शालिनी श्रीनेत-
नई धारा पत्रिका / राइटर्स रेज़िडेंसी और जूरी मंडल के नाम खुला पत्र
पिछले दिनों जो घटना घटी, उससे सारा लेखक समुदाय आहत है और संस्थान से उचित कारवाई की मांग करते हैं. घटना की चर्चा हर रोज, हर तरफ हो रही है और सभी जान चुके हैं. अब तक संस्थान ने सामने आकर अपना पक्ष नहीं रखा है. क्या एक स्त्री की प्रतिष्ठा से बढ़ कर कोई संस्थान है? हम जूरी मंडल से भी सवाल पूछते हैं कि किस आधार पर एक ऐसे कवि का चयन राइटर्स रेज़िडेंसी के लिए किया गया, जबकि पिछले एक दशक से उसकी स्त्री विरोधी मानसिकता दिख रही है. क्या उनकी कुख्याति के बारे में सभी लोग पहले से अवगत नहीं थे? अगर नहीं तो यह बात गले के नीचे नहीं उतरेगी. कृष्ण कल्पित नामक कवि का पूरा इतिहास उठा कर देख लें तो सब साफ हो जाता है.
इस मामले में जूरी के सदस्यों की चुप्पी संदेहास्पद है और इससे यह संदेश जाता है कि उनका कवि और संस्थान के साथ गठजोड़ है. जानबूझकर एक ऐसे कवि का चयन किया जो लगातार स्त्रियों के प्रति हिंसक और अश्लील फतवेबाज रहा है. उसने नाम लेकर लेखिकाओं का चरित्र हनन किया है. हम ये नहीं मानते कि जूरी मंडल इतनी अनभिज्ञ है.
आज के समय में कुछ भी छिपता नहीं है. सबकुछ जग ज़ाहिर और पब्लिक डोमेन में है. क्या ज्यूरी संस्थान के दबाव में ऐसे चयन करती है? सच सामने आना चाहिए. पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए.
हम जानना चाहते हैं कि क्या निर्णायक मंडल को अपने फ़ैसले पर कोई पछतावा है या नहीं? वो लोग चुप हैं. उनकी तरफ़ से भी कोई बयान नहीं आ रहा, जबकि उनमें स्त्रीवादी लेखक भी हैं, ख़ुद एक वरिष्ठ लेखिका हैं. क्या इन्हें सामने आकर अपनी बात नहीं रखनी चाहिए?
हम सभी लेखक / लेखिकाएं मांग करते हैं कि संस्थान से जुड़े लोग सामने आएं और समूचे घटनाक्रम से हमें अवगत कराते हुए सार्वजनिक रुप से माफ़ी मांगे. संस्थान और निर्णायक मंडल की बेशर्म चुप्पी ख़तरनाक है. आगे साहित्य के लंपटों को और बढ़ावा मिलेगा. यह न्याय का वक्त है, ऐसे लोगों की शिनाख्त और उनके बहिष्कार का वक्त है. कोई लेखक न्यूनतम मानवीय नैतिकता का निर्वाह नहीं करता है तो उसे लेखक कहलाने का कोई हक नहीं है.
हम सब साथ हैं – मृदुला गर्ग, अंजलि देशपांडे, गीताश्री, वंदना राग, प्रत्यक्षा, मृदुला शुक्ला, शालिनी श्रीनेत, मेरा रंग परिवार
संजीव चंदन-
‘नई धारा’ के राइटर्स रेसीडेंसी प्रोग्राम में हुए ‘कथित यौन उत्पीड़न’ मामले पर एक नागरिक जाँच समिति बनाने का निर्णय स्त्रीकाल की ओर से लिया गया है।
पांच सदस्यीय समिति: चेयरपर्सन:- एडवोकेट अल्का वर्मा (जेंडर के सवाल पर मुखर एडवोकेट)
सदस्य- मनोरमा (वरिष्ठ पत्रकार), स्त्रीकाल की ओर से प्रतिनिधि, हेमंत कुमार (वरिष्ठ पत्रकार), प्रतिमा कुमारी पासवान (सोशल एक्टिविस्ट), दिव्या गौतम (स्त्रीवादी स्कॉलर और संस्कृति कर्मी)
इस समिति को इन बिंदुओं पर काम करने का जनादेश होगा:-
- लेखक कृष्ण कल्पित पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप मामले में जांच और मामले के निस्तारण में नई धारा संस्था की भूमिका।
- चयन समिति के लोगों द्वारा चयन प्रक्रिया कैसी और किस तरह अपनाई गई कि पिछले डेढ़ दशक से अपने महिला विरोधी आचरणों के कारण विवादों में रहे कृष्ण कल्पित को चुना गया, किन परिस्थितियों में चुना गया।
- इस प्रोग्राम के तहत चयनित दो लेखकों, एक लेखक और एक लेखिका की घोषणा और जारी पोस्टर्स के बाद कृष्ण कल्पित के दोस्तों द्वारा उन्हें संबोधित कर सोशल मीडिया में जारी अश्लील और द्विअर्थी टिप्पणियों का कोई संज्ञान संस्था को था या निर्णायकों को?
- इस प्रोग्राम में रह रही लेखिका के लिए क्या सुरक्षा व्यवस्था थी ?
- चर्चा में आने के बाद सोशल मीडिया में लेखकों द्वारा ऐसे मामलों में कानून का उल्लंघन कर, पीड़ित लेखिका की तस्वीरें सीधे या द्विअर्थी टिप्पणियों के साथ कैसे घूमीं और किस तरह लेखकीय सर्किल में लेखिका के खिलाफ अफवाह और सेक्सिस्ट बातें फैली हैं, फैलाई जा रही हैं। इसका पैटर्न क्या है?
समिति कुछ और संस्तुतियां साहित्यिक संस्थाओं में जेंडर और जाति आधारित संवेदनशीलता के लिए भी देगी:
A. संस्थाओं में जाति और जेंडर उत्पीड़न की घटनाओं के खिलाफ सुनवाई के लिए कैसी व्यवस्था होनी चाहिए और कोई भी व्यवस्था कैसे सुनिश्चित कराई जा सकती है? जेंडर और जाति के मामलों के लिए शिकायत निवारण प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए क्या कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है?
B. लेखक संगठनों का व्यवहार क्या हो? वे समय-समय पर कुछ प्रसताव पास करते हैं, किसी व्यक्ति या संस्था के बहिष्कार का तो उन प्रस्तावों को बनाये रखने और रिव्यू करने के क्या तरीके हों? क्योंकि संगठन कैजुअल तरीके से अपने बहिष्कार आदि को वापस ले लेते हैं।
कृष्ण कल्पित नियमित ऑफेंडर रहे हैं लेकिन प्रलेस में बने रहे हैं, और एक ऑफेंडर को यह संगठन राष्ट्रीय पदाधिकारी भी बना चुका है।
C. न्यायालय द्वारा एक गाइड लाइन जारी करवाने की दिशा में क्या बढ़ा जा सकता है। क्या इसका आधार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पब्लिक के पैसों से संस्थाओं का संचालन नहीं बन सकता?
समिति एक महीने में अपनी रिपोर्ट और संस्तुतियां सौंपेगी।


