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आज के अखबार : डिजिटल ठगी पर इंडियन एक्सप्रेस और नरेन्द्र मोदी का डिजिटल इंडिया साथ-साथ

डिजिटल इंडिया की पुलिस और एजेंसियां क्या राजनीतिक दुश्मनी निकालने और बदले की कार्रवाई करने के लिए ही हैं। दिल्ली पुलिस का रिकार्ड इतना खराब क्यों है और डिजिटल अपराध रोके नहीं जा रहे हैं तो कम करने के उपाय कौन करेगा। इस दिशा में कोई कार्रवाई हो रही है या नहीं कैसे पता चलेगा और नहीं पता चले तो सरकार पर दबाव कैसे बनेगा या ऐसा कुछ होना ही नहीं है। सरकार चुनाव जीतने में ही लगी रहेगी और जीतती जायेगी? अखबारों में यह सवाल नहीं है कि पुलिस अगर डिजिटल अपराध नहीं रोक पा रही है, बरामदगी शून्य है और नजीब का भी पता नहीं लगा पाई तो क्या 18 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को बैंगलोर से उठा लाने के लिये ही है?

संजय कुमार सिंह

इंडियन एक्सप्रेस में डिजिटल चोरी, ठगी और लूट पर चल रही श्रृंखला के तीसरे दिन का शीर्षक है, मामूली या शून्य रिकवरी : डिजिटल घोटाले में गया पैसा ब्लैक होल में क्यों चला जाता है। (ब्लैक होल एक खगोलीय पिंड है जिसका गुरुत्वाकर्षण बल इतना मजबूत होता है कि कुछ भी, यहां तक ​​कि प्रकाश भी, इससे बच नहीं सकता। ब्लैक होल की “सतह”, जिसे इसका इवेंट होराइजन कहा जाता है, वह सीमा निर्धारित करती है जहां से बचने के लिए आवश्यक वेग प्रकाश की गति से अधिक होता है, जो ब्रह्मांड की गति सीमा है। मोटे तौर पर इसे नीचता का अंतिम छोर कह सकते हैं जहां से वापस आना संभव नहीं है।) आज ही दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “डिजिटल इंडिया ने 10 साल में देश को बदल दिया है : मोदी”। यह खबर डिजिटल इंडिया पर किसी आयोजन में प्रधानमंत्री का भाषण नहीं है बल्कि लिक्ंड इन पर उनकी पोस्ट से बनी खबर है। मैं नहीं जानता कि यह पोस्ट उन्होंने किस लिये लिखी है या इंडियन एक्सप्रेस की खबर से हुए नुकसान की भरपाई के लिए लिखी है कि नहीं। लेकिन यह तो पता है कि सरकारी खजाने से वेतन भत्ते और सुविधायें लेने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने ग्यारह साल में एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है और प्रचार के लिए अक्षय कुमार तथा प्रसून  जोशी को पत्रकार बना दिया है तथा पत्रकारों के लिखित सवालों के जवाब दिये हैं। ऐसे व्यक्ति के लिंक्ड इन पोस्ट को खबर बनाना और वह भी लीड बनाना निश्चित रूप से ऐसी पत्रकारिता है जिसे रेखांकित किया जाना चाहिये।

अंग्रेजी की खबर के अनुवाद से बचने के लिए मैंने हिन्दी में यह खबर ढूंढ़ी और द प्रिंट में मुझे भाषा की खबर मिल गई। निश्चत रूप से यह प्रधानमंत्री का दावा है और सच्चाई वह भी है जो इंडियन एक्सप्रेस में छप रही है। बेशक प्रधानमंत्री राजनीति कर रहे हो सकते हैं लेकिन दि एशियन एज क्या कर रहा है? उसे प्रधानमंत्री के लिंक्ड इन पोस्ट का प्रचार करने की क्या जरूरत है? खबर के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि एक दशक पहले शुरू की गई ‘डिजिटल इंडिया’ पहल ने संपन्न और वंचितों के बीच डिजिटल विभाजन को पाट दिया है और अवसरों का लोकतंत्रीकरण किया है जिससे यह एक जन आंदोलन बन गया है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि, दशकों तक भारतीयों की प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की क्षमता पर संदेह किया जाता रहा, लेकिन उनकी सरकार ने इस दृष्टिकोण को बदल दिया और नागरिकों की प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की क्षमता पर भरोसा किया। मोदी ने यह भी कहा है कि उनकी सरकार ने संपन्न और वंचितों के बीच की खाई को खत्म करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया। खबर में प्रधानंमंत्री के तमाम दावे हैं। इनमें एक यह भी कि, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से, 44 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे नागरिकों को हस्तांतरित की गई, जिससे बिचौलियों को हटाया गया है और 3.48 लाख करोड़ रुपये के ‘लीकेज’ को रोका गया है।

दूसरी ओर इंडियन एक्सप्रेस ने यह सच्चाई बताई है कि, 2022 से 2025 तक डिजिटल ठगी के कुल 2,41,991 मामले हुए हैं। इस साल यानी 2025 में फरवरी तक ही 17,718 मामले  हो चुके हैं और अभी तक कुल 2575 करोड़ रुपये की ठगी हो चुकी है। सिर्फ 2025 में फरवरी तक 210.21 करोड़ रुपये की ठगी हुई है। आम जनता से यह ठगी केवाईसी से लेकर खाता बंद करने और खाते की जमा राशि जब्त करने के अधिकार के बावजूद हुई है और मिनटों में करोड़ों रुपये राज्यों की सीमा पार के एक बैंक से दूसरे में पहुंच जा रहे हैं। प्रधानमंत्री इसे अच्छाई और विकास कह सकते हैं लेकिन इससे ठग पकड़े नहीं जा रहे हैं या ठगी या लूट का पैसा रिकवर नहीं हो रहा है तो जनता का ख्याल रखना किसका काम है। क्या प्रधानमंत्री का काम अपनी ‘उपलब्धियां’ गिनाना ही है या जनता ही सेवा भी करेंगे और नहीं करेंगे तो क्या अखबारों का काम नहीं है कि यह सब उन्हें और जनता को बताया जाये? इसके बिना उनके काम और उपलब्धियों के प्रचार का क्या मतलब? यह साधारण नहीं है कि चार साल में डिजिटल ठगी के 2,41,991 मामले हों और रिकवरी मामूली या शून्य है। केवाईसी के बावजूद एजेंसियां अगर खाताधारकों को न ढूंढ़ पायें या खाता धारकों की जानकारी के बिना खाता चलता पाये जाये तो डिजिटाइजेशन की सफलता पर सोचने की जरूरत है।  

डिजिटल ठगी से बचने के लिए सरकार अमिताभ बच्चन से लोगों को चेतावनी दिलवाकर लोगों को सतर्क कर रही है। आप इसे जैसे देखिये मेरा मानना है कि सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए ऐसा कर रही है और ह यह कहकर बचना चाहती है कि हमने सतर्क (अमिताभ बच्चन के जरिये) सतर्क तो किया था। लेकिन सरकार का काम सतर्क करना नहीं, अपराध रोकना और अपराधियों को पकड़ना है। स सकार ने विपक्षी राजनीतिज्ञों को अपराधी बनाया या बनाने की कोशिश की लेकिन अपराध की जांच करने वाले न तो अपराध की तह तक पहुंच  रहे हैं ना अपराध रोक पा रहे हैं। यह साधारण स्थिति नहीं है। दूसरी ओर, आज इंडियन एक्सप्रेस ने जो उपाय बताये हैं उनमें एक है, बैंक और वित्तीय लेन-देन के लिए अलग फोन नंबर का उपयोग कीजिये और इसे दूसरे से साझा मत कीजिये। ठीक-ठाक कमाने-खाने वालों के लिए यह संभव और जरूरी हो सकता है लेकिन एक आदमी के लिए दो फोन रखना कितना व्यावहारिक है और अगर हो भी तो न सिर्फ फोन की कीमत पर, उसके सेवा शुल्क पर भी जीएसटी लगता है। इस तरह स्थिति यह है कि डिजिटल भारत में आम आदमी बैंकिंग की सामान्य जरूरतों के लिए पैन नंबर लेने, रिटर्न फाइल करने और कम से कम एक फोन रखने के लिए मजबूर है। केवाईसी के नाम पर खाता बंद करना और पैसे जब्त होने के मामले भी है। जबकि खाता खोलने के लिये पैन नंबर लेना एक बार का खर्च है लेकिन रिटर्न फाइल करना हर बार खर्च करवाता है और फोन के पैसे तो लगते ही हैं उसपर जीएसटी भी है। गरीब से गरीब आदमी, सब्जी बेचकर जीवन गुजर करने वाला भी जीएसटी दे रहा है और सरकार ले रही है। आम आदमी के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट जैसी सुविधा नहीं है जबकि पैसे वालों के लिए सुविधा के साथ-साथ घपला करने के चार-पांच साल बाद पकड़े जाने की ‘सुविधा’ भी है। कुल मिलाकर, आम आदमी का जीवन मुश्किल बनाने वाली सरकार के मुखिया देश बदलने का दावा कर रहे हैं और अखबार उसे प्रचार दे रहे हैं। 

इसी क्रम में नवोदय टाइम्स की लीड रोजगार देने की नई सरकारी योजना है और इसका शीर्षक है, पहली नौकरी र 15,000 रुपये। 1.07 लाख करोड़ खर्च होगे। अमर उजाला की लीड, दो साल में युवाओं को 3.5 करोड़ नौकरियां देने और इसपर 99.44 हजार करोड़ खर्च करने की घोषणा की है। इसका उपशीर्षक है, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजना पर लगाई मुहर, नई राष्ट्रीय खेल नीति को भी मंजूरी। अखबार ने शीर्षक में नहीं बताया है कि प्रचार प्रिय और चुनाव जीवी सरकार ने राज्यों के विधान सभा चुनाव से पहले यह घोषणा की है। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक है, राज्य चुनावों से पहले मंत्रिमंडल ने एक लाख करोड़ की योजनाएं मंजूर कीं जिनका मकसद 3.5 करोड़ रोजगार के मौके तैयार करना है। कहने की जरूरत नहीं है कि रोजगार प्रधानमंत्री का वादा था और सबसे ज्यादा बेरोजगारी उन्हीं के शासन में है। इसके बावजूद सरकार ने तमाम सेवाओं को जीएसटी के दायरे में लाकर बहुत मामूली कमाने वालों को भी टैक्स देने के लिए मजबूर कर दिया है और जीएसटी वसूली बढ़ी का प्रचार हर महीने करती रही है।  कल के अखबारों में जीएसटी वसूली की खबर नहीं दिखी। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर खबर थी कि जीएसटी आर्थिक सुधार की कुंजी साबित हुआ है। सरकार ने कल जीएसटी का बर्थडे मनाया। इस मौके पर डेलाइट की रिपोर्ट थी। वसूली की खबर आज छपी है और यह दुर्लभ सूचना है कि,  जून में जीएसटी वसूली चार महीने में सबसे कम 1.85 लाख करोड़ रही। द हिन्दू ने  इस खबर को पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छापा है। राहुल गांधी ने कहा है और देशबन्धु में लीड का शीर्षक है, आर्थिक अन्याय का हथियार बना जीएसटी। मुझे लगता है, यह खबर और प्रचार का अंतर है।

आप जानते हैं कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले एससीओ बैठक में ‘संयुक्त बयान’ पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। खबर यही छपी थी कि संयुक्त बयान आतंकवाद के खिलाफ भारत के मजबूत स्टैंड को नहीं दिखाता है। आज के अखबारों में विदेश मंत्री जयशंकर के हवाले से खबर है, हम क्वाड से उम्मीद करते हैं कि वह आतंकवाद पर हमारी स्थिति समझेगा। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है। द हिन्दू में यह दो लाइन के शीर्षक के साथ पांच कॉलम का बॉटम है। शीर्षक है, क्वाड को समझना चाहिये कि भारत को अपने लोगों को आतंकवाद से बचाने का हर अधिकार है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है और इसका शीर्षक है, भारत आतंकवाद के खिलाफ बचाव  के अपने अधिकार का प्रयोग करेगा। आतंकवाद पर भारत की स्थिति ऐसी क्यों है या भारत अपनी स्थिति क्यों नहीं बता या मनवा पा रहा है यह चिन्ता का विषय हो सकता है। इसका कारण समझना या समझाना मेरा काम नहीं है पर आज ही द टेलीग्राफ में खबर छपी है कि जेएनयू कैम्पस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं से भिड़ंत के बाद से लापता विश्वविद्यालय के छात्र नजीब अहमद का पता नौ साल बाद भी नहीं लगा है। कल खबर छपी थी कि दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकर कर लिया है। आज द टेलीग्राफ में छपा है कि नजीब का पता लगाने के लिए उसकी मां सुप्रीम कोर्ट जायेंगी और अपनी अंतिम सांस तक लड़ेंगी। उन्होंने कहा कि अभी तक दिल्ली पुलिस या सीबीआई ने न तो अभाविप के गुण्डों को गिरफ्तार किया है और न उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर पाई है।

जेएनयू कैम्पस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं से भिड़ंत के बाद से लापता विश्वविद्यालय के छात्र नजीब अहमद का पता नौ साल बाद भी नहीं लगा है। कल खबर छपी थी कि दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकर कर लिया है। आज द टेलीग्राफ में छपा है कि नजीब का पता लगाने के लिए उसकी मां सुप्रीम कोर्ट जायेंगी और अपनी अंतिम सांस तक लड़ेंगी। उन्होंने कहा कि अभी तक दिल्ली पुलिस या सीबीआई ने न तो अभाविप के गुण्डों को गिरफ्तार किया है और न उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर पाई है। वर्षों तक उसके बारे में अफवाह और झूठ फैलाई गई हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद इन्हें हटाया गया (2018 की यह खबर आज भी इंटरनेट पर है)। इसके अनुसार, स्पष्टीकरण के बावजूद नजीब के आईएसआईएस में शामिल होने की अफवाह सोशल मीडिया पर जारी। इसमें और सूचनाओं के अलावा यह जानकारी भी है कि, सत्ताधारी पार्टी के कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर यह झूठी खबर फैलाकर इस अफवाह को बल दिया। इनमें वरिष्ठ भाजपा राष्ट्रीय महासचिव राम माधव, भाजपा सांसद स्वप्न दासगुप्ता और भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली शामिल थे, जिन्होंने जसवंत सिंह के ट्वीट को रीट्वीट किया, जिसे अभी (उस समय तक) तक हटाया नहीं गया है और इसे 3000 से ज़्यादा बार शेयर किया जा चुका है। इसके अलावा, सत्ताधारी पार्टी के कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर यह झूठी खबर फैलाकर इस अफवाह को बल दिया। इनमें वरिष्ठ भाजपा राष्ट्रीय महासचिव राम माधव, भाजपा सांसद स्वप्न दासगुप्ता और भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली शामिल थे, जिन्होंने जसवंत सिंह के ट्वीट को रीट्वीट किया, जिसे अभी तक हटाया नहीं गया है और इसे 3000 से ज़्यादा बार शेयर किया जा चुका है। इसमें कई मुद्दे हैं, पुलिस ने जांच कैसे की, इस तरह के दावे करने (या अफवाह फैलाने वालों) के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और इनसे पूछताछ में कोई सुराग नहीं लगा। दिल्ली पुलिस ने 20121 में पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को कथित टूलकिट केस में बैंगलोर से गिरफ्तार र लिया था तो इस मामले में जब सफलता नहीं मिली तो पूछा जाना चाहिये कि क्या सब किया कि सफलता नहीं मिली। पऱ यह सब पूछना तो दूर आज यह खबर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है।

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