रवीश कुमार-
इन दिनों कई पत्रकार गोदी मीडिया के टर्म को खारिज करने में लगे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके काम का मूल्यांकन इस पैमाने से हो रहा है और होगा। वे अपनी पत्रकारिता का बचाव नहीं कर पाते हैं तो गोदी मीडिया को परिभाषित करने लग जाते हैं।
इस पार्टी उस पार्टी, इस सरकार, उस सरकार का उदाहरण देकर बैलेंस करने लग जाते हैं लेकिन गोदी मीडिया एक व्यापक अवधारणा है। मीडिया के अपराध की उस मोटी डायरी का नाम है जिसके पन्नों पर ऐसे-ऐसे अपराध दर्ज हैं जो बेहिसाब हैं।
गोदी मीडिया केवल एक है। वो दो जगह नहीं है। तबलीग जमात और सुशांत सिंह राजपूत के समय रिया चक्रवर्ती के ख़िलाफ़ गोदी मीडिया ने जो किया है, इसका समानांतर पिछले दस साल में नहीं मिलेगा।
इस तरह का काम केवल गोदी मीडिया ने ही किया है। ऐसे अनेक उदाहरण आपको दिए जा सकते हैं। आप केवल मोदी बनाम राहुल का नाम लेकर गोदी मीडिया के टर्म को reduce नहीं कर सकते हैं। गोदी मीडिया केवल भक्त मीडिया नहीं है, जनता का मरता छोड़ कर ज़हर फैलाता हुआ जनता को मरने लायक बनाने वाला गोदी मीडिया है।
यह किसी राजनीतिक दल या नेता के आगे झुकने का समझौता सिस्टम का नाम नहीं है बल्कि लोकतंत्र की हत्या में लगे मीडिया के आपराधिक चरित्र का नाम है गोदी मीडिया।
दिल्ली हाई कोर्ट ही नहीं, बांबे हाई कोर्ट, कर्नाटका हाई कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पढ़ें और उस समय के मीडिया कवरेज को याद करें। मार्च और अप्रैल 2020 में कौन सा चैनल, कौन सा पत्रकार खतरनाक कवरेज कर रहा था, झूठ फैला रहा था, उन सबका दस्तावेज़ यू ट्यूब में मिल जाएगा। इन सबकी फिर से पड़ताल होनी चाहिए।
आपको गोदी मीडिया के नाम का नया-नया अर्थ मिल जाएगा और पता चल जाएगा कि गोदी मीडिया का कोई दूसरा रुप नहीं है। गोदी मीडिया कौन है, क्या है, जनता जानती है। जान रही है। जानना पड़ेगा।
भारत के लोकतंत्र की हत्या इस तरह से कभी किसी दौर में मीडिया ने नहीं की है। इसका कोई पैरलल नहीं है।
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कीर्तेश दुबे
July 18, 2025 at 9:27 pm
रविश जी की एक बात तो बिल्कुल सही रही गोदी,गोदी बोलते हुए इन्होंने अब खुद गोदी चैनलों को या स्वीकार करने दिया गया कि हां हम गोदी हैं!अब तो इंटरव्यू में गोदी खुद स्वीकारते हैं कि हां गोदी कुछ तो है।