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उत्तर प्रदेश

तीन साल बाद सच की जीत, ड्रग माफिया का भंडाफोड़ करने वाले पत्रकार की रिपोर्ट पर मुहर

गोरखपुर में ड्रग माफिया नेटवर्क के खिलाफ एक खोजी पत्रकार की लड़ाई आखिरकार सच साबित हो गई है। 2022 में गोरखपुर के पत्रकार सत्येंद्र ने ड्रग विभाग के अफसर मोहन तिवारी और नशीली दवाओं के सौदागरों के गठजोड़ का खुलासा किया था। उस समय उनकी रिपोर्टिंग को झूठा बताकर न सिर्फ दबाव बनाया गया, बल्कि उन पर कई एफआईआर दर्ज कर दी गईं।

पत्रकार का कहना है कि दवाओं के काले कारोबार की जांच करने के बजाय प्रशासन ने उनकी साख पर हमला किया और उनके खिलाफ मुकदमों की बौछार कर दी। आरोप है कि उस समय आईपीएस अफसर कृष्ण कुमार की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही। बताया जा रहा है कि पत्रकार पर वीडियो हटाने का दबाव बनाने के लिए कानून का सहारा लिया गया।

अब बदली तस्वीर, मोहन तिवारी निलंबित
करीब तीन साल बाद आज वही खुलासा सच साबित हो रहा है। शासन ने मोहन तिवारी को निलंबित कर दिया है और ड्रग माफिया पर शिकंजा कसने की कार्रवाई शुरू हो चुकी है। सवाल यह है कि जिस पत्रकार की रिपोर्ट को कभी “मीडिया ट्रायल” कहकर खारिज कर दिया गया, आज वही रिपोर्ट सरकार की आधिकारिक फाइलों में दर्ज हो गई है।

पत्रकारों के प्रति व्यवस्था का रवैया
सत्येंद्र को झूठा बताने और बदनाम करने वाले कुछ मीडिया घराने भी अब सवालों के घेरे में हैं। पत्रकारिता जगत में यह बहस छिड़ी है कि जब सच्चाई सामने आ ही गई, तो क्या इस साहसी पत्रकार को सम्मान मिलेगा?

आईपीएस अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसे मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी? क्या उन आईपीएस अफसरों पर भी जांच होगी जिन्होंने पत्रकार को प्रताड़ित करने में भूमिका निभाई?

गोरखपुर का यह मामला एक मिसाल बन गया है कि सच देर से ही सही, सामने आता है। लेकिन पत्रकार सत्येंद्र की यह जंग यह भी याद दिलाती है कि “समय रहते सच का साथ देना ही असली साहस है।”

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