धीरेंद्र राहुल-
देश- प्रदेश के तमाम प्रमुख अखबार संभाग स्तर पर संस्करण और जिला स्तर पर पुलआउट निकाल रहे हैं तो वह इसीलिए कि पाठकों को सामीप्य बोध का आनन्द (नीयरनैस) दे सके। आम पाठकों की रुचि अपने आसपास की खबरें जानने में ही ज्यादा होती है।
‘वाशिंग्टन पोस्ट’ और ‘न्यूयार्क टाइम्स’ भले ही दुनिया के बहुप्रसारित अखबार होंगे लेकिन छपते, बंटते और पढ़े तो अपने आसपास के शहरों में ही है। यह अलग बात है कि डिजिटल युग में ऑनलाइन कोई कहीं भी किसी भी अखबार को पढ़ सकता है, यहां मैं प्रिंट मीडिया यानी छपे अखबार की ही बात कर रहा हूं।
आज राजस्थान में सात रेंज के आईजी और 37 एसपी के तबादले हुए हैं। कुल 91 आईपीएस के तबादले हुए हैं। राजस्थान पत्रिका की हेडलाइंस देखिए-
’91 आईपीएस की तबादला सूची जारी, जोधपुर कमिश्नर सहित सात रेंज आईजी बदले,’
‘राहुल जयपुर, राजेश जोधपुर, गौरव उदयपुर, कैलाश भरतपुर रेंज आईजी’, ‘मुख्यमंत्री की सुरक्षा से गौरव श्रीवास्तव को हटाकर गौरव यादव को लगाया’, तीस जिलों के एसपी भी बदले’, जयपुर कमिश्नर की कमान जोसफ के ही हाथ’। तीन फोटो लगाए हैं- राहुल प्रकाश, कैलाश विश्नोई और गौरव श्रीवास्तव।
हेडलाइंस में मैं (एक पाठक) ढूंढता रहा कि कोटा में आईजी कौन लगा? एसपी कौन लगा? लेकिन राजस्थान पत्रिका यह जानकारी देने में विफल रही। अब आप बताइए मेरी जोधपुर/ जयपुर/ उदयपुर/ भरतपुर के आईजी में क्या रूचि? मेरी रूचि तो कोटा में आईजी लगे राजेन्द्र प्रसाद और कोटा शहर एसपी तेजस्विनी गौतम में थी लेकिन हेडलाइंस में न इनका नाम और न फोटो।
उधर ‘भास्कर’ की हेडलाइंस देखिए-
‘मथ डाला विभाग, जयपुर के सात डीसीपी समेत 91 आईपीएस के तबादले’, सात रेंज आईजी और 37 एसपी बदले, राजेन्द्र प्रसाद कोटा रेंज आईजी, तेजस्विनी होगी सिटी एसपी, 12 आईएएस और 142 आईएएस के भी तबादले।
मैंने 35 साल राजस्थान पत्रिका में काम किया। आज भी मुझे राजस्थान पत्रिका की पत्रकारिता में गिरावट मंजूर नहीं है। कुछ लोग मुझे गद्दार कह सकते हैं लेकिन ऐसी तमाम तोहमतें भी मंजूर हैं, अगर यह गिरावट कहीं थम सके।
(इस खबर में कोटा कार्यालय में काम होना चाहिए था जो संभवतः नहीं हुआ?)
इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट भी पढ़िए…
अशोक कुमार जैन-
आपने 35 साल राजस्थान पत्रिका में काम किया,इसका मतलब ये नहीं है कि आप पत्रिका की कमियों को उजागर नहीं कर सकते! और मैं तो कहता हूं कि कमियां बताना भी उस संस्थान की मदद करने जैसा ही है, जो उन्हें आईना दिखा कर उनकी सही तस्वीर दिखा रहा है, आखिर कोई तो बताएगा इस प्रतिष्ठित अखबार को कि अब आपकी पत्रिका की लापरवाह पूर्ण खबरें आपकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर रही है। पत्रिका को भी इसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए।
अब एक बात और:- मेरे पूर्व के किसी साथी ने लिखा है कि पत्रिका प्रहलाद गुंजल से सम्बंधित कोई समाचार आदि पत्रिका में प्रकाशित नहीं करती है। ये तो पत्रकारिता के साथ सरासर अन्याय है, अखबार आदमी खबरों के लिए पढ़ता है, नां कि किसी पक्ष-विपक्ष के विचारों के लिए!
ये सब बहुत ग़लत कर रही है पत्रिका। ऐसा घमंड तो रावण का भी नहीं चला था, पत्रिका क्या चीज है! अच्छे लेख के लिए राहुल जी को बहुत बहुत साधुवाद।
Dhirendra Rahul
Adv Ashok Kumar Jain जिस तरह के कमेन्ट्स आए हैं, उन्हें देखकर स्तब्ध हूं। राजस्थान पत्रिका से इतने लोगों को शिकायत है। स्याही, कागज और प्रिंटिंग का खर्चा वैसा ही हो रहा है, सिर्फ पत्रकारिता का स्तर सुधारने की जरूरत है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
राजेश जैन-
आदरणीय राहुल जी के लिखे पर कई एंगल से पत्रकार साथियों ने टिप्पणी की है लेकिन एक और पहलू पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। अब पत्रकार की खबरों का सोर्स केवल राजनीतिक दलों के आईटी सेल, पीआर और ब्रांडिंग एजेंसियों की ओर से की जा रही सूचनाओं की बौछार है। वही अब असली रिपोर्टर और संपादक है। पुराने पत्रकारों को कल्पना भी नहीं है कि नए पत्रकार आजकल खबर खुद नहीं लिखते। वे केवल 50 शब्द की जानकारी देकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई जैसे चैट जीपीटी और मेटा से उसकी 400 शब्द में खबर लिखवा लेते हैं। वही अखबारों में छप रही हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि पत्रकारिता पर जिस तरह सरकारी शिकंजा कसा हुआ है और चैनल और अखबारों के मालिक सरेंडर कर चुके हैं, ऐसे में आम आदमी पर केंद्रित पत्रकारिता पत्रकारिता की उम्मीद रखना निरर्थक है। फिर भी अपवाद स्वरूप यदा कदा अच्छी खबरें लिखने वाले पत्रकारों की सराहना की जानी चाहिए।
देवेंद्र कुमार शर्मा-
राहुल जी, पत्रकारिता आजकल पैसा कमाने का साधन मात्र रह गया है। पाठकों के सुझाव, शिकायतों से इनको कोई सरोकार नहीं। हिन्दी पत्र होने के बाद भी अंग्रेजी के शब्द वो भी अशुद्ध छापना कोटा के तीनों अखबारों की आदत हो गई है। हेडिंग लगाते हैं: विषाक्त खा कर जान दी। जलमप्लावन हो गया तो जलजला आ गया। और तो और ‘खेल समाचार’ छापने के बजाय तीनों अखबारों में स्पोर्ट्स के बजाय स्पोटर्स छापा जा रहा है और कई बार इंगित करने के बाद भी कोई परवाह नहीं। मैने अपनी हिंदी भाषा अच्छे पत्र- पत्रिकाएं पढ़ कर सीखी है, आज के बच्चे क्या सीखेंगे अशुद्ध हिंदी भाषा पढ़ कर।
पुरुषोत्तम पांचोली-
पत्रिका के पराभव का यह पराकाष्ठा-काल है. यूँ केवल पत्रिका ही नहीं बाकी बचे-खुचे भी पत्रकारिता की अर्थी निकालने के लिए कोई कौर कसर नहीं छोड़ रहे.. कोटा के दो बड़े अखबारों को लगातार सात दिन तक गौर से पढ़ कर कोई भी संजीदा पत्रकार अपने ही पेशे के प्रति आत्मग्लानि और अपराधबोध से त्रस्त होने के लिए अभिशप्त है. इनकी गलतियों को कितना ही बता दो, वे स्वीकार ही नहीं करेंगे. यहाँ कार्यरत पत्रकारों को गुमान है कि उनसे बेहतर तो कोई है ही नहीं… खुद ही अपने अपने अखबारों में निर्लज्जता पूर्वक खुद के प्रशस्ति पत्र छाप लेते है.. किसी भी खबर का कुछ भी शीर्षक दे देते हैं. अभी दो दिन पहले कोटा में हुई बरसात पर जयपुर से मुझे एक प्रबुद्ध जन ने फोन कर कहा – “ये आपके कोटा के अखबारों को क्या हो गया?”
मैंने पूछा कि क्या हुआ तो बोले – “आपने अख़बार पढ़े नहीं क्या? अखबारों में लिखा है – शहर – पानी- पानी” मैंने उनसे माफ़ी मांगते हुए कहा कि मान्यवर! हमारे अख़बार रंग बिरंगे हो गए हैं, यह अलग बात है कि पत्रकारिता बेनूर हो गई!
फिलहाल नीचे गिरने और बेतरतीब छापने और खुद की पीठ खुद ही थपथपाने की होड़ मची है. ये अख़बार किसी के प्रति भी उत्तरदायी नहीं हैं. न पत्रकारिता के प्रति, न पाठकों के प्रति! इस घटाटोप में कुछ वास्तविक पत्रकारों को मिल बैठ कर मंथन करने की जरूरत है, शायद इस मंथन से कुछ नवनीत निकले जो आजकल की पत्रकारिता की सेहत सुधार सके …
महेश मखीजा-
प्रिंट मीडिया का एक दौर था तब पत्रिका या भास्कर जैसे राष्ट्रीय या प्रादेशिक अखबार ही नहीं स्थानीय अखबारों के प्रति भी जबरदस्त रूझान था पाठकों का। स्थानीय खबरों, घटनाओं और उनके महत्व के प्रति जनमानस की अभिलाषाओं की मुखर अभिव्यक्ति होती थी।
स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अखबारों के संपादकीय पृष्ठों के दृष्टिकोण पर सुधि पाठकों की नजर रहती थी। समय बहुत आगे निकल गया है। रही बात पत्रिका के कोटा संस्करण में प्रशासनिक
फेरबदल की खबर में कोटा को ही हैडिंग से नजरंदाज करने की तो इसके लिए कौन बेखबर रहा कोटा वासियों को खबर देने में यह आपसे ज्यादा कौन जान सकता है क्योंकि पत्रिका के सेवानिवृत्त पत्रकारों में सबसे ज्यादा एक्टिव अपने पत्रकारीय पेशे के लिए पेशे की बजाय मिशन के लिए आप सबसे ज्यादा सक्रिय है।
फिर भी कई महत्वपूर्ण इश्यू जो शहर जिले की जनता के सरोकारों से गहरे जुड़े हुए है उन्हें भी कृपया छूने की कोशिश कीजिए क्योंकि अखबार से ज्यादा अब सोशल मीडिया खबरें देने में और लेने में अग्रणी हैं बस जरूरत है उसे सतर्क और समझदारी से उपयोग में लेने की।
अरुण भार्गव-
पर मुझे लगता नहीं इतने बड़े अखबार वाले आपकी बात सुनेंगे मानेंगे आज भी समाचार पत्रों में जो समाचार सकते हैं एक ही तरह का समाचार राजस्थान पत्रिका वाले दो नाम देते हैं भास्कर वाले 8 या 10 नाम देते हैं आम जनता लोकल जनता लोक लोकल अखबार पढ़ने वाले अपने समाचार को देखना चाहते हैं बाहर के समाचारों में उनका ध्यान कम होता है।
फरीदुल्लाह खान-
जिंदगी के हर मरहले मे बहुत तेजी से गिरावट आ रही है। इससे राजस्थान पत्रिका ही क्यों, हर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया बतौर इनकी पेशेवर, नैतिक और सदाकत वाली जिम्मेदारी से सिर्फ दूर ही नही हो गए, बल्कि गिरावट को पैंदे मे ले जाने की शिद्दत से कोशिश कर रहे हैं।
हां, बेशक, प्रिंट मीडिया मे राजस्थान पत्रिका फिलहाल तो अव्वल नज़र आ रहा है। आपने हमने वह दौर भी देखा है, जब प्रिंट मीडिया हुकूमत की आंख की किरकिरी हुआ करता था।


