सुरेंद्र मोहन पाठक-
‘वर्दी वाला गुंडा’ की आठ करोड़ प्रतियां बिकीं। पहले ही दिन पंद्रह लाख प्रतियां बिकीं।
ये दो बहुत बड़े दावे हैं जिनको मैं सालों से सुनता आ रहा हूँ। और सुनने वाला मैं अकेला भी नहीं हूँ। मेरे अलावा न्यूजहाउन्ड हैं जो ऐसी न्यूज को कारोबारी अंदाज से भी लपकते हैं और मुसाहिबी अंदाज से हवा देना भी अपना फर्ज समझते हैं। हैरानी की बात है कि कभी किसी ने लेखक के दावे पर सवाल नहीं किया, ऐतराज नहीं जताया – न उसकी ज़िंदगी में, न सन् 2017 में उसके न रहने के बाद – कि ये मुमकिन नहीं, दिस डज़ नॉट स्टैंड टु रीज़न, फिर भी अगर लेखक का ऐसा दावा था तो उसे प्रमाणिकता की जरूरत है। लेकिन मैंने नहीं सुना कि कभी किसी ने इस बाबत कोई सवाल किया हो। सबने लेखक के कथन को ‘सतबचन महाराज’ कह कर कुबूल किया वरना ये स्थापित करना कोई कठिन काम नहीं कि जो कहा जा रहा था, वो नामुमकिन था।
बहुत से दावे ऐसे होते हैं जिनको झूठा या नामुमकिन साबित करने के लिए किसी सुबूत की जरूरत नहीं होती। जैसे मैं कहूँ कि मेरा कद दस फुट है तो ‘नहीं हो सकता’ कहने से पहले कोई कद नाप के नहीं देखेगा। मैं कहूँ कि मेरी उम्र एक सौ बीस साल है तो मुझे झूठा करार देने के लिए ‘प्रूफ ऑफ एज’ की मांग नहीं की जाएगी, स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट दिखाने को नहीं बोला जाएगा। कुछ बातें अपने आप में सुबूत होती हैं जिन्हें क्यूईडी (QED – Quod Erat Demonstrandum – a statement has just been proven, it needs no further proof) कहते हैं। बच्चा भी जानता है कि आदमजाद का दस फुट कद मुमकिन नहीं, उसकी एक सौ बीस साल उम्र मुमकिन नहीं। लिहाजा इस बाबत कहने वाले का कोई दावा कोई मायने नहीं रखता, उसकी कोई जिद, कोई गारंटी मायने नहीं रखती।
यहाँ पहले मैं दूसरे दावे पर आता हूँ जो कहता है एक ही दिन में पंद्रह लाख प्रतियां बिकीं।
लेखक ने अपनी ज़िंदगी में कभी उजागर नहीं किया था कि उसकी उस जानकारी का जरिया क्या था। लेखक खुद ही प्रकाशक था इसलिए तथ्य को, या कथ्य को, सत्यापित करने के लिए दूसरा सिरा नहीं पकड़ा जा सकता था। पहले ही सिरे पर रहते हुए अर्ज है कि लेखक नहीं जान सकता था, कोशिश भी करता तो नहीं जान सकता था, कि इतने बड़े हिंदुस्तान में किताब कब, कहाँ पहुंची और उसने अपने यहाँ पहले दिन की बिक्री का क्या स्कोर बनाया जिसका ग्रैंड टोटल पंद्रह लाख हुआ। गौरतलब है कि किताब सन् 1992 में पहली बार छपी थी जबकि इंटरनेट का आज सरीखा यूनीवर्सल इंकलाबी दौर अभी नहीं आया था। प्रकाशक विभिन्न ठिकानों पर पंद्रह लाख किताब एक ही दिन अरसाल किए जाने प्रबंध, मान लीजिए कि मेरठ जैसे छोटे शहर से किसी करिश्माई तरीके से, कर सकता था लेकिन वो ये कैसे सुनिश्चित कर सकता था कि किताब हर डेस्टिनेशन पर एक ही दिन पहुंचे, एक ही दिन सेल के लिए उपलब्ध हो? कहीं कोताही न हो कि किताब एक दिन पहुंचे और उसे बिक्री के लिए दूसरे दिन लगाया जाए। जमा, उसे हर डेस्टिनेशन पर एक जैसा इन्कलाबी रिसेप्शन हासिल हो? स्वाभाविक जवाब है, नहीं कर सकता था। चाह कर भी नहीं कर सकता था। लेकिन दावा आज तक बरकरार है कि पहले ही दिन ‘वर्दी वाला गुंडा’ पंद्रह लाख बिकी। गूगल तक में दर्ज है।
लेखक सिर्फ एक तरीके से इस स्कोर से वाकिफ हो सकता था।
किताब की काउन्टर सेल पंद्रह लाख हुई होती।
यानी मेरठ में प्रकाशक के ऑफिस-कम-गोडाउन से लाइन लगा कर इतनी बड़ी तादाद में किताब खरीदी गई होती। अगर ऐसा मुमकिन हुआ होता तो खरीदारों की कतार कम से कम आधा मील लम्बी होती और वो अपनी खरीद को ढोने के लिए टेम्पो, ट्रैक्टर ट्रॉली, ट्रक लेकर आए होते। फिर किताब यूं ही तो थमा न दी जाती, उसको पैक कर के आगे सौंपा जाता। लिहाजा एक ही दिन में इतनी पैकिंग और डिलीवरी हैन्डल करने के लिए 50-60 वर्करों की जरूरत होती, 15-16 क्लर्कों/कैशियरों की दरकार बिल बनाने और कैश हैन्डल करने के लिए होती और पंद्रह लाख किताब एकमुश्त सेल के लिए स्टोर करने के लिए प्रकाशक के ठीये जैसे 20-22 और ठीयों की जरूरत होती।
जमा, प्रकाशक के ऑफिस से सामने की सड़क पर रायट कंडीशन जैसा ट्रैफिक जाम होता।
तब कहीं जा कर वो सपना साकार होता जो लेखक ने देखा और पुस्तक प्रेमी अवाम को दिखाया।
इतने बड़े प्रिन्ट ऑर्डर से ताल्लुक रखता एक और भी पहलू है जिसे अपना मुंहफट दावा ठोकते वक्त लेखक ने नज़रअंदाज किया।
जैसा कि मैंने ऊपर दर्ज किया कि किताब सन् 1992 में वजूद में आई थी जबकि अभी अत्याधुनिक ऑफसेट प्रिंटिंग और ऑटोमैटिक बाइन्डिंग उपलब्ध नहीं थी, जिस के तहत आजकल 64 पेज इकट्ठे छपते हैं, कागज के दोनों तरफ़ एक साथ छपाई होती है और बाइन्डिंग का तो जानिए कि बाउन्ड बुक का डेली पेपर की तरह परनाला बहता है। जब किताब लेटर-प्रेस में छपती थी और बाइन्डिंग मैनुअल थी। लेटर-प्रेस में किताब की मैनुअली कम्पोज़िंग होती थी। प्रशिक्षणप्राप्त कम्पोज़िटर होते थे जोकि अक्षर, अक्षर जोड़ कर किताब का सोलह पेज का फर्मा तैयार करते थे और किताब लेटर-प्रेस में छपती थी। यू जो अक्षर इस्तेमाल होते थे, उन्हें टाइप कहते थे और टाइप की लाइफ बहुत लिमिटिड होती थी। दस से पंद्रह हजार तक के इम्प्रेशन के बाद टाइप बिगड़ जाता था और अगर उत्तम प्रिंटिंग दरकार हो तो कम्पोज़िंग फिर करानी पड़ती थी, बहुत बड़ा प्रिन्ट ऑर्डर हो तो फिर, फिर और फिर करानी पड़ी थी। ये एक टाइमखाऊ प्रोसेस थी अमूमन प्रकाशक जिस से बचते थे और अमूमन रीप्रिन्ट की जगह नई स्क्रिप्ट की तरफ तवज्जो देते पाए जाते थे।
प्रकाशक की दुश्वारी यहीं खत्म नहीं होती थी। ज्यादा बड़ी दुश्वारी बाइन्डिंग की शक्ल में अभी आगे खड़ी होती थी। गौरतलब है कि एक माकूल, मुस्तैद बाइन्डिंग हाउस तब एक दिन में तीन हजार से ज्यादा किताब नहीं बना पाता था क्योंकि सबकुछ तो मैनुअल था – फ़र्मे मुड़ते मैनुअली थे, उनकी सिलाई मैनुअली होती थी, टाइटल मैनुअली चिपकाया जाता था जिस के सूख जाने का इंतजार करना पड़ता था – जल्दी काट दिए जाने पर टाइटल ठीक से चिपका नहीं रहता था, कटिंग मशीन के दबाव में अपनी जगह से सरक जाता था, इसलिए किताब पर चढ़ा आड़ा तिरछा कटने लगता था और किताब को खराब करता था। इसका कुल जमा नतीजा ये होता थे कि एक बड़ा बाइन्डिंग हाउस भी एक दिन में तीन हजार से ज्यादा किताब नहीं बना पाता था इसलिए बड़ा प्रिन्ट ऑर्डर कई प्रिंटिंग प्रेसों और बाइन्डिंग हाउसों के हवाले किया जाना पड़ता था ताकि किताब का एडीशन जल्दी हो सके।
गौरतलब है कि हर रीप्रिन्ट के लिए हर बार किताब फिर कम्पोज़ करानी पड़ती थी और एक ही बड़े एडीशन के लिए एक ही वक्त में कई कई बार करानी पड़ती थी।
और बड़ा एडीशन – पहला बड़ा एडीशन – भी कितना बड़ा?
लेखक ने कभी न बताया। जिस को ये बताना हमेशा याद रहा कि किताब पहले ही दिन पंद्रह लाख बिकी, उसने ये बताना कभी जरूरी न समझा कि उस फर्स्ट एडीशन का साइज़ क्या था जिस में से पहले ही दिन पंद्रह लाख कॉपी बिकी!
आप कल्पना कीजिए! तीस लाख! चालीस लाख! पचास लाख!
बरायमेहरबानी ये न भूलें कि बाद में इस फिगर ने आठ करोड़ तक पहुंचना है। अब फर्ज कीजिए कि पहला एडीशन पचास लाख था – ऐसा हुआ होना नामुमकिन है, महज फर्ज कीजिए। तदुपरांत अगर हर बार किताब एक लाख रीप्रिन्ट हो – ये भी नामुमकिन है – तो किताब 750 बार रीप्रिन्ट हुई होनी चाहिए। यानी बारह महीने तीन सौ पैंसठ दिन दस-बारह लेटर-प्रेस प्रिंटर ‘वर्दी वाला गुंडा’ ही छापते रहे होने चाहियें और इतने ही मैनुअल बाइन्डिंग हाउस यू व्यस्त होने चाहियें।
पॉकेट बुक व्यवसाय में तब किसी किताब का प्रिन्ट ऑर्डर निर्धारित करने का एक स्टैन्डर्ड तरीका होता था। प्रकाशक चौतरफा सर्कुलर भेजता था कि उसके यहाँ से फलां महीने में इतनी किताबों का सेट प्रकाशित होने जा रहा था। बुक सेलर अपनी जरूरत के मुताबिक अपना इंडेंट भेजता था जिसे कम्प्यूट कर के प्रकाशक फैसला करता था कि उसने कौन-सी किताब कितनी संख्या में छापनी थी। मसलन यूं अगर उसे शर्मा की नई किताब के पचास हजार कॉपी के ऑर्डर हासिल होते थे तो उसकी कोशिश प्रिन्ट ऑर्डर को दस प्रतिशत कम रखने की ही होती थी क्योंकि कभी कोई ऑर्डर कैन्सल हो जाता था, कभी ऑर्डर का भेजा माल पार्टी छुड़ाती नहीं थी या कभी अनसोल्ड वापिस आ जाने का अंदेशा बन जाता था। ये एक मैकेनिकल प्रॉसेस थी, दस पाँच प्रतिशत की ऊंच नीच के साथ ही लेखक की एक स्थायी सेल का आंकड़ा यू प्रकाशक को उपलब्ध होता था और वो उसी के मुताबिक किताब प्लान करता था। अब अगर शर्मा की तुलसी में नए उपन्यास की स्थापित सेल पचास हजार चली आ रही थी तो वो अगले उपन्यास की पचास लाख नहीं हो सकती थी।
अब आप खुद सोचिए कि कैसे प्रकाशक ने ‘वर्दी वाला गुंडा’ का शुरुआती प्रिन्ट ऑर्डर निर्धारित किया? कैसे उसे इलहाम हुआ कि किताब की पहले ही दिन की सेल पंद्रह लाख पर पहुँचने वाली थी इसलिए उसे उससे कई गुणा – कई कई गुणा – ज्यादा किताब की सर्वत्र वितरण के लिए जरूरत पड़ सकती थी। फिर उस किताब से अगली किताब उतनी ही नहीं तो थोड़ी कम तादाद में छपती क्योंकि लेखक का सिक्का तो ‘वर्दी वाला गुंडा’ के सदके टकसाली साबित हो चुका था।
ऐसा तो न हुआ! उसी प्रकाशक की उसी लेखक की और कोई किताब तो ‘वर्दी वाला गुंडा’ के पास भी कहीं खड़ी दिखाई न दी – पास क्या, दूर भी कहीं दिखाई न दी!
अब ये भी सवाल है कि ऐसी सोना उगलने वाली किताब के होते लेखक का अपना प्रकाशन, जिसने कि मूलरूप से ‘वर्दी वाला गुंडा’ छापी थी, बंद क्यों हो गया? ऐसे प्रकाशन को कोई और किताब छापने की जरूरत ही क्या थी जबकि हकीकत ये है कि लेखक के अपने प्रकाशन में बाहरी लेखक भी छपे और घोस्ट लेखक भी छपे। आपके खादिम की वहाँ तेईस किताबें छपीं जिन में सत्तरह रीप्रिन्ट थीं और छ: नई थी। मेरे छ: नए नावलों के सिलसिले में लेखक का पार्टनर खुद कुबूल करता था कि उनके यहाँ शर्मा की नई किताब की और पाठक की नई किताब की सेल में उन्नीस बीस का ही फर्क था।
इस लिहाज़ से तो आप के खादिम की हर किताब प्रिन्ट ऑर्डर में और सेल में ‘वर्दी वाला गुंडा’ वाली ब्रैकेट में होनी चाहिए थी! कैसे होती? खुद लेखक की ही कोई दूसरी किताब उस ब्रैकेट में नहीं थी वरना उसका भी जिक्र ‘वर्दी वाला गुंडा’ जैसे ही बाजे-गाजे के साथ हुआ होता।
लेखक को लम्बी लम्बी छोड़ने की आदत थी, उसकी नीचे दर्ज मिसाल मुलाहजा फरमाइए:
किताब के प्रकाशन में विलम्ब इसलिए हो रहा है क्योंकि टाइटल लंदन में छप रहा है। पाठकगण संज्ञान लें कि खुद इंग्लैंड की उनकी भाषा की किताबें न्यूज़ीलैंड और सिंगापुर में छपती हैं।
कुछ रसूख वाले राजनैतिक नेताओं को किताब के टाइटल पर ऐतराज हुआ इसलिए टाइटल को मजबूरन काला पोतना पड़ा। किताब की टेक्स्ट से ऐतराज तो बहुत बार सुनने में आया था, किसी को टाइटल से ऐतराज हुआ, ये जरूर पहला वाकया था।
‘कानून का पंडित/बेटा लिखने की तैयारी के लिए मैंने एलएलबी की’। जबकि ‘पाखी’ के एक इंटरव्यू में लेखक ने खुद कुबूल किया है कि हिन्दी के अलावा उसे कोई भाषा नहीं आती।
न्यूजपेपर्स और जर्नल्ज़ की सर्कुलेशन को सत्यापित करने के लिए ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ नामक एक महकमा होता है जो प्रकाशक के इस बाबत क्लेम को बाकायदा चेक करता है और तमाम आँकड़े दुरुस्त पाता है तो सर्टिफिकेट जारी करता है जो कहता है कि फलां न्यूज़पेपर की, फलां मैगजीन की, इतनी सर्टिफाइड सर्कुलेशन है। पुस्तक प्रकाशन के धंधे में तो ‘एबीसी’ जैसा कोई महकमा है नहीं इसलिए लेखक – या प्रकाशक – इस बाबत कुछ भी कह सकता है। लेकिन जब कुछ भी कहा शक्ल से ही नामुमकिन दिखाई दे तो उस बाबत सवाल तो होना चाहिए! सवाल तो होना चाहिए कि क्या लेखक ऑफ हैंड बता सकता है कि करोड़ में कितने ज़ीरो लगते हैं!
कोई नहीं करता। लेखक ने कह दिया, सुनने वालों ने सुन लिया और आगे कोट कर दिया। अंधे ने अंधे को रास्ता दिखाया। बार बार उचरा गया झूठ सच होने की जिद करने लगा। कोई सुनने वाले से सवाल करे कि उसने ऐसी असंभव बात क्यों कुबूल कर ली तो जवाब मिलेगा:
लेखक कहता है।
फलां पेपर में छपा है।
गूगल कहता है।
तीसरी दलील सबका मुंह बंद कर देने के लिए काफी मानी जाएगी जोकि काफी नहीं है। गूगल में से वही निकाला जाता है जो उसमें फ़ीड किया जाता है। और ‘वर्दी वाला गुंडा’ सम्बन्धी फीडिंग का सोर्स क्या है? खुद लेखक, जिसे खुद को महिमामंडित करने के लिए झूठ बोलने से कोई गुरेज नहीं। जिसको दूसरे लेखकों के मुकाबले में खुद को दस हाथ ऊंचा करार देने से कोई गुरेज नहीं। अगर इंटरव्यू लेने वाला आपका खादिम हो और उसे लेखक का वो बड़ा बोल सुनना पड़े तो उसका लेखक से पहला सवाल होगा –
क्या लेखक ने आठ करोड़ बिकी होने वाली किताब की रॉयल्टी पर इंकम टैक्स भरा? उस वक्त पॉकेट बुक में छपी किताब के मूल संस्करण की कीमत दस रुपये होती थी जो बाद में होने वाले रीप्रिंट्स की निरंतर बढ़ती जाती थी। कीमत दस रुपये ही माने और लेखक को दस पर्सेन्ट रॉयल्टी मिलती मानें तो उसकी वसूली आठ करोड़ हुई। कम से कम इतनी ही प्राप्ति फर्म के पार्टनर के तौर पर प्रकाशन से हुई। अब लाख रुपये का सवाल है की क्या लेखक ने उस विपुल धनराशि पर इंकम टैक्स भरा जो कि करोड़ों में होता?
जाहिर है कि नहीं भरा। भरा होता तो वो खुद ही रिटर्न की कॉपी दिखाने को तड़प रहा होता। कैसे भरता, जबकि ऐसी कोई कमाई हुई ही नहीं थी।
कभी आशा भोसले का दावा था कि उसने हिन्दी में और क्षेत्रीय भाषाओं में चालीस हजार गाने गाए थे और अपने इस करतब को गिनिस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (Guinness book of world records) में दाखिल करवाने की कोशिश की थी। जाहिर है की मैडम नहीं जानती थीं कि ऐसे किसी दावे की वेरीफिकेशन के लिए बाकायदा लंदन से एक्सपर्ट आते थे जो जब मुम्बई आए थे तो जिन्हों ने दावे को भरपूर ‘पैडिड’ पाया था और खारिज किया था।
गनीमत हुई कि ऐसा कोई दावा ‘वर्दी वाला गुंडा’ की बाबत पेश करना शर्मा को कभी न सूझा वरना ‘गिनिस’ के विशेषज्ञ ही सत्यापित कर जाते कि दावा झूठा था, फरेबी था।………….….(क्रमश:)


