आशुतोष कुमार पांडेय-
लगभग 21 वर्षों तक बीबीसी के लिए काम करने वाले सलमान रावी ने खुद को सेवामुक्त कर लिया है।
सलमान ने अविभाजित बिहार के धनबाद से वर्ष 1988 ई. में ‘आवाज़’ नामक अख़बार से अपना कैरियर आरम्भ किया। उसी दरमियान कोयला माफियाओं ने एक पत्रकार की हत्या की थी। उसके बाद सलमान रावी ने मोर्चा संभाला और माफियाओं और अफसरों की मिलीभगत का खुलासा आरंभ किया। सलमान को जान से मारने की धमकी मिली। जिसकी परवाह उन्होंने कभी नहीं की। बकौल सलमान, ‘भागवत झा आज़ाद बिहार के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने माफियाओं के खिलाफ मुहिम शुरू की। पत्रकारिता में माफियाओं और अफसरों की गठजोड़ के खिलाफ लिखा गया। एक साल बाद भागवत झा आज़ाद ने मुख्यमंत्री पद से हटे और सत्येंद्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री बने। उन्होंने माफिया समुदाय को ढील दी।’
धनबाद के डीएम ऑफिस में पुलिस और माफिया समूह ने सलमान रावी की हत्या करने की कोशिश की। दर्दनाक पिटाई की। बिहार विधानसभा उस दौर में हप्ते भर बाधित रही, जिसका नेतृत्व लालू प्रसाद यादव कर रहे थे। नवभारतटाइम्स के तत्कालीन संपादक आलोक मेहता ने लेख लिखा। उसके बाद उन्होंने धनबाद छोड़ दिया और जमेशदपुर रहने लगें। जहां उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार के लिए बतौर सम्पादक काम करना आरंभ किया।
फिर धनबाद लौटे। धनबाद में उनके भोजन का ठिकाना भारत हिन्दू होटल रहा। हिन्दू होटल के मालिक थे गरीब रावत। वर्षों तक भोजन का एकमात्र ठिकाना। सलमान बताते है कि उसी होटल ने मुझे आश्रय दिया तब जब वह झोपड़ी में चलती थी। अब तो बड़ा होटल हो गया है। गरीब रावत नहीं रहे, उनकी याद आती है।
कुछ साल की नौकरी के बाद अंग्रेजी अख़बार ‘टेलीग्राफ’ में विशेष संवाददाता नियुक्त हुए। जहाँ उन्होंने 11 वर्षों तक काम किया। पूर्वोत्तर के हिंसा ग्रस्त इलाकों, कश्मीर घाटी, केरल का बाढ़, नेपाल में माओवादी आंदोलन, बिहार में निजी और जातीय सेनाओं की हिंसा पर रिपोर्टिंग की। रानीगंज के कोयला खदान पर रिपोर्टिंग के बाद धनबाद में एकबार फिर माफियाओं ने हमला किया। उनके दफ्तर हथियार लेकर पहुँचे। उन्होंने FIR की। मामला कोर्ट पहुँचा। जस्टिस दुबे ने सलमान के पक्ष में फैसला दिया। माफिया समूह ने सलमान पर कोम्प्रोमाईज़ के लिए दबाव बनाया। जज साहब ने कहा कि भले ही आप कम्प्रोमाइज कर लीजिए लेकिन आरोपियों पर आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा चलेगा। मामला हाईकोर्ट पहुँचा।
सलमान रावी की टेलीग्राफ में की गयी रिपोर्टिंग से गुजर रहा था। वे रिपोर्टिंग करने के लिए कोयला खदान में पहुँचते है। जहाँ किसी को जाने की अनुमति नहीं है। वे पहचान छिपाकर मजदूर बनकर वहाँ पहुँचते है। और उसके बाद भोगा हुआ यथार्थ पेश करते हैं।
इसके बाद सलमान ने अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए एक वर्ष काम किया। उसी समय वर्ष 2004 से बीबीसी के लिए काम करना शुरू किया। वर्ष 2007 में बीबीसी ने स्थायी तौर पर रख लिया। बीबीसी में रहते हुए सलमान ने वर्ष 2006 ई में उड़ीसा के कालाहांडी जाकर रिपोर्टिंग की। जहाँ 40 से 50 लोगों की भूख से मौत हुई थी। उस रिपोर्टिंग के लिए सलमान ने पैदल लगभग 40 किलोमीटर पैदल यात्रा की थी। सलमान ने इस खबर को ब्रेक की थी। उसके बाद सरकार हरकत में आयी। जिला के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई।
वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ के सुकमा के जिलाधिकारी एलेक्स जॉन पॉल को माओवादियों ने बंधक बनाकर अज्ञात जगह ले गये। उन्हें रिहा करवाने में सलमान ने अहम भूमिका निभाई।
कोरोना काल के दौर में जब लोग घरों में दुबके हुए थे। तब सलमान ग्राउंड पर काम कर रहे थे। मध्यप्रदेश के छतरपुर के रहने वाले कैलाश और सरोज से सलमान अचानक मिल जाते हैं। उस समय सलमान बीबीसी के लिए रिपोर्ट लाइव कर रहे थे। कैलाश और सरोज की बेबशी ने कोरोना और सरकार-समाज की क्रूरता एक साथ सामने रख दी थी।
सलमान की सैकड़ों रिपोर्ट हमारे सामने है। उन्होंने कभी किसी पुरस्कार-सम्मान के लिए आवेदन नहीं किया। उनका मानना है कि जिस सम्मान के लिए आवेदन किया जाए वह सम्मान कैसा? सम्मान स्वाभाविक होती है। मानवीय होती है। संस्थागत सम्मान धंधा है।
आपको जान कर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सलमान रावी का जन्म हैदराबाद में हुआ। जबकि वे मूलतः सहारनपुर के रहने वाले है और पत्रकारिता कोल माफिया की अमर भूमि धनबाद से आरम्भ की। और फिलहाल कोलकत्ता से भोपाल की ओर।
सलमान रावी इस दौर के नायाब पत्रकार है। रेडियो पर उन्होंने जिस संवेदनशीलता के साथ अद्भुत रिपोर्टिंग की।


