संजय सिन्हा-
मैंने आपको अपने घर की उस सफाईकर्मी की कहानी सुनाई थी, जिसे हमारे घर से खोई हुई सोने की अंगूठी मिली थी, और उसने वह चुपचाप लौटा दी थी। वह अंगूठी हफ्ते भर पहले गायब हो गई थी। हम ढूंढ-ढूंढकर थक चुके थे और मान चुके थे कि कहीं गिर गई होगी। लेकिन जब उस सफाईकर्मी को अंगूठी बाथरूम में मिली और उसने उसे लौटा दिया, तो मैं चौंक गया।
मैंने उससे जानना चाहा, “अगर तुम अंगूठी रख लेती, तो क्या बिगड़ता? सोने की अंगूठी थी, तुम उसे बेचकर कई महीने आराम से रह सकती थी।”
उसने बस इतना कहा, “साहब, जो दुख, तकलीफ और गरीबी आज झेल रही हूं, वो शायद किसी जन्म की गलती का फल है। अब अगर अपने सुख के लिए वही गलती दोहराऊंगी, तो अगला जन्म भी बिगड़ जाएगा। नहीं साहब, जीने के लिए गलत काम नहीं कर सकती।”
कहानी लंबी थी, संदर्भ अलग था। बाद में उसकी बेटी मेरे पास पढ़ने आई। फिर वह मास्को गई और आज वह एक बहुत अमीर महिला है। यह कहानी यहीं छोड़कर आगे बढ़ता हूं।
मेरा पालन-पोषण मेरे पिता और मामा के घर में हुआ। मैंने कपट का संसार कभी देखा ही नहीं। जो देखा, वही सीखा। गलत, गलत होता है और सही, सही होता है। गलत को सही साबित करने के लिए कोई दलील नहीं दी जा सकती।
अगर हमारे घर काम करने वाली वह महिला अंगूठी बेच देती, तो हमें शायद कभी पता भी न चलता। लेकिन उसने तय किया कि पैसे की सख्त जरूरत होने के बावजूद ईमान से नहीं डिगेगी। बस, मेरी इस लेखमाला का मूल भाव यही है कि आदमी को क्यों कभी नहीं झुकना चाहिए।
आप जीवन के किसी भी मोड़ पर, किसी भी परिस्थिति में जब नहीं झुकते, तो क्या होता है? मेरे मन में एक उदाहरण हमेशा घूमता है।
इन दिनों मैं कई लोगों को जानता हूं जो शहर में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए स्पा सेंटरों में जाते हैं, मालिश करवाने। अब मुझसे मत पूछिएगा कि मालिश करवाने में क्या बुराई है? मैं शायद बता न पाऊं, लेकिन मैं जानता हूं और आप भी जानते हैं कि उसका सच क्या है।
दुख की बात है कि ये स्पा सेंटर बैंकाक से मुंबई, गोवा, दिल्ली, कोलकाता होते हुए अब पटना और जबलपुर जैसे शहरों में भी पांव फैलाने लगे हैं। स्पा सेंटरों में बहुत सी लड़कियां नौकरी करती हैं, मालिश करने की।
बहुत पहले बतौर पत्रकार गुड़गांव में एक लड़की से मेरी मुलाक़ात हुई थी, उसने बताया था कि वह स्पा सेंटर में काम करती है। अब फिर मत पूछिए कि स्पा सेंटर क्या होता है।
बतौर पत्रकार ही मैंने उससे पूछा, “तुम यह काम क्यों करती हो? ऐसा काम, जिसमें रोज आत्मा मरती है?” उसने तर्क दिया, “हम ये सब करना नहीं चाहते सर, लेकिन मजबूरी में करते हैं। इतने महंगे मॉल में ये स्पा सेंटर क्या सिर्फ मालिश के भरोसे चल सकते हैं? सर, दुकान का किराया बहुत होता है, स्टाफ की सैलरी होती है, उनका प्रेशर होता है। और हमारे लिए नौकरी, मजबूरी होती है।”
मैंने कम बोला है। आप ज़्यादा समझ लीजिएगा। चाहूं भी तो यह कहानी यहां खत्म नहीं हो सकती।
पिछले दिनों मैंने अपने दोस्त सुमित अवस्थी को यूट्यूबर भानू पाठक के साथ एक पॉडकास्ट में देखा। बहुत अच्छा इंटरव्यू दिया है सुमित ने। सुमित मेरे साथ ज़ी न्यूज़ में थे। फिर आजतक में हमने लंबे समय तक साथ काम किया।
मैं यकीन से कह सकता हूं कि वे एक सुलझे हुए, ईमानदार पत्रकार हैं। मैं उनकी एंकरिंग का कायल हूं। और मैं उनकी उस ईमानदारी का भी प्रशंसक हूं, जो उन्होंने इस पॉडकास्ट में कहा कि आज जो गोदी मीडिया है, उसकी वजह न्यूज चैनल के मालिकों पर विज्ञापन का दबाव है। कोई भी न्यूज चैनल चलाने में बहुत पैसे खर्च होते हैं।
सुमित का वह इंटरव्यू वाकई अच्छा है। उन्होंने बताया कि चैनल को विज्ञापन चाहिए, विज्ञापन सरकार देती है, और क्योंकि सरकार देती है, इसलिए वह चाहती है कि उसके पक्ष में लिखा और बोला जाए। मतलब भोंपू बना जाए। सुमित अवस्थी का यह कथन एक सच्चाई है।
लेकिन यहीं प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक पत्रकार पैसों के लिए झुकेगा? क्या उसे झुकना चाहिए? ध्यान रहे मैं संस्थान की बात नहीं कह रहा। संस्थान के लिए अब मीडिया मतलब बिजनेस। लेकिन एक पत्रकार के लिए? अगर पत्रकार भी ऐसा करने लगे, तो फिर स्पा सेंटर की मजबूर लड़की और सरकार के सामने विज्ञापन के कारण खबरों को दबाने के लिए झुका पत्रकार, इनमें फर्क क्या रह जाता है? दोनों मजबूर ही हैं।
मेरा सौभाग्य रहा कि जब मैंने इंडियन एक्सप्रेस में काम किया, तब वह अखबार सरकार विरोधी था। गलत ही सही, लेकिन शुरुआत में ही मेरे मन में एक नींव पड़ गई थी, मैं झुकेगा नहीं। न सरकार के आगे, न जीवन की किसी तकलीफ के आगे।
मेरे मामा की दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। आईपीएस अधिकारी थे। चाहते तो शायद न जाने कितनी किडनियां खरीद सकते थे। लेकिन जो आदमी महानिदेशक पद पर रहते हुए भी एक छोटा सा मकान नहीं खरीद पाया था, वह किडनी कहां से खरीदता? मामा उधार की (डोनेट की गई) किडनी लेना नहीं चाहते थे।
कहते थे, “किडनी फैक्ट्री में नहीं बनती। कोई देगा तो भावना में देगा, प्रेम में देगा, अपनी जान जोखिम में डालकर देगा। और जो पैसे लेकर देगा, वह अथाह मजबूरी में देगा।” जानते हैं, उन्होंने क्या चुना? मर जाना। बस, मामा की इसी मर्दानगी का मैं दीवाना हूं।
मैं भगवान नहीं हूं। अपना कल नहीं जानता। लेकिन आज, पूरे होशोहवास में, मैं संजय सिन्हा कह रहा हूं, जिस दिन मुझसे कहा जाएगा कि विज्ञापन के लिए ही सही झुक जाओ, उस दिन मैं मुंह खोल कर कह दूंगा, “मैं झुकेगा नहीं, साला।” आप ‘साला’ को गाली मत मानिए, तेवर मानिए। यही मानिए कि संजय सिन्हा के जीवन का यह डायलॉग उनका मूल मंत्र है।
मैंने आपको कहानी सुनाई थी कि 1988 में मैंने दिल्ली में 31 दिन सिर्फ पचास रुपये में निकाल लिए थे। कमी थी, लेकिन एक बार भी किसी से एक रुपया नहीं मांगा। बिना खाए रहा, पैदल चला, लेकिन पैसे ने मुझे इतना मजबूर नहीं किया कि मैं……हुआ क्या? मैं जी गया।
32 साल जमकर नौकरी की। अच्छी सैलरी कमाई। मनमाफिक जीवन जिया। उप संपादक रहा, रिपोर्टर रहा, प्रोड्यूसर रहा, संपादक और चैनल हेड रहा, लेकिन कभी किसी से ऐसा रिश्ता नहीं बनाया जिसमें खबर दिखाने या दबाने के लिए झुकने की नौबत आए।
मैं मानता हूं कि मैं बाकी पत्रकारों की तुलना में अधिक भाग्यशाली रहा। मैं पिछले साढ़े तीन साल से नौकरी नहीं कर रहा। लेकिन मुझ पर इसका रत्ती भर असर नहीं पड़ा है। मैं आराम से जी रहा हूं, बहुत कम खर्चों में। मैंने बस खर्च कम कर लिए हैं। अगर और भी कम करना पड़ेगा तो उपवास शुरू कर दूंगा। लेकिन झुकूंगा नहीं।
नोट –
- दूरदर्शन, आकाशवाणी सरकार के मीडिया हैं। प्राइवेट चैनलों पर सरकार का विज्ञापन दबाव है। तो फिर, वो मीडिया कहां है, जो हुकूमत की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछ सके?
- अगर वो सवाल नहीं पूछ सकता…तो फर्क क्या है मीडिया वाले पत्रकार और स्पा सेंटर में काम करने वाली लड़की में?
- हर काम की एक मर्यादा होती है। होनी चाहिए।
- सुमित का इंटरव्यू दिल को छू गया। उनकी स्पष्टवादिता की सराहना करता हूं। अगर एनडीटीवी में कार्यरत होते हुए उन्होंने यह सत्य स्वीकार किया है, तो ये भी कमाल है।
- हो सकता है, सुमित को याद न हो…या फिर याद हो। मैं ‘आजतक’ में था, एक दिन योग के बाद व्यापार में फेमस हो रहे बाबा स्टुडियो में गेस्ट बनकर आए थे। मैंने उनके साथ एक फोटो खिंचवाई और फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी।
- उन दिनों मैं सेलेब्रिटी के साथ फोटो खिंचवाकर फेसबुक पर चिपकाया करता था। अचानक सुमित अवस्थी मेरे पास आए और बोले, “एक बात कहूं संजय जी? बाबा के साथ वाली फोटो आपको फेसबुक पर नहीं डालनी चाहिए थी। मैं तो कहता हूं, उनके साथ फोटो ही नहीं खिंचवानी चाहिए थी। आप समझ ही गए होंगे क्यों कह रहा हूं। बहुत से लोग इस लायक नहीं होते कि उनके साथ तस्वीर खिंचवाई जाए।”
- मैं खुश हुआ था कि मीडिया में ऐसे लोग हैं, जो नहीं झुकने के हिमायती हैं। संख्या कम हो सकती है, लेकिन इन्हीं लोगों की वजह से मीडिया पूरी तरह मरा नहीं है।
- अब आप आज मीडिया और स्पा को एक ही मान लीजिए। झुकने को दोनों की मजबूरी मान लीजिए।
- सुमित के तब के कहे का सच इतना ही था कि अगर शुरुआती दिनों में हम पत्रकार व्यापारी बन रहे बाबा के साथ तस्वीर नहीं खिंचवाते, तो हमें वो दिन भी नहीं देखना पड़ता, जब वही बाबा एक न्यूज़ शो ‘थर्ड डिग्री’ में एंकर को सवाल पूछने पर ऑन एयर धमकी दे गए थे, कि आपकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा प्रश्न करने की?
- पत्रकार जब सरकार से सवाल पूछते हैं तो सरकार भी अधिक से अधिक कैमरा बंद करा देती है।
- लेकिन जो व्यापारी विज्ञापन के नाम पर संस्थान को पैसे देता है, वो तो पत्रकार को धमकी भी दे ही सकता है।
- खाता मुंह है, झुकती आंखें हैं।
- जिन आखों में झुकने की शर्मिंदगी हो, उन्हें खाने से डरना चाहिए।
- स्पा मीडिया से दूर रहना चाहिए।
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