विष्णु नागर-
मैं 54 साल से दिल्ली में हूं (चार- छह साल इधर- उधर भटककर फिर यहीं आ गया)। इस बीच कम से कम सौ पुस्तक विमोचन समारोहों में तो मैं सम्मिलित हुआ ही होऊंगा। (अगर इसमें पुस्तक मेलों में ‘पकड़वा विमोचन समारोहों’ को जोड़ दें तो यह संख्या पांच सौ तक पहुंच सकती है)।
हर पुस्तक के विमोचन अथवा लोकार्पण समारोह में वक्तागण विमोचित/लोकार्पित पुस्तक की प्रशस्ति के गीत इतने उच्च और मधुर स्वर में गाते हैं कि लगता है कि आज हम इस सदी की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक के विमोचन समारोह के गवाह होने जा रहे हैं। इतिहास के पन्नों में कभी इसका जिक्र होगा तो हमारे बच्चे और उनके बच्चे और उनके भी बच्चों के बच्चे कहेंगे कि हमारे पिता जी, दादा जी, परदादा जी इसके गवाह थे।
वातावरण कुछ ऐसा बनता है कि आज ही इसे नहीं खरीदा तो कल यह मिले, न मिले! आज ही लेखक के हस्ताक्षर करवा लिये तो करवा लिये, कल इसे भारतीय ज्ञानपीठ या नोबेल पुरस्कार मिल गया तो फिर ये हाथ आने वाला नहीं!
कहते हैं कि बोलने से जीभ नहीं कटती, लिखने से हाथ कट जाते हैं इसलिए जो चाहे, बोल दो। सावधानी इतनी बरतो कि इस पर लिखो मत। नामवर जी आज इस दुनिया में नहीं हैं मगर वे इसके आचार्य माने जाते थे और अब तो इस आचार्यत्व का इतना विकेंद्रीकरण हो चुका है कि ऐसे आचार्यों से हिंदी साहित्य की दुनिया भर चुकी है।
किसी को भी प्रेमचंद बता दो, किसी को भी मुक्तिबोध, किसी को भी मीरा और किसी को भी कबीर! ऐसा कहने से इन बड़े लेखकों का कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि ये स्वर्गीय हो चुके हैं और इनकी मान्यता इतनी अधिक है कि इन्हें गिरा कर भी नहीं गिराया जा सकता। वक्ता का भी कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि यह उसका सामयिक कर्तव्य था, जिसका उसने ‘ईमानदारी’ से निर्वाह किया।
इसी उद्देश्य से उसे मंच पर बैठाया भी गया था। हां विमोचित पुस्तक के लेखक को मुगालता हो सकता है और ऐसा होना भी साहित्य के हित में है। तो कुल मिलाकर विमोचन/ लोकार्पण समारोहों का होना साहित्य के लिए लाभदायक है और ये होते रहने चाहिए।
(किसी विमोचन समारोह की खबर पढ़ने के बाद)


