
इमरजेंसी की याद तो ठीक है लेकिन अघोषित इमरजेंसी की अनदेखी खटकती है। 50 साल बाद भी सवाल वही है, लोकतंत्र या सिर्फ विकल्पहीनता? इमरजेंसी की 50वीं सालगिरह पर इंडियन एक्सप्रेस ने इतिहास का सामना वर्तमान से तो नहीं ही किया है। उसका पक्षपात जगजाहिर है। कुल मिलाकर, यादें चुनिंदा हैं और खामोशी सिस्टमैटिक। साफ है कि इमरजेंसी में एक्सप्रेस को जो कहने की जो कहने की छूट थी, अब सुनने (बताने) की भी चिन्ता नहीं है। सवाल वही है, इमरजेंसी की याद जैसी हो – आज क्या बदला है? घोषित बनाम अघोषित इमरजेंसी के इस द्वंद में पुलिस अगर भीड़ जैसी कार्रवाई करे तो खबर नहीं बनी, जांच के आदेश खबर है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोल कर सुर्खियां बटोर रहे हैं। हेडलाइन मैनेजमेंट अपनी जगह है।
एक पाठक के रूप में मेरा मानना है कि इमरजेंसी घोषित होते ही एक्सप्रेस ने उसे मुद्दा बना दिया था। कश्मीर (अनुच्छेद 370) अभी तक मुद्दा नहीं है। राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग में मीडिया (सरकार और सरकारी पार्टी भी) खुल कर चुनाव आयोग के साथ है। आज की खबरें लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही का क्षरण भी बताती हैं। सुप्रीम कोर्ट में दहेज हत्या के आरोपी को बचाने के तर्क और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति जैसा संवैधानिक मामला पड़ा होना सवालों के घेरे में है, चर्चा में नहीं। रेल किराये में वृद्धि और मतदाता सूची में नाम के लिए जन्म स्थान का प्रमाणपत्र देने जैसे नियम की घोषणा आज होना कम दिलचस्प नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस से तो पूछा ही जा सकता है, सब इमरजेंसी की याद में, या माजरा कुछ और है?
संजय कुमार सिंह
आज 25 जून 2025 को इमरजेंसी की 50वीं सालगिरह है। इस मौके पर इंडियन एक्सप्रेस ने न सिर्फ 50 साल पहले के दिन को याद किया है बल्कि पहले पन्ने पर उन दिनों की महिला रिपोर्टरों, कूमी कपूर और नीरजा चौधरी को भी मौका दिया है। दोनों ने क्रम से, इमरजेंसी और इंदिरा गांधी पर लिखा है। उस जमाने की दो श्वेत-श्याम फोटो के साथ अमित शाह की यह सलाह भी खबर के रूप में है, “इमरजेंसी की यादों, लोकतंत्र को चुनौती को जीवंत रखा जाये”। दो कॉलम की इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, आज प्रधानमंत्री की पुस्तक का लोकार्पण होगा। इसमें बताया गया है कि इस विषय पर प्रधानमंत्री की लिखी पुस्तक का लोकार्पण आज किया जायेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इमरजेंसी का विरोध करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने की खबरों में आज कश्मीर की वह खबर नहीं है जो अघोषित इमरजेंसी में कश्मीर की पुलिस ने कर दिया और इमरजेंसी में शायद हुआ हो। आप जानते हैं कि जम्मू व कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश है और आज यह खबर सिर्फ द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। खबर के अनुसार, जम्मू में पुलिस और भीड़ के बीच की लाइन धुंधली हुई। दूसरे शब्दों में इसका मतलब हुआ, जम्मू में पुलिस ने वही किया जो भीड़ करती है। अब यह पुरानी बात हो गई कि अघोषित इमरजेंसी में भीड़ की मनमानी बेहिसाब है और इसमें घर में घुस कर फ्रीज में रखा मांस देखना, पीट-पीट कर मार देना और मुंह पर पेशाब कर देना शामिल है। गोली मारो …. को जैसे नारे लगवाने वाला मंत्री बन चुका है। ऐसे में जम्मू की इस खबर को छोड़कर इमरजेंसी को याद करना असल में अघोषित इमरजेंसी का समर्थन है। पर वह अलग मुद्दा है। मुझे सिर्फ यह रेखांकित करना था इमरजेंसी को याद करने के नाम पर इंडियन एक्सप्रेस सत्ता के विरोध या जनहित अपना घोषित उद्देश्य भी भूल गया है।
कहने की जरूरत नहीं है कि कश्मीर नरेन्द्र मोदी की सरकार से प्रभावित राज्यों में है। अनुच्छेद 370 हटाने, राज्य को दो हिस्सों में बांट कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिये जाने और पांच साल चुनाव न होने, चुनाव में डबल इंजन की सरकार न बनने के बाद वहां की रिपोर्टिंग दुनिया भर के पाठकों की दिलचस्पी का विषय हो सकता है। बना दिया जाना चाहिये था। पर नियममित पाठक होने के बाद भी मुझे इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर श्रीनगर डेटलाइन की खबरें याद नहीं हैं और बाईलाइन रही होती तो मैं संवाददाता का नाम भी जानता। इंडियन एक्सप्रेस ने इमरजेंसी की याद में पन्ने भरा है। टेलीग्राफ के पास अपनी याद भले न हो (इसकी शुरुआत बाद में हुई है) प्रधानमंत्री की किताब और उसके अंश से जगह भरने के साथ-साथ इमरजेंसी को याद करने की देशभक्ति दिखा ही सकता था। इंडियन एक्सप्रेस ने याद दिलाया है कि इमरजेंसी में उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री (अब कौन है, मुझे पता नहीं था। गूगल से पता चला कि प्रकाश जावेडकर 2019 से ही हैं) विद्या चरण शुक्ल इंडियन एक्सप्रेस पर नियंत्रण करना चाहते थे। पर संपादक मालिक गोयनका ने मुकाबला किया।
इंडियन एक्सप्रेस में आज अंदर भी ‘इमरजेंसी’ की खबरों का एक पन्ना है। मैं अंदर के पन्नों में जम्मू के पुलिसिया रवैये की खबर ढूंढ़ रहा था। यहां टेलीग्राफ वाली फोटो और खबर तो नहीं मिली जो मिली वह यह कि जांच के आदेश दे दिये गये हैं। ऐसे मामलों में कैसी जांच होती है उसकी चर्चा अभी यहां करने की जरूरत नहीं है। एक्सप्रेस ने इस खबर के साथ एक खबर छापी है जो बताती है कि अघोषित इमरजेंसी और जबरदस्त हिन्दुत्व या संतुष्टीकरण के जमाने में लोगों की सोच और अपेक्षा क्या-क्या हो गई है। इस खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के दोषी से कहा है कि ऑपरेशन सिन्दूर में शामिल होने का मतलब अपराध की छूट नहीं है। अमर उजाला ने आज इस खबर को पहले पन्ने पर बॉटम बनाया है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की दलील दी जा रही है और ऐसे तर्कों पर राहत की अपेक्षा की जा रही है वह भी दहेज हत्या के मामले में, यह समाज की स्थिति बताता है जो बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नारे का विस्तार या सच हो सकता है। दूसरी ओर, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाली टीम को बदल दिये जाने से संबंधित मामले की सुनवाई नहीं हो पा रही है उसकी खबर भी नहीं होती है और ऐसे तर्क न सिर्फ सुने जा रहे हैं, उसकी खबर भी छप रही है। एक लोकप्रिय हिन्दी अखबार में पहले पन्ने पर जिसमें इमरजेंसी की कोई खबर नहीं है। प्रधानमंत्री की किताब की भी नहीं।
पहले पन्ने की खबरों की बात करूं तो आज द हिन्दू में सिंगल कॉलम की एक खबर है – चुनाव आयोग ने कहा, राहुल गांधी को मतदाता सूची के मसले पर वार्ता के लिए बुलाया था। आप जानते हैं कि राहुल गांधी ने हाल में चुनाव की चोरी पर भिन्न अखबारों में लेख लिखा था तब चुनाव आयोग ने क्या कहा था। और सच्चाई क्या है। मैंने यहां भी लिखा था। मुझे लगता है कि अब जब आयोग को समझ में आ गया है कि मामला ऐसे नहीं निपटेगा और राहुल गांधी को सुनने तथा उनपर यकीन करने वाले लोग कम नहीं हैं तो यह पैंतरा चला गया है। द हिन्दू ने खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर छापा है उसमें कहा गया है, हम समझते हैं कि चुनाव संचालन से संबंधित कोई भी मामला (कांग्रेस उम्मीदवारों द्वारा) अभी तक सक्षम अदालत में याचिका दायर करके उठा दिया गया होगा। हालांकि, आपके पास अभी भी कोई मुद्दा है तो आप हमें लिख सकते हैं, सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए आयोग आपसे आपस में सुविधाजनक तारीख और समय पर मिलने का भी इच्छुक है। चुनाव आयोग की इस सूचना पर राहुल गांधी और कांग्रेस ने जो कहा है वह द हिन्दू में पहले पन्ने पर नहीं है। लेकिन सबको पता है कि राहुल गांधी मशीन से पढ़ने योग्य (महाराष्ट्र की) मतदाता सूची और और मतदान से संबंधित वीडियो रिकार्डिंग की मांग कर रहे हैं और हाल में नियम बन गया है कि मुकदमा न हो तो ये रिकार्ड 45 दिन से ज्यादा रखे ही नहीं जायेंगे और चूंकि कांग्रेस के उम्मीदवारों ने मुकदमा किया नहीं है इसलिए आयोग कुछ भी देने से मना कर सकता है और राहुल गांधी को बुलाकर यही कहना चाहता है। चुनाव हारने के बाद मुकदमा नहीं करने के अलग कारण हो सकते हैं और मुकदमा नहीं करने का मतलब यह नहीं है कि शिकायत नहीं है। वैसे भी, मुकदमे से कौन सा मामला हल होता रहा है या चुनाव आयोग ने सारे आदेश मान ही लिये हैं – यह सब अलग मुद्दा है और मेरी किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली का विषय है। जब इसे मैं समझ सकता हूं तो राहुल गांधी के नहीं समझने की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन अखबारों को खबरों से नहीं लगता है कि आप यह सब समझें। वे (ज्यादातर) यही चाहते हैं कि आप वही जानें-समझें जो चुनाव आयोग कह रहा है।

जहां तक देश में चल रही व्यवस्था का मामला है, आज देशबन्धु अखबार में एक खबर है, जमानत के बाद भी रिहा न करने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज। यह कहीं दूर-देहात का मामला नहीं है। गाजियाबाद जिला जेल का मामला है और जेल अधीक्षक को तलब किया गया है। आज छपी खबरों के अनुसार, राहुल गांधी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या केवल 5 महीनों में 8 प्रतिशत बढ़ गई। उन्होंने दावा किया कि कुछ बूथों पर 20-50 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई। बीएलओ ने अज्ञात व्यक्तियों द्वारा वोट डालने की सूचना दी। मीडिया ने बिना किसी सत्यापित पते वाले हजारों मतदाताओं को उजागर किया। और ईसी? चुप – या मिलीभगत! ये अलग-अलग गड़बड़ियां नहीं हैं। ये वोट की चोरी है। छिपाना ही स्वीकारोक्ति है। राहुल गांधी ने कहा कि इसलिए हम मशीन रीडेबल डिजिटल मतदाता सूची और सीसीटीवी फुटेज की मांग कर रहे हैं। इसके बावजूद अमर उजाला की आज की खबर का शीर्षक है, चुनाव में कोई धांधली नहीं, चर्चा से क्यों बच रहे राहुल : आयोग। इसके साथ एक शीर्षक है, राहुल ने फिर लगाया महाराष्ट्र में गड़बड़ी का आरोप। आप जानते हैं कि मामला चुनाव आयोग का है और जवाब चुनाव आयोग को ही देना चाहिये लेकिन ऐसे सवालों से और राहुल गांधी की इस रणनीति से भाजपा भी परेशान है। इसीलिए तमाम प्रचारक चुनाव आयोग के पक्ष में प्रचार और खबर कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इमरजेंसी की बरसी पर, अघोषित इमरजेंसी में चुनाव आयोग की दलील भी पढ़ने, सुनने समझने लायक है और आज उसे प्रमुखता से छापा जाना चाहिये था।
दूसरी ओर, लाइव हिन्दुस्तान का शीर्षक है, ईसी के बुलावे के बीच राहुल ने फिर अलापा वोट चोरी का राग, डिजिटल लिस्ट और सीसीटीवी फुटेज की मांग। यह शीर्षक अखबार का नहीं, तो लगाने वाले का ही पूर्वग्रह बताता ही है। बगैर सदस्यता लिये पढ़ने के लिए अनुपलब्ध न्यूलॉन्ड्री डॉट कॉम का शीर्षक है, राहुल ने गड़बड़ी का आरोप लगाया, फडणवीस ने कहा ‘झूठ’, लेकिन क्या चुनाव आयोग अपनी विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक करेगा? उपशीर्षक या शीर्षक के नीचे लिखा है, महाराष्ट्र और हरियाणा के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने कहा कि मतदाता सूची सभी मान्यता प्राप्त दलों के साथ पारदर्शी तरीके से साझा की गई है। खबर मैं पढ़ नहीं पाया इसलिए पता नहीं चला पर इसके साथ यह बताना जरूरी है कि राहुल गांधी मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची की मांग कर रहे हैं और आयोग का तर्क पुराना हो चुका है। हिन्दी सामना डॉट कॉम का शीर्षक है, वोट चोरी के आरोप के बाद बैकफुट पर चुनाव आयोग! …आइए बैठकर बात करते हैं …राहुल गांधी को भेजा निमंत्रण जबकि जागरण डॉट कॉम ने लिखा है, राहुल गांधी का आरोप- महाराष्ट्र चुनाव में हुई थी वोट की चोरी, डिजिटल वोटर लिस्ट और सीसीटीवी फुटेज दे आयोग। राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव आयोग को लीपापोती करने की बजाय मशीन से पढ़ने योग्य डिजिटल मतदाता सूची तथा सीसीटीवी फुटेज दे।
चुनाव आयोग के पक्ष में कुछ तर्क
- आयोग के सूत्रों ने बताया कि फुटेज साझा करने से मतदाताओं की पहचान आसानी से हो सकती है, जिससे उन्हें दबाव, भेदभाव या धमकी का सामना करना पड़ सकता है। ईसीआई ने यह भी कहा कि सीसीटीवी फुटेज केवल आंतरिक मैनेजमेंट के लिए है। ईसीआई ने अपने बचाव में कहा कि फुटेज साझा करने की मांग लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा के नाम पर की जा रही है लेकिन यह वास्तव में मतदाताओं के हितों के खिलाफ है। इसका उद्देश्य संदिग्ध है। (लाइवहिन्दुस्तान डॉट कॉम)
- इलेक्शन कमीशन ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लेटर लिखा है। इसमें महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में धांधली के उनके आरोपों पर चर्चा के लिए बुलाया है। एएनआई के मुताबिक, लेटर 12 जून को मेल और राहुल के आवास पर भी भेजा गया है। ईसी ने लेटर में लिखा- भारत की संसद के पारित इलेक्टोरल लॉ, उसके नियमों और समय-समय पर चुनाव आयोग के निर्देशों के जरिए बहुत सख्ती से देश में चुनाव आयोजित कराए जाते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रक्रिया विधानसभा क्षेत्र स्तर पर सेंट्रलाइज्ड आयोजित की जाती है। भारत निर्वाचन आयोग सचिवालय ने कहा, “पिछले साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों पर एक अखबार में प्रकाशित आपके लेख के मद्देनजर मुझे यह बताने का निर्देश दिया गया है कि नवंबर 2024 में विधानसभा चुनावों के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) की ओर से इसी तरह के मुद्दे उठाए गए थे। आयोग ने 24 दिसंबर 2024 को आईएनसी को एक विस्तृत जवाब दिया था, जिसकी प्रति ईसीआई की वेबसाइट पर उपलब्ध है।” (डीडीन्यूजडॉट जीओवी डॉट इन)
- चुनाव आयोग ने 2024 के महाराष्ट्र चुनावों में धांधली के उनके आरोपों पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को औपचारिक रूप से पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि सभी चुनाव संसद द्वारा पारित कानूनों और नियमों के अनुसार सख्ती से आयोजित किए जाते हैं । इसने इस बात पर भी जोर दिया कि सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया में हजारों कार्मिक शामिल होते हैं, जिनमें राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त बूथ स्तरीय एजेंट भी शामिल होते हैं। (द हिन्दू डॉट कॉम, कंप्यूटर अनुवाद)
दि एशियन एज में आज एक खबर प्रमुखता से है, भारत पर हमला करने वाले आतंकियों के खिलाफ कोई भी शरण सुरक्षित नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दावा है और इस तथ्य के बावजूद है कि आतंकवाद की आरोपी को उनकी पार्टी सांसद बना चुकी है, उनके दस साल के शासन में मामले का क्या हुआ पता नहीं, समझौता एक्सप्रेस में विस्फोट के आरोपियों को सजा नहीं हुई, अदालत ने पुलिस की जांच पर उंगली उठाई थी, मुंबई हमले के एक आरोपी को बिरयानी खिलाने की कहानी प्रचारित हुई और जिसने यह कहानी गढ़ी थी उसे पार्टी ने चुनाव लड़ने के लिए टिक दिया। यही नहीं, पुलवामा के आरोपियों का पता नहीं चला, घुस कर मारने में 300 आतंकी ढेर करने का दावा किया गया था लेकिन पांच साल बाद ही पहलगाम हो गया। उसके आतंकी अभी तक पकड़े नहीं गये। खबर है कि एनआईए ने गलत स्केच जारी कर दिया था और प्रचार किया गया कि शरण देने वाले दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि उनसे जो सेवा या सहायता ली गई वह डराकर और जबरदस्ती ली गई है। ऐसे में देश के प्रधानमंत्री के दावे कितनी बड़ी खबर हैं और कैसे छापना ठीक होगा यह अनुसंधान और पीएचडी दोनों का विषय हो सकता है।
आज अखबारों ने यह साबित किया है कि घोषित इमरजेंसी का विरोध भले सही और जरूरी हो अघोषित इमरजेंसी का विरोध नहीं हो रहा है और यह सही है या गलत इसकी चर्चा भी नहीं है। अखबारों, मीडिया या समाज तो छोड़िये सरकारी माध्यमों में भी नहीं है। आज के अखबारों में एक खबर एक जुलाई से रेल किराया बढ़ाने की तैयारी में रेलवे और तत्काल टिकट के लिए आधार जरूरी होगा जैसी खबर भी है। इमरजेंसी की बरसी पर ये जन विरोधी खबरें भी पहले पन्ने पर हो सकती थीं। नवोदय टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में है। द हिन्दू में यह दो कॉलम की सेकेंड लीड है। पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन वाले अमर उजाला में आज दो पहले पन्ने हैं। यह खबर दूसरे पहले पन्ने की लीड है लेकिन पहले पन्ने की एक खबर नवोदय टाइम्स के अलावा दूसरे किसी और अखबार में इतनी बड़ी नहीं है। इसका शीर्षक है, आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ (भारद्वाज) और सत्येन्द्र (जैन) के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच होगी। पहले पन्ने पर अखबार ने एक और एक्सक्लूसिव खबर छापी है। चार लाइन की इस खबर का शीर्षक है, विवाद सुलझाने में भूमिका निभाने के लिए तैयार भारत। पहलगाम हमले के बाद भारत जब ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर युद्ध तक की कार्रवाई कर और झेल चुका है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जब युद्ध विराम कराने का दावा करते रहे हैं तब नरेन्द्र मोदी वार्ता व कूटनीति की जरूरत बता रहे हैं और यह सब छप भी रहा है। ना यु्द्ध के निर्णय पर सवाल ना युद्धविराम पर और अब दुनिया को ज्ञान देने में भी आगे। सरकार चाहे ऐसी न हो, अखबारों ने यही छवि बनाई है। और ऐसी ही है तो निश्चित रूप से अखबार अच्छा काम कर रहे हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज छपी एक खबर के अनुसार, बिहार से शुरुआत के बाद मतदाता जन्म स्थान का सबूत भी देंगे। खबर में बताया गया है कि इसका मकसद अवैध घुसपैठियों को मतदाता सूची में स्थान नहीं देना है। वैसे तो मतदाता सूची में नाम के लिए यह शर्त अपने आप में बेतुका है पर सरकार की बेतुकी प्राथमिकताओं को भी रेखांकित करता है। अगर देश में अवैध घुसपैठिये हैं तो उन्हें बाहर किया जाना चाहिये। सरकार का काम उन्हें सीमा पर रोकना और वापस करना होना चाहिये। चुनाव के समय यह इस सरकार का मुद्दा होता भी है लेकिन उन्हें रोकने की बजाय मतदाता सूची में नाम के लिए ऐसी शर्तें बनाई जा रही हैं कि मतदाता सूची में नाम होना ही मुश्किल हो जाये। वैसे भी, यह बेकार की कोशिश है और एक देश एक टैक्स, एक देश एक राशन कार्ड, एक देश एक चुनाव जैसे नारे वाले देश में एक देश एक पहचान क्यों नहीं होना चाहिये? इससे मतदाता सूची बनाने का पूरा काम गैर जरूरी हो जायेगा, मतदाता सूची में नाम न होने की शिकायत भी खत्म हो जायेगी। फर्जी वोट भी नहीं बनेंगे और आधार से वोट किये ही जा सकते हैं। सच्चाई तो यह है कि 18 साल से कम के बच्चों का भी आधार होता है। इसलिए अलग से मतदाता सूची की जरूरत ही नहीं है। मतदाता सूची में नाम की शर्तें अभी भी कम नहीं हैं और मामला उनके पालन का है। शिकायत तो यह भी है कि नाम हटाने में भी नियमों का पालन नहीं हो रहा है और खबर यह कि सरकार मतदाता सूची में नाम लिखवाना आम आदमी के लिए और मुश्किल कर रही है। जिन्हें आसानी और सुविधा मिल रही है उसपर रोक की चिन्ता भी नजर नहीं आई है। पहले की खबरों में कहा गया था कि घर-घर जांच होगी और आज हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर कहती है कि अहम संशोधन या रिविजन होगा। दिल्ली के साथ महाराष्ट्र की मतदाता सूची में फर्जी नामों के आरोपों के मद्देनजर भाजपा सरकार का यह प्रयास आम लोगों को तो मतदाता बनने से रोकेगा पर फर्जी मतदाता न हों इसके लिए कुछ होता नहीं दिख रहा है। ऊपर की खबरों से साफ है कि अखबारों में भी उसकी चिन्ता नहीं ही है।


