को गिरवी नहीं रखना। यही वजह है कि उनकी देह जरूर आज दोपहर नोएडा के सेक्टर 94 के श्मसान में पंचतत्व में विलीन हो जायेगी पर अरुण रंजन हिंदी पत्रकारिता से कभी भी विलीन नहीं हो सकते। वे संदर्भ ग्रन्थ की तरह हर वक्त याद रहेंगे। खास तौर पर तब जब बिहार का भूमि संघर्ष का जिक्र आएगा, कसेरुआ जैसे आम जन को घोड़े की टापों से मारा जाएगा या बिहार के नक्सल आंदोलन का जिक्र होगा-तब तब एक जरूरी सवाल की तरह वे याद आते रहेंगे।
हिंदी के इस यशस्वी संपादक ने कल रात दिल्ली के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे 74 साल के थे। उनकी मौत की तात्कालिक वजह हृदय घात बताया गया पर दो साल पहले आये ब्रेन स्ट्रोक के बाद से वे बिस्तर पर थे। उनकी आवाज भी चली गयी थी। वे पिछले 18 साल से बिटिया सज्जा व दामाद प्रख्यात पत्रकार मनोज मनु के साथ रह रहे थे।
यादगार रिपोर्टिंग करने वाले अरुण रंजन ‘नवभारत टाइम्स’ के पटना संस्करण व जी न्यूज के अरसे तक संपादक रहे। आज वे दैहिक रूप से जरूर हम सभी से विदा हो जायेंगे पर शब्दों में, अक्षरों में, यादों में वे हर वक्त जिंदा रहेंगे।
अरुण रंजन मरते कहाँ हैं?
वे तो सिर्फ अदृश्य होते हैं।
उर्मिलेश-
वरिष्ठ पत्रकार अरुण रंजन जी का 23 जून को निधन हो गया. बिहार के समाज और राजनीति को अच्छी तरह जानने-समझने और उस पर खूब लिखने वाले पत्रकारों में वह एक उल्लेखनीय नाम थे. नवभारत टाइम्स में हम लोगों ने साथ-साथ काम किया था. वह हमारे सीनियर थे. अरुण जी से मेरी पहली मुलाकात 2 अप्रैल, 1986 को पटना के फ्रेजर रोड स्थित उस बिल्डिंग में हुई थी, जिसे अब टाइम्स हाउस के नाम से जाना जाता है. नवभारत टाइम्स के बिहार संस्करण का दफ़्तर इसी बिल्डिंग में था. हम इसी अखबार में काम करने दिल्ली से पटना गये थे. अरुण जी पहले से ही नवभारत टाइम्स के लिए काम करते थे. नवभारत टाइम्स का नया संस्करण शुरू होने से पहले वह अखबार के राज्य संवाददाता थे.
नवभारत टाइम्स दफ़्तर की पहली चाय उन्हीं के सौजन्य से पी! पहली ही मुलाकात में खूब गपबाजी हुई. हम पहली बार मिल रहे थे पर एक-दूसरे को नाम से जानते थे. थोडा-बहुत काम से भी! इसलिए हममें अजनबीपन नहीं था.
अभी अखबार छपना शुरू नहीं हुआ था लेकिन कुछ ही दिनों बाद हम लोगों ने एक टीम के तौर पर काम करना शुरु कर दिया! उन्हें हमारी रिपोर्टिंग टीम के प्रमुख का कार्यभार मिला था.. जल्दी ही हम लोगों के बीच अच्छा तालमेल बन गया. अखबार में मेरी पहली औपचारिक नौकरी थी पर शुरुआत से ही मुझे राजनीतिक बीट मिला. संभवत: कुछ सरकारी विभाग भी दिये गये..
अरुण जी की बातचीत में बहुत खुलापन था. उनकी लिखने की अदा असरदार और आवाज दमदार थी. संवाद का अंदाज आमतौर पर दोस्ताना होता था.
अपने कई पत्रकार-मित्रों की तरह मैं आमतौर पर सुरा-प्रेमी नहीं था. कुछ ही समय पहले विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर नये-नये पत्रकार बने थे. ऐसे में चाय के अलावा किसी अन्य पेय पदार्थ में मेरी रुचि नहीं थी. हालांकि कुछेक बार मदिरापान कर चुका था. पर पटना में पहली बार मदिरापान अरुण जी के सौजन्य से किया.
वह सामने ही बैठा करते थे. उनके ठीक सामने की कतार में कई टेबुल कुर्सियां लगी रहती थीं. इनमें एक पर मैं बैठता था. एक दिन शाम को अपनी कुर्सी से उठते हुए अरुण जी ने मुझसे कहा:’क्या उर्मिलेश जी, लिखाई अभी खतम नहीं हुई? खतम कीजिए, चलिये आज आपको एक जगह ले चलते हैं.’ हमने काम समेटा और दोनों नीचे उतर गये. हम लोग बिस्कोमान भवन के पास जाकर रुके. वह भवन के बगल के एक हिस्से में चलने वाले एक रेस्तरां-बॉर में ले गये. इस तरह पटना दफ्तर की पहली चाय की तरह मदिरापान भी अरुण जी के साथ ही हुआ!
अरुण जी के साथ बिताये ऐसे अनेक क्षण और अनुभव मेरे मन-मस्तिष्क में आज भी दर्ज हैं. इनमें कुछ मीठे तो कुछ खट्टे भी हैं. पर एक बात जरूर कहूंगा कि अरुण जी एक जीवंत शख्सियत थे. अगर वह अच्छे मूड में हैं तो अपने साथ बैठे किसी शख्स को वह बोर नहीं होने देते थे. वह एक विलक्षण ‘टेबल-टॉकर’ थे! अद्भुत भाषा और बेजोड मुहावरे! उनके पास बिहार की सियासत और समाज के एक से बढ़ाकर एक दिलचस्प किस्से थे..
सन् 1995 में पटना छोडने के बाद उनसे मेरा मिलना-जुलना कम हो गया. बाद के दिनों में वह अपने परिवार सहित दिल्ली में रहने लगे थे. बीच-बीच में कभी-कभी मिलना हुआ पर ज्यादा नहीं. दिल्ली शहर ही ऐसा है! हां, जहां तक याद है, कुछेक बार राज्यसभा टीवी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें चर्चा के कार्यक्रम में आमंत्रित भी किया. कुछ अन्य चैनलों पर यदा-कदा उनसे मुलाकात हुई थी.
उनके निधन की सूचना आज जब मिली तो कुछ देर के लिए मैं सन्न रह गया! कुछ मित्रों की पोस्ट से उनकी लंबी अस्वस्थता के बारे में जानकारी मिली. गहरा दुख है, अपने वरिष्ठ सहकर्मी-साथी के जाने से! पर क्या करें, सबको एक दिन जाना है. इसलिए जितने दिन रहना है, प्यार-मोहब्बत से रहना चाहिए. अपने मन और विचार के मुताबिक काम करना चाहिए!
सादर श्रद्धांजलि अरुण जी! परिवार के प्रति शोक-संवेदना!
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मूल खबर…



पद्मसंभव श्रीवास्तव
June 26, 2025 at 10:42 pm
स्व.अरूण रंजन जी सधे हुए सटीक शब्दों में किसी घटना का विवरण प्रस्तुत करते थे। इस कारण सपाट शब्दों में विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने से पहले कटु टिप्पणीकारों के लिए एक पेशेवर चुनौती थी।
निजी रूप में उनका दीर्घ साहचर्य सुख प्राप्त नहीं हुआ, किंतु ‘ सामयिक वार्ता ‘ समाचार आधारित पत्रिका से जुड़े हुए अरूण रंजन जी ने साथ संपादकीय विभाग में दायित्व सौंपने का प्रस्ताव रखा। उन दिनों अर्थाभाव से जूझ रहा था,मगर शैक्षणिक सत्र के नियमित अध्ययन पर असर पड़ रहा था। अरूण रंजन जी मेरी समस्या से अवगत थे। उन्होंने कहा कि संपर्क में रहना, शायद कोई अच्छा अवसर मिले।
बाद में, ज्ञानवर्द्धन मिश्र और सुरेंद्र किशोर से मिलने छज्जूबाग स्थित ‘आज’के पटना कार्यालय में आये। विधानसभा सत्र में रेपसीड आयल घोटाले पर हंगामा हुआ था। ‘रविवार’ में प्रकाशित उनकी रिपोर्ट वेश्म में विरोधी दलों के विधायक हवाले देते सदन में बहस के मूड में थे। सुरेंद्र किशोर जी ने मज़ाक के लहज़े में चुटकी लेते हुए कहा कि कुछ खर्च किए बिना हम सभी तारीफ नहीं करेंगे। फिर ठहाके लगाते हुए सभी बाहर चाय पीने लगे। मैं प्रशिक्षु था, इसलिए संकोचवश उन सबके साथ नहीं गया। मुझे नहीं देखकर बाहर से पुकारते हुए बुलाया और कहा कि हम सभी एक ही हैं। स्कूप ढूंढने में तुम लाजवाब हो। कल्याण मंत्री का ‘ कल्याण ‘ करा दिया, फिर भी लजा रहे हो। मानवीय सरोकार से जुड़े हुए अरूण बाबू सहृदय थे और यह उनके पैतृक संस्कार का सामाजिक चेतना सदैव संग रहा।
सन् 1991 उनके संपादकीय कार्यकाल में ‘ नवभारत टाइम्स ‘ में प्रकाशित विशेष संपादकीय से मैं आहत महसूस कर रहा था, पारिवारिक मामले को सुलझाने में मैं परेशान था और उनके सार्वजनिक अपील के बाद तानों को झेल रहा था।’स्वतंत्र भारत’ के मुरादाबाद संस्करण के संपादकीय विभाग में कार्यरत होने पर ऐसा लगा कि अब मेरी समस्याओं को सुलझाने में मदद मिलेगी। उनके द्वारा मार्मिक संवेदनाओं से पूरित अपील की जानकारी मिलते ही ‘जनसत्ता’ के पटना कार्यालय में पहुँचा। उसी भवन के ऊपर मंजिल में ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ का कार्यालय था। मैंने वहां डेस्क पर आँखें गड़ाए हुए पत्रकार सुरेंद्र किशोर जी को अभिवादन के बाद आने का प्रयोजन बताया। उन्होंने मेरे स्वाभिमान को लेकर अपनी दुविधा को व्यक्त करते हुए कहा कि यह समस्या नहीं, सरकार के गाल पर तमाचा है। इस मुद्दे पर उनसे मिलने से नहीं रोकूंगा, मगर सच यही है कि हम सभी के लिए यह एक सामाजिक चुनौती है। मैं मन ही मन कुढ़े हुए अरूण रंजन जी मिला। देखकर मुस्कुरा दिए और कहा कि झगड़ा करने आए हो ? मगर मैंने तुम्हारे हितैषियों से इस बारे में जानकारी लेने के बाद ही यह विशेष संपादकीय को पहले पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। फिर चाय पीने के लिए एक कप बढ़ा दिया।
मैंने उनसे कहा कि मेरी तकलीफ कम हो गईं हैं।आप अग्रज हैं,मेरी मन:स्थिति से आप अवगत हैं।
फिर इस घटना के बाद यदाकदा मुलाकात होती तो मेरी किसी प्रकाशित समाचारकथा को बतरस के अंदाज में कहते कि मौलिक खोज खबर है। ऐसे स्तरीय समाचारकथा की प्रतीक्षा सभी संपादक करते हैं। फिर कुछ वर्ष बाद ओझल हो गये और बाद में जानकारी मिली कि दिल्ली में कार्यरत हैं।
कंधे से उनकी हथेली का भार भले ना हो, मगर बेवजह टोका-टोकी करने वाले एक सहृदय वरिष्ठ और अग्रज की तरह रिश्ता निभानेवाले की अनुपस्थिति अखरना सहज है।
सादर स्मृतांजलि!