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आज के अखबार : नहीं बताते कि जीएसटी वाकई गब्बर सिंह टैक्स हो गया है! आइये देखें-समझें कैसे?

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों की सबसे बड़ी खबर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) बैठक के साझा बयान में पहलगाम का जिक्र नहीं होने और इस कारण भारत यानी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का दस्तखत नहीं करना है। बैठक में शामिल होकर साझा बयान पर दस्तखत नहीं करने का मतलब साझा बयान से असहमत होना है और इसका कारण है पाकिस्तान से होने वाली आतंकी गतिविधियों का मुद्दा न होना, बयान में पहलगाम का उल्लेख न होना और बलूचिस्तान का होना। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर भारत सरकार के कथित विरोध या दस्तखत नहीं करने का प्रचार तो कर रही है पर यह भी बता रही है कि सदस्य देशों के बीच सुरक्षा, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से बना यह संगठन अपने एक सदस्य भारत की तरह नहीं सोचता है।  खबरों के अनुसार साझा बयान में पहलगाम का जिक्र तो नहीं है लेकिन बलूचिस्तान का है। हालांकि, अमर उजाला ने लिखा है – बयान में पहलगाम की जगह बलूचिस्तान का था उल्लेख। अगर ऐसा ही होता तो यह एक भूल होगी और दस्तखत नहीं करने की जगह उसे सुधारने के लिए कहा जाना चाहिये था। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है पहलगाम छोड़ दिया गया : भारत ने एससीओ बयान पर दस्तखत करने से मना कर दिया। इस मामले में टाइम्स ऑफ इंडिया का उपशीर्षक ज्यादा स्पष्ट है, …. जिसमें पहलगाम को छोड़ दिया गया पर बलूचिस्तान शामिल है

आज यह खबर मेरे आठ अखबारों में से तीन, अमर उजाला द टेलीग्राफ और द हिन्दू में लीड नहीं है। द टेलीग्राफ की लीड अमित शाह पर है जबकि द हिन्दू की लीड वही है जो अमर उजाला की। द टेलीग्राफ की लीड पर आने से पहले एससीओ और आंतकवाद वाली खबर की चर्चा कर लूं। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, भारत ने आतंकवाद पर पाकिस्तान-चीन की सोच  को आगे बढ़ाने की कोशिश को नाकाम किया। उपशीर्षक में बताया गया है कि एससीओ के साझा बयान पर दस्तखत करने से मना किया….। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका कारण, नाम पूछकर मारा, पैंट उतरवाकर पुष्टि की, जाओ मोदी से बता देना का प्रचार और फिर ऑपरेशन सिन्दूर नाम से मामला राजनीतिक ज्यादा आतंकी, कम लगता है। आतंकी वारदातों पर सरकार वाकई गंभीर होती तो पुलवामा पर राजनीति के बाद इसे पूरी तरह राजनीतिक नहीं बनाते। वैसे भी, एक तीर से दो शिकार हमेशा नहीं हो पाता है। भारत ने आतंकी हमले का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर ली है। संभव है, हो जाये या नहीं भी हो पर उसी वारदात से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लाभ मिलना मुश्किल तो है ही। लिहाजा, आज ही नवोदय टाइम्स में जम्मू डेटलाइन से खबर है, जैश आतंकी ढेर, तीन घिरे। खबर के अनुसार एक वन क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने एक आतंकवादी को मार गिराया जब तीन अन्य घिरे हुए हुए हैं।  

एससीओ में जो हुआ उसपर वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा है, “हम किसी के न रहे, कोई हमारा न रहा – नरेन्द्र मोदी के 11 साल के शासन के बाद भारत की विदेश नीति का यही हाल है। एससीओ की रक्षा मंत्रियों की बैठक के बाद आतंकवाद पर साझे बयान में पहलगाम का जिक्र तक नहीं आया जबकि पाकिस्तान बलूचिस्तान को शामिल कराने में कामयाब रहा। रक्षा मंत्री ऐसे प्रस्ताव पर कैसे साइन कर सकते थे, सो नहीं किया। विकल्प ही क्या था। एससीओ में रूस, ईरान और बेलारूस भी सदस्य हैं उन्होंने भी पहलगाम पर साथ नहीं दिया! मोदी के पहले की सरकारें वैश्विक बिरादरी को ये समझने में कामयाब थी कि भारत आतंकवाद का विक्टिम है जिसकी जड़ें पाकिस्तान में हैं। विदेश नीति राष्ट्रपतियों के साथ फोटो खिंचवा कर गोदी मीडिया में “डंका बज रहा है” चलवाना नहीं है। ठोस काम और सूझबूझ से विदेश नीति बनती है।” जो बनी है उसे दुनिया देख और समझ रही है। भले, भारत में सरकारी प्रचार ही चले। एससीओ के साझे बयान की यह खबर आज देशबन्धु में भी लीड है। दूसरी बड़ी खबर अमर उजाला और हिन्दू की लीड है जबकि तीसरी सबसे बड़ी खबर द टेलीग्राफ में लीड है।

इसका मुख्य भाव है, अमित शाह ने अंग्रेजी पर अपने पिछले बयान की लीपापोती कीइमरान अहमद सिद्दीक की खबर इस प्रकार है – केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कहा कि देश में किसी भी विदेशी भाषा का विरोध नहीं किया जाना चाहिये। ऐसा कहकर वे हाल में अपने कहे, भारत में अंग्रेजी बोलने वालों को जल्दी ही शर्म आयेगी से हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर रहे थे। अमित शाह के ऐसा कहने के बाद शिक्षाविदों, राजनीतिक विरोधियों ने उनका खूब मजाक बनाया है। अखबार ने बताया है कि इस लीपा पोती में भी वे अपनी वास्तविक सोच को नहीं छिपा पाये और आंशिक तौर पर वही कहा जो पहले कह चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत के लोग जब तक अपनी भाषा पर गर्व नहीं करेंगे या उसे नहीं बोलेंगे तब तक वे अपनी गुलाम मानसिकता से आजाद नहीं हो सकते हैं। आज यह खबर दि एशियन एज में भी पहले पन्ने है। लेकिन वैसे नहीं जैसे टेलीग्राफ में है। जो भी हो, इन तीन खबरों को मिली प्राथमिकता से साफ है कि ज्यादातर अखबार सरकार के समर्थन में खबरें छापते हैं। न सिर्फ खबरें इस तरह लिखी जाती हैं कि सरकार का प्रचार करें बल्कि खिलाफ हो सकने वाली खबरों की उपेक्षा की जाती है। ऐसा रोज होता है, ज्यादातर अखबारों में भिन्न खबरों के साथ होता है। मैं यहां वैसे ही मामले पेश करता हूं और इस क्रम में आज जीएसटी की खबर पढ़कर लगा कि वाकई यह गब्बर सिंह टैक्स हो गया है। अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि मैं आज जो लिख रहा हूं वह मीडिया ने अभी तक नहीं देखा-कहा। उद्योग व्यापार वालों ने इसे मुद्दा नहीं बनाया तो क्यों? और क्या इसका कारण डर है? सरकारी दबाव और दलबदल के कारण जब सत्तारूढ़ दल का नाम वाशिंग मशीन पार्टी हो गया है तो आप समझ सकते हैं कि डर होगा तो कैसा और नहीं होने की संभावना कितनी कम है। अखबार में काम करने का मेरा अनुभव यही है कि पहले प्रभावित लोग इस तरह की खबरें छपवाने के लिए परेशान रहते थे और तमाम दस्तावेज देकर आग्रह करते थे। यह मिलकर या बिना मिले भी होता था। अरुण शौरी ने इस बारे में लिखा भी था। अघोषित इमरजेंसी के इस दौर में अब ऐसी खबरें छापने वालों के यहां ईडी का छापा पड़ जाता है या फिर लिखने वाले को गिरफ्तार कर लिया जाता है। पहले रिपोर्टर से श्रोत नहीं पूछा जा सकता था अब जेल जाने के डर से रिपोर्टर भी क्या करे और खबरों के लिए रिपोर्टर को परेशान किये जाने के ढेरों मामले हैं। अब तो वकीलों को भी सलाह देने के लिए नोटिस भेजे जाने का उदाहरण है। भले बाद में वापस ले लिया गया।

इतना ही नहीं, इलेक्टोरल बांड से संबंधित जो विवरण सार्वजनिक हुए उनके आधार पर इस बात की आशंका जताई गई थी कि यह वसूली का मामला हो सकता है। शेयर खरीदने की सलाह देकर निवेशकों को घाटा पहुंचाने का आरोप है और इस तरह के नोटिस तथा उसकी खबर से शेयरधारकों को नुकसान हो रहा है। एनडीटीवी (और कई अन्य) के खिलाफ जांच और फिर कुछ नहीं मिलना या संबंधित कंपनी पर अदाणी का कब्जा हो जाना, टैक्स नोटिस और जांच के मामले को संदिग्ध बनाता है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह हम नहीं पूछ सकते हैं कि 10 साल में क्या हुआ। क्योंकि जो हुआ वह सार्वजनिक है और यह भी कि समर्थक फिर भी नहीं समझे या अभी भी समर्थन कर रहे हैं। हालांकि, वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। मेरी चिन्ता खबर और उसकी प्रस्तुति है। ऐसे में जीएसटी नोटिस की खबरें जीएसटी को एक अच्छी टैक्स प्रणाली कहने के दावे को चुनौती की तरह है। इससे संबंधित सवाल मीडिया का काम है पर मीडिया खबर छाप कर भूल जाता है। और जो खबर छपती है वह सरकार का प्रचार और उद्यमी या व्यवसायी को बदनाम करती ही लगती है। कोई सवाल नहीं।

ऐसे में आज अमर उजाला में सिंगल कॉलम की खबर है, न्यू इंडिया ऐश्योरेंस को 2,298 करोड़ का जीएसटी नोटिस। यह 2018 से 2023 के लिए है और जाहिर है कि 2018 का मामला 2019-20 में पकड़ लिया जाना चाहिये था और अब एक साथ इतनी अवधि का नोटिस भेजने का मामला अगर धमकाना और परेशान करना नहीं है तो अपना काम समय पर, सही ढंग से नहीं करने के कारण ही है। अगर किसी भी कंपनी को इस तरह पुरानी वसूली के नोटिस जायेंगे तो कंपनी काम करेगी या नोटिस का जवाब देगी। इतनी बड़ी राशि अगर देनी पड़ी तो व्यवसाय चौपट हो जायेगा। यह सब किसी भी तरह से ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का मामला नहीं हो सकता है जबकि सरकार और उसका गोदी मीडिया इसका प्रचार करता रहता है। जब समय पर रिटर्न फाइल करना जरूरी है, नहीं करने पर जुर्माना लगता है, सरकारी विभाग रिटर्न की जांच करते हैं (और समय पर करना भी चाहिये) जीएसटी रिफंड भी होताा है तो हर साल का हिसाब उसी साल या अगले एक साल में क्यों नहीं होना चाहिये। अगर सबका संभव नहीं है तो कम कारोबार वालों को छोड़कर बड़े कारोबारियों का मामला तो हर साल निपटा ही दिया जाना चाहिये और काम करने वाली सरकार जब पांच-छह साल बाद नोटस भेजे तो साफ है कि कथनी और करनी में अंतर है।

मुझे नहीं लगता है कि जीएसटी नहीं था और भाजपा की सरकार नहीं थी तो पुराने टैक्स की वसूली के इतने नोटिस जाते थे। इससे यह प्रचार तो होता है कि सरकार अच्छा काम कर रही है पर समय से नहीं कर रही है और कहीं वसूली की कोशिश तो नहीं है, इसे कौन देखेगा या देखा जा रहा है। यह इसलिये भी जरूरी है कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इसके बिना संभव नहीं है। यह मामला सरकारी कंपनी का है और जब सरकारी कंपनियां को राहत नहीं है तो छोटी-मोटी का क्या हाल होगा, समझना मुश्किल नहीं है। हाल में टाटा स्टील की को ऐसे ही नोटिस की खबर थी। उससे पहले भी कई मामले थे। यह सब तब जब आज ही हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष में मार्च 2026 तक ₹95,000 करोड़ का अधिशेष हो सकता है। आधिकारिक अनुमानों का हवाला देते हुए जानकार लोगों ने कहा कि राज्यों को बकाया पूरा भुगतान करने और सभी ऋण देनदारियों को चुकाने के बाद भी, 31 मार्च, 2026 को अपने विस्तारित कार्यकाल के अंत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) क्षतिपूर्ति कोष में लगभग ₹95,000 करोड़ का अधिशेष हो सकता है। जीएसटी परिषद अपनी अगली बैठक में इस मामले पर विचार कर सकती है, जो जल्द ही होने की उम्मीद है, और यह तय कर सकती है कि क्षतिपूर्ति उपकर के रूप में एकत्र की गई इस अतिरिक्त राशि का उपयोग कैसे किया जाएगा। उपकर नियमित करों के अलावा एक विशिष्ट उद्देश्य वाला शुल्क होता है और उपकर कोष से प्राप्त धन को निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए ही खर्च किया जाता है। इन लोगों ने बताया कि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था पर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था जीएसटी परिषद की बैठक संसद के मानसून सत्र से पहले या उसके बाद होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि परिषद की बैठक लंबित है और जल्द ही होने की उम्मीद है। 55वीं जीएसटी परिषद की पिछली बैठक 21 दिसंबर को राजस्थान के जैसलमेर में हुई थी।

इसके बावजूद पुरानी वसूली पर इतना जोर है और वह भी तब जब समय पर रिटर्न फाइल किया गया होगा और उस समय न मामला पकड़ा गया ना बताया गया और ना इतने समय तक वसूली की कोई कोशिश हुई। इसलिए मैंने गूगल किया तो निम्नलिखित खबरें मिलीं

1. टाटा स्टील को 890 करोड़ रुपये का जीएसटी नोटिस

टाटा स्टील ने कहा है कि उसे 24 जून को नोटिस मिला और इस पर 13 जून 2025 की तारीख है। इसमें कहा गया है कि उक्त एससीएन से कंपनी की वित्तीय, परिचालन या अन्य गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विनियामक फाइलिंग के अनुसार, झारखंड के जमशेदपुर में सीजीएसटी और केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्त के कार्यालय से प्राप्त नोटिस में वित्त वर्ष 19 से वित्त वर्ष 21 की अवधि के लिए 890.52 करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट का अनियमित लाभ उठाने का उल्लेख किया गया है। (ईटी नाऊ न्यूज, 26 जून 2025)

2.एलआईसी को 57.22 करोड़ रुपये का जीएसटी नोटिस

जीवन बीमा कंपनी ने कथित तौर पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) मानदंडों का उल्लंघन किया है। इसमें से जीएसटी की राशि 31 करोड़ रुपये है, जबकि शेष 23.13 करोड़ रुपये ब्याज और 3.10 करोड़ रुपये जुर्माना है। एलआईसी इस आदेश के खिलाफ अपीलीय न्यायालय में अपील कर सकती है। बीमाकर्ता ने स्पष्ट किया कि इस निर्णय का प्रभाव केवल भुगतान आदेश तक ही सीमित है तथा इसका बीमाकर्ता की वित्तीय स्थिति या परिचालन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। (कैफेम्युचुअल डॉट कॉम, 26 फरवरी 2025)

3. अंडे के ठेले वाले को छह करोड़ का नोटिस

दिल्ली में रजिस्टर्ड कंपनी बताकर टैक्स बकाया दिखाया; युवक बोला- आज तक दिल्ली नहीं गया। दमोह में अंडे का ठेला लगाने वाले युवक को छह करोड़ रुपए के जीएसटी भुगतान का नोटिस मिला है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विभाग के नोटिस में प्रिंस को दिल्ली में खुली कंपनी का मालिक बताया गया है। (भास्कर डॉट कॉम, 27 मार्च 2025)

4. पेटीएम की गेमिंग कंपनी फर्स्ट गेम्स को 5712 करोड़ का जीएसटी नोटिस

पेटीएम ने कहा कि इस तरह के नोटिस पहले भी कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को मिल चुके हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है और कोर्ट ने कई कंपनियों को फिलहाल राहत भी दी है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फर्स्ट गेम्स को भी राहत दे दी। (एनडीटीवी डॉट इन, 29 अप्रैल 2025)

5. इंडियन ओवरसीज बैंक को ₹699.5 करोड़ का जीएसटी नोटिस

इंडियन ओवरसीज बैंक को ₹699.5 करोड़ का जीएसटी नोटिस मिला है। इससे उसके शेयर में चार सत्रों में 5% की गिरावट आई है। हालांकि, पिछले पांच सालों में इस शेयर ने 400% रिटर्न दिया है। आईओबी ने आधिकारिक बयान में कहा, “हमारा मानना ​​है कि मांग आदेश का बैंक की वित्तीय स्थिति, परिचालन या अन्य गतिविधियों पर कोई भौतिक प्रभाव नहीं पड़ेगा।” बैंक का मानना ​​है कि जीएसटी की मांग बिना किसी कानूनी औचित्य के है। (लाइव मिन्ट डॉट कॉम, 28 फरवरी 2025)

6. इंफोसिस को 32403 करोड़ रुपये के जीएसटी मामले में राहत

आईटी कंपनी इंफोसिस को 32,403 करोड़ के जीएसटी मामले में बड़ी राहत मिली है। कंपनी पर आईजीएसटी नहीं चुकाने का आरोप था। कंपनी के खिलाफ सारी कार्यवाही बंद कर दी गई है। जीएसटी इंटेलिजेंस के महानिदेशक (डीजीजीआई) ने वित्तीय वर्ष 2018 से 2022 तक के लिए इंफोसिस के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया था। (फाइनेंशियल एक्सप्रेस, 24 मई 2025)

ये सभी खबरें इसी साल की हैं। ज्यादातर में नोटिस पर रोक लग चुकी है और नोटिस मिलने पर ज्यादातर की चिन्ता शेयर बाजार में (शेयरधारकों को) नुकसान से बचना-बचाना है। यह चिन्ता सरकार और सरकारी विभाग को भी होनी चाहिये। और सरकार का काम नहीं है कि वह ठीक-ठाक व्यवसाय कर रही कंपनियों को इस तरह नोटिस भेजकर परेशान करे जिसे बाद में रोक दिया जाना है। ऐसा एक दो मामला नहीं है और छह महीने में इन्हें कम से कम छह माना जाये तो आज का मामला सातवां है। छोटे मोटे मामले तो छपते ही नहीं होंगे। इससे आप समझ सकते है कि देश में क्या चल रहा है या सरकार कैसे काम कर रही है। निश्चित रूप से यह चिन्ताजनक और शर्मनाक है। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारी संस्थाओं और सरकारी सेवाओं पर भी जीएसडटी लगाकर सरकार ने पहले ही इसे गब्बर  सिंह टैक्स जैसा नाम दिलवा दिया है और अब इसे जिस ढंग से लागू किया जा रहा है उसमें भी यह गब्बर सिंह टैक्स ही है। आप जानते हैं कि इससे रेल टिकट से लेकर डाक सेवाएं तक महंगी हो गई है। सरकार या जीएसटी विभाग नोटिस भेजने के मामले में किसी को नहीं बख्श रहा है और ऐसा एक मामला अंडा बेचने वाले का है तो इंफोसिस का भी है जिसने जीएसटी का पोर्टल बनाया है। नोटिस मिलने पर इंफोसिस ने निवेशकों के लिए प्रेस विज्ञप्ति जारी की।

इसमें कहा गया था, कर्नाटक राज्य जीएसटी अधिकारियों ने इंफोसिस लिमिटेड के विदेशी शाखा कार्यालयों द्वारा किए गए खर्चों के लिए जुलाई 2017 से मार्च 2022 की अवधि के लिए 32,403 करोड़ रुपये के जीएसटी के भुगतान के लिए प्री-शो कॉज नोटिस जारी किया है। कंपनी ने प्री-शो कॉज नोटिस का जवाब दे दिया है। समाचार लेखों के प्रकाशन के बाद कंपनी को इसी मामले पर जीएसटी इंटेलिजेंस के महानिदेशक से प्री-शो कॉज नोटिस भी मिला है और कंपनी इसका जवाब देने की प्रक्रिया में है। कंपनी का मानना ​​है कि नियमों के अनुसार, इन खर्चों पर जीएसटी लागू नहीं है। इसके अतिरिक्त, जीएसटी परिषद की सिफारिशों पर केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड द्वारा जारी एक हालिया परिपत्र (परिपत्र संख्या 210/4/2024 दिनांक 26 जून, 2024) के अनुसार, भारतीय इकाई को विदेशी शाखाओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ जीएसटी के अधीन नहीं हैं। जाहिर है, नोटिस से शेयरधारकों और कंपनी को नुकसान हुआ और नोटिस वैध होता तो स्टे नहीं होता। ऐसा बार-बार होना, भिन्न कंपनियों के साथ होना सामान्य नहीं है और निश्चित रूप से इसपर रोक लगनी चाहिये पर किसी का ध्यान नहीं है।

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