पुष्पराज शांता शास्त्री-
प्रोफेसर आशुतोष का यह पोस्ट आपत्तिजनक है। बाबा नागार्जुन भारत के स्वतंत्रता संग्राम, कृषक संग्राम और जेपी आंदोलन में जेलों में जिंदगी बिताने वाले एक क्रांतिकारी कवि थे।
उनकी मौत के 22 वर्षों बाद 2020 में बाबा नागार्जुन के खिलाफ जिस तरह का मीडिया ट्रोलिंग हुआ, प्रोफेसर साहब अपनी सस्ती लोकप्रियता के लिए इस तरह के पोस्ट लिख रहे हैं।
बाबा नागार्जुन का जन्म दिन नहीं मनाने से वे छोटे नहीं हो जाएंगे लेकिन इस तरह “मीडिया ट्रोलिंग” को आधार बनाकर उनके खिलाफ घृणास्पद माहौल निर्मित करना एक तरह का ज्ञान विरोधी अभियान है।
मैं प्रोफेसर आशुतोष को बताना चाहता हूँ कि देश कानून और अदालत से चलेगा ना कि मीडिया ट्रोलिंग से। देश की किसी अदालत में बाबा नागार्जुन के खिलाफ ऐसे आरोप साबित नहीं हुए हैं, जिससे उन्हें चरित्रहीन माना जाए।
मैं बाबा नागार्जुन को आरोपित करने वाले देश -दुनियां के किसी भी नागरिक को सबूत के साथ अपना दावा पेश करने के लिए आमंत्रित करता हूँ। मैं बाबा नागार्जुन के खिलाफ आपके दावे को अदालत में चुनौती देने के लिए तैयार हूँ।
आप मेरी चुनौती स्वीकार करें और आरोपों के साथ मेरे साथ अदालत के दरवाजे पर खड़े हो जाएं।
प्रेम कुमार मणि-
अभी शिवांगी गोयल के पत्र में एक पद मिला ‘ वरिष्ठ लेखक और नीच आदमी. ‘ उन्होंने इसे अपने उत्पीड़क केलिए इस्तेमाल किया है. बहुत सधा-संतुलित पद है. अपनी पीड़ा के स्वाभाविक आवेश में भी उस युवा कवयित्री ने दो कौड़ी का कवि लिखने के बजाय वरिष्ठ लेखक ही लिखा है. नागार्जुन भी इसी कोटि के वरिष्ठ थे.
उनसे ( नागार्जुन से ) इक्कीस की उम्र में परिचित हुआ. उनसे मिलने गाँव से पटना आया. खोजते-ढूंढते गंगा किनारे उनके आवास गया. जाड़ों की धूप थी. बाबा धूप में बैठ खिचड़ी खा रहे थे. कुछ देर उनके साथ बैठा. कुछ बातें हुईं. हालांकि मेरा मिलना दर्शन भाव से ही था. मुझे छोड़ने वह अशोक राजपथ तक आए. जहाँ कुछ समय पहले राजकमल प्रकाशन था, उसी के आसपास की दूकान से उन्होंने खाजा-मिठाई ख़रीदे. खिलाया. हम उनसे प्रभावित हुए. बाबा तो वह पूरे हिंदी संसार के थे. पत्राचार हुए. घनघोर. 1978 में बीमार हो कर मैँ अस्पताल में भर्ती हुआ, तब वह रोज देखने आते रहे. कहने का अर्थ केवल यह कि व्यक्ति के तौर पर उनका मुझ पर अनुग्रह रहा.
लेकिन जब गुनगुन प्रकरण सामने आया तब मैंने फेसबुक पर टिप्पणी लिखी और उनके कृत्य की निन्दा की. उस समय वह दिवंगत हो चुके थे. आप कह सकते हैं कि मेरे लिखने का क्या अर्थ था. मेरा लिखना इसलिए था कि अनेक महार्घ रचनाकारों में नागार्जुन तत्व मैं देख रहा था. नागार्जुन निश्चय ही बड़े रचनाकार थे और रहेंगे. लेकिन एक इंसान के तौर पर गिरे हुए थे. एक अबोध बच्ची के साथ यौन अपराध करने जैसी सूचना से अवगत होने के बाद उनकी कविता का भाव भी गिर जाता है. वह आशाराम साधु की कोटि में आ जाते हैं. विद्वान तो नाथूराम गोडसे भी था. या हमारी पौराणिक गाथा का रावण भी था. तमाम विद्वता का मोल ख़त्म हो जाता है जब आप एक ऐसे दुष्कर्म में आ घिरते हैं. हम अपने व्यक्तित्व और अपनी नैतिकता से अपने शब्दों को समृद्ध और अर्थपूर्ण बनाते हैं. एक रचनाकार की नैतिकता सामान्य जनों की नैतिकता से अधिक बुलंद होनी चाहिए. उसमें धर्म, उसके ग्रंथ, पुरोहितों,सरकारों और यहाँ तक कि ईश्वर जैसे विचार से भी भिड जाने की कुव्वत होनी चाहिए. वह किताबों, पुरस्कारों, प्रसिद्धियों जैसी चीजों से घिरा नहीं होता. मनुष्यता का आदिम प्रहरी होता है. वह अपने इस दायित्व से च्युत होता है तो फिर शब्दों का व्यापारी हो जाता है, लेखक नहीं रहता.
चंद्र भूषण-
बाबा नागार्जुन पर गुनगुन थानवी की बात सालों बाद फिर से पढ़ी। आसाराम बापू की शिकार हुई बच्ची को पढ़कर जैसा लगा था उससे भी खराब लगा।
कैलाश प्रकाश सिंह-
नागार्जुन यौनकुण्ठित व्यक्ति थे। गुनगुन का संस्मरण पढ़कर घृणा और गुस्सा दोनों हुआ। बहुत पहले एक बार सादत पुर में उनका साक्षात्कार लेने गया था। जिस कमरे में वे रहते थे। बहुत गंदा बदबू से भरा था। दीवालों पर थूक और कफ लगा हुआ था। बाबा पता नहीं कितने दिन से नहाए हुए थे।
राजेन्द्र यादव ने भुक्खड़ लेखक के रूप में संपादकीय भी लिखा है। बाबा में मैथिली ब्राह्मण वाला क्षेत्रीयतावाद बहुत था। उनकी रचनाएँ बनावटी लगती हैं।
श्याम कृष्ण-
पढ़कर बड़ा घिन लगा था, नागार्जुन जी और इतना गिरा चरित्र। बाबा नागार्जुन के चरित्र पर पहली बार किसी ने उंगली उठाई थी वह भी उनके न रहने पर। कांप गया था मन। फिर दिमाग ने कहा जिस पर आरोप लगाईये अगर वह जबाब देने के लिये न हो या उसे जबाब देने का मौका न मिले तो आरोप बेदम कहलाता है। नेचुरल जस्टिस के सिद्धांन्त के खिलाफ हुआ। बाबा पहले की तरह अच्छे लगने लगे।
चंद्र भूषण-
पूरा कैथोलिक चर्च पिछले पंद्रह वर्षों से बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे बच्चों के लगाए आरोपों से थर्रा रहा है।


