सुरेंद्र मोहन पाठक-
यहाँ मैं अत्यंत विनम्रता से खुद से ताल्लुक रखती एक मिसाल दर्ज करना चाहता हूँ: मुम्बई के एक फिल्म निर्माता के साथ दिल्ली हाई कोर्ट में मेरा एक केस था जिसने मेरी इजाजत के बिना मेरे उपन्यास ‘पैंसठ लाख की डकैती’ पर फिल्म बनाने की तैयारी कर ली थी। उपन्यास पर आधारित प्रेज़ेन्टेशन को जब उसने अपने नाम रजिस्टर भी करा लिया तो मजबूरन मुझे कोर्ट में जाना पड़ा। मेरे वकील ने मेरे से हासिल जानकारी के आधार पर केस तैयार कर लिया और अप्रूवल के लिए ड्राफ्ट मुझे भेजा तो मैंने पाया की उसमें ‘पैंसठ लाख की डकैती’ की सेल करोड़ों में दर्ज थी। मैंने तुरंत ऐतराज किया और कहा कि मैंने झूठ बोल कर अपना केस मजबूत नहीं करना था। वकील ने हवाला दिया कि एक करोड़ की सेल तो एक न्यूज पेपर कटिंग में ही दर्ज थी। मैंने कहा वो खबर भी गलत थी। मेरे उक्त उपन्यास के तेईस संस्करण हुए थे और उनकी टोटल सेल पचास लाख से ज्यादा नहीं थी और उसी के मुताबिक ड्राफ्ट को करेक्ट किया जाए, मैंने झूठ बोल कर केस नहीं जीतना था।
भारतीय पॉकेट बुक ट्रेड में दो ही ऐसे लेखक हुए हैं जिनकी किताब का प्रिन्ट ऑर्डर लाखों में होता था – एक गुलशन नंदा और दूसरे चेतन भगत। मैं यहाँ सिर्फ गुलशन नंदा का जिक्र करूंगा क्योंकि चेतन भगत इंग्लिश भाषा के लेखक हैं। अंग्रेजी में मुहावरा है, Apples should be compared with apples and oranges with oranges. इसलिए कम्पैरिजन में मैं नंदा जी का ही जिक्र करूँगा। नंदा जी जब पॉकेट बुक ट्रेड में कामयाबी के शिखर पर थे, तब हिन्द पॉकेट बुक्स ने उनका नावल ‘झील के उस पार’ छापा था जिस का ‘धर्मयुग’ के पहले पृष्ठ पर पॉकेट बुक्स के लिहाज़ से यादगार – और बहुत महंगा – विज्ञापन छपा था जिस में घोषणा की गई थी कि उपन्यास का पहला संस्करण ही पाँच लाख प्रतियों का हो रहा था।
क्या हुआ था?
नहीं, नहीं हुआ था। प्रकाशक ने खुद कुबूल किया था कि स्कोर तीन लाख तक भी नहीं पहुँच पाया था। गौरतलब है कि ये स्कोर प्रिन्ट ऑर्डर का था, बिक्री का नहीं था। प्रिन्ट ऑर्डर की नाकद्री का ये हाल था कि बाइन्डर प्रकाशक को कहते थे किताब उठाओ, हमारे पास स्टोरेज की जगह नहीं थी, प्रकाशक किताब नहीं उठाता था क्योंकि स्टोरेज प्रॉब्लम उसके साथ भी थी और आइंदा डिस्पैच का कोई हाल नहीं था। किताब की डिमान्ड बनी रहती तो प्रकाशक ही जिद करता कि किताब उसे फौरन भेजी जाती। वहाँ तो टालमटोल का खुल्ला आलम था। यानी कितनी ही किताब बिकने को भेजी जाने की जगह भटक रही थी क्योंकि कोई ‘टेकर’ नहीं था।
इसकी एक जुदा किस्म की मिसाल मुलाहजा फरमाइए।
उन्हीं दिनों मैंने अपने एक मित्र, हमउम्र प्रकाशक के साथ वैष्णों देवी गया। हम ट्रेन से जम्मू पहुंचे तो मित्र बोला कि करीब ही एक बड़ा बुकसेलर था जिससे वो अपने कारोबार के सम्बंध में मिलना चाहता था। यानी जम्मू में अपनी मौजूदगी का फायदा उठाना चाहता था। हम मुलाकात के लिए पहुंचे तो बुकसेलर प्रकाशक के साथ बड़े प्रेम भाव से मिला। उनके व्यापारिक वार्तालाप के दौरान मैंने दुकान में निगाह दौड़ाई तो पाया कि वो आम दुकानों के लिहाज से बहुत बड़ी थी और उसमें ‘झील के उस पार’ का इतना हेवी डिस्प्ले था कि लगता था कि बुकसेलर का सारा फोकस उस एक ही बुक की सेल पर था। लेकिन उसके दो तिहाई हिस्से में आजू से बाजू और नीचे से ऊपर तक आने वाला एक टेम्परेरी पर्दा टंगा हुआ था। मुझे बड़ा अजीब लगा। दुकान में ऐसे परदे का क्या काम? भद्दा लग रहा था, दुकान की शक्ल बिगाड़ रहा था। जब वो दोनों बातचीत में मशगूल थे तो तब मेरे से न रहा गया मैंने हाथ बढ़ा कर पर्दे का एक कोना थामा और उसे परे सरका कर उसके पीछे झांका।
परदे के पीछे छत तक ‘झील के उस पार’ भरी हुई थी।
तब तक प्रकाशक अपनी कारोबारी गुफ्तगू से फारिग हो चुका था इसलिए मैं बुक सेलर से पूछे बिना न रह सका, “इतनी किताब मंगा ली, अभी ढेर डिस्प्ले पर भी है, कब को बिकेगी?”
“बिक जाएगी।” उसने लापरवाही से जवाब दिया, “नंदा जी की किताब है, कहीं रुकती है!”
“रुकती तो नहीं लेकिन आपने तो डिमान्ड से कहीं ज्यादा मंगा ली! इतनी ज्यादा कि रखने की जगह नहीं हैं, आप खुद यहाँ फंस के बैठे मालूम पड़ रहे हैं!”
“टेम्परेरी दिक्कत है।” उसका जवाब फिर भी कान से मक्खी उड़ाने जैसा था।
“फिर भी, मैं गुस्ताखी की माफी के साथ पूछ रहा हूँ, इतना बड़ा ऑर्डर क्यों दिया जबकि आप की फौरी जरूरत, समझो कि एक तिहाई की थी?”
“यार, बाद में ऑर्डर करने पर किताब मिलती नहीं। रीप्रिन्ट में बड़ा टाइम लगता है। किताब फिर कम्पोज़ करानी पड़ती है न! इसलिए पहले ही ज्यादा मँगा ली।”
“इतनी ज्यादा, जो भले ही साल में खत्म हो!”
“इतना टाइम नहीं लगेगा, यार, नंदा जी की किताब है आखिर!”
आश्वस्त तो मैं न हुआ लेकिन खामोश हो गया।
साहबान, इस सूरतअहवाल की तुलना शर्मा के दूसरे दावे से कीजिए और अपना नतीजा खुद निकालिए।
कभी चेतन भगत के एक नावल की ये हाईप बनाई गई थी कि उसका प्रिन्ट ऑर्डर पच्चीस लाख था। यहाँ उसका जिक्र इसलिए है कि उसकी भी यादगार नाकद्री हुई थी। नावल दरियागंज के प्रसिद्ध संडे बुक बाजार में तो पटड़ी पर बिकता ही था, वहीं रोज़ दो सौ रुपये किलो भी बिकता था।
अगाथा क्रिस्टी के प्रसिद्धतम उपन्यासों में वरीयता से नाम ‘एंड देन देर वर नन’ (And then there were none) का आता है जिसकी नकल मार कर हिन्दी में ‘गुमनाम’ फिल्म बनी थी। उसको ‘बेस्टसेलर क्राइम नावल ऑफ आल टाइम्स’ का दर्जा हासिल है और उसकी ‘टोटल वर्ल्डवाइड सेल’ दस करोड़ बताई जाती है। और विश्व की सौ भाषाओं में ‘टोटल ग्लोबल सेल’ दो सौ करोड़ बताई जाती है। अब इसके समकक्ष ‘वर्दी वाला गुंडा’ को रखिए जिसका विश्व की किसी भाषा में तो क्या, भारत की ही किसी अन्य भाषा में अनुवाद नहीं हुआ, जिसके मूल प्रकाशन से कभी उसका रीप्रिन्ट नहीं हुआ, सन् 2020 तक – यानी मूल प्रकाशन से अट्ठाइस साल बाद तक – किसी दूसरे प्रकाशक ने जिसके पुनर्प्रकाशन में रुचि न दिखाई, उसकी सेल का स्कोर आठ करोड़ है। यानी क्रिस्टी को तो नाहक दुनिया ने आसमान पर चढ़ाया हुआ है, हमारा घर का क्रिस्टी तो अकेली हिन्दी भाषा में ही – जोकि आधे से ज्यादा भारत में नहीं बोली जाती – उसको बोल्ड कम्पीटीशन दे रहा है।
‘टॉप टेन हाइएस्ट सेलिंग मिस्ट्री बुक्स इन इंग्लिश’ के संदर्भ में कहा जाता है जिस के साथ दूसरे से दसवें नम्बर तक जिन बाकी नौ नावलों का जिक्र होता है वो टॉप सेलिंग, नम्बर वन बुक से बस जरा ही पीछे होते हैं। इसके विपरीत आठ करोड़ के स्कोर वाले ‘वर्दी वाला गुंडा’ का जिक्र आता है तो नम्बर दो से सौ तक भी कोई अन्य नावल जगह पाए नहीं दिखाई देता है। आप खुद बताइए, क्या ये मुमकिन है? किसी दूसरे लेखक के किसी नावल की मिलती जुलती हैसियत न सही, खुद शर्मा के भी ‘वर्दी वाल गुंडा’ के अलावा किसी नावल की ऐसी या उससे उन्नीस हैसियत न बनी! जब ‘वर्दी वाला गुंडा’ इतना नामुमकिन स्कोर खड़ा कर रहा था, तब लेखक के उससे पहले नावल की क्या पोज़ीशन थी? पहले से पहले नावल की क्या पोज़ीशन थी? सालों निरंतर लिखते रहने के बाद भी, पौने दो सौ उपन्यास लिख चुकने के बाद भी, लेखक के लिखे के साथ पहले कभी ऐसा कारनामा न हुआ? पहले क्या, बाद में भी न हुआ! हुआ ही नहीं! क्यों लेखक ‘वन बुक वन्डर’ बन के रह गया? क्यों नहीं कह पाता कि ‘वर्दी वाला गुंडा’ आठ करोड़ बिका तो कोई दूसरा गुंडा साढ़े सात करोड़ बिका, सात करोड़ बिका; तीसरा गुंडा साढ़े छ: करोड़ बिका, छ: करोड़ बिका, वगैरह!
पॉकेट बुक्स ट्रेड में सेल में इजाफे की एक अपनी केमिस्ट्री होती है। लेखक जैसे जैसे पॉपुलरिटी गेन करता है, वैसे वैसे उसके प्रिन्ट ऑर्डर में इज़ाफा होता है। ऐसा लेखक कोई नहीं हुआ जो एक ही छलांग में फर्श से अर्श पर पहुँच गया हो। लेखक कितना ही बढ़िया लिख ले, जब तक उसका लिखा पाठकों को नहीं कुबूल होने लगता तब तक उसका मुकाम नहीं बन पाता। ये एक ग्रेजुअल प्रोसेस है जिसमें न लेखक कोई हथेली लगा सकता है, न प्रकाशक कोई जैक लगा सकता है। फिर ये करिश्मा क्योंकर हुआ कि जिस लेखक का आम प्रिन्ट ऑर्डर हजारों में होता था, वो करोड़ों वाली ब्रैकेट में पहुँच गया! किसी ने ‘आबरा का डाबरा’ उचरा, किसी ने गिली गिली कह के कोई डंडा किताब या लेखक या प्रकाशक पर फिराया?
एक ही मुमकिन जवाब है। एक ही हजम होने वाला जवाब है:
कुछ न हुआ। सब झूठ है, फरेब है, शर्मनाक क्लेम है।
सर आर्थर कानन डायल (1859-1930) ने अपना पहला उपन्यास ‘ए स्टडी इन स्कार्लेट’ (A study in Scarlett) सन् 1887 में लिखा था। फिर सन् 1891 में उनका दूसरा नॉवेला (Novella) ‘दि साइन ऑफ फोर’ प्रकाशित हुआ था। तदुपरांत उन्होंने शरलॉक होम्ज़ को चित्रित करते दो और उपन्यास और 56 कहानियाँ लिखी थीं, जो तरतीबवार स्ट्रैन्ड मैगजीन में प्रकाशित हुई थीं। तब से आज का दिन है उनकी कोई रचना कभी डेड नहीं हुई, आउट ऑफ प्रिन्ट नहीं हुई। सारे विश्व में होम्ज़ के कारनामे छपते हैं और ये प्रमाणिक तथ्य है कि हर साल उनकी शरलॉक होम्ज़ स्टोरीज़ की पचास लाख प्रतियाँ बिकती हैं – हर साल बिकती हैं, किसी एक साल बिकी नहीं।
अब आप बाजार में जाकर ‘वर्दी वाला गुंडा’ तलाश कीजिए। कहीं दो कॉपी मिल जाएं तो करिश्मा जानिए।
आप ये भी न समझें कि ‘वर्दी वाला गुंडा’ के लाखों की तादाद वाले दर्जनों एडीशन दर्जनों प्रकाशकों ने छापे थे। ऐसा नहीं था। मेरी जानकारी में किताब को उसकी पूरी लाइफ में दो ही प्रकाशकों ने छापा था। एक लेखक के अपने प्रकाशन तुलसी पॉकेट बुक्स ने और दूसरा प्रकाशक हाल ही में पेंगविन की मिल्कियत हिन्द पॉकेट बुक्स था जिस पर किताब की फेक पब्लिसिटी की धौंस बस इतनी चली थी की उसने – प्रकाशित हिन्दी पुस्तकों की तादाद बढ़ाने के लिए – किताब का नया संस्करण निकाला था जो लाखों में हुआ हो, इसका खयाल भी नहीं किया जा सकता। आप मार्केट में इस किताब को ढूँढने जाइए, या तो मिलेगी नहीं या यूं मिलेगी जैसे कोई भूली बिसरी आइटम हो जो पुस्तक विक्रेता को भी याद न रही हो कि उसने कभी उसका ऑर्डर दिया था। सच पूछें तो किताब के दर्शन साल में एक ही बार संभव हैं, वो एक बार है विश्व पुस्तक मेला। वरना किताब ऑन लाइन मिले तो मिले, और कहीं मिलना नामुमकिन नहीं तो बहुत ही मुश्किल जरूर है। और ये हाल भी तब है जब कि किताब की खुशकिस्मती थी कि सन् 2020 में ‘हिन्द’ की उस पर नजरेइनायत हुई वरना किसी को याद भी न रहता कि कभी इस नाम का कोई उपन्यास रीडिंग पब्लिक का नूरेनजर हुआ करता था।
अब आप खुद फैसला कीजिए, आठ करोड़ का स्कोर बनाने वाली किताब की कद्र और पूछ ऐसी होती है!
लेखक की ज़िंदगी में उसकी स्पैशलिटी थी ‘वर्दी वाला गुंडा’ का गुणगान करना। मैं जब उस बड़े बोल से वाकिफ हुआ था तो लेखक द्वारा स्कोर चार करोड़ बताया जाता था। तदुपरांत जब भी उससे किताब के बारे में सवाल होता था, वो स्कोर में पचास लाख का इजाफा कर देता था और ऐसा लेखक तब तक करता रहा था जब तक कि स्कोर आठ करोड़ नहीं पहुँच गया था और जब तक किताब को छापने वाला ही कोई नहीं था लेकिन स्कोर था कि हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़ता ही जाता था और इस सिलसिले को तभी विराम लगा था जबकि दुर्भाग्य से लेखक की कदरन कम उम्र में मृत्यु हो गई, खुदा के करम से और जिंदा रहते तो स्कोर को निश्चित रूप से दस करोड़ तक – या और भी आगे तक पहुंचाते।
ये एक स्थापित तथ्य है कि पॉकेट बुक्स ट्रेड में गुलशन नंदा से मकबूलियत में बड़ा लेखक हिन्दी में आज तक नहीं हुआ। इस महकमे में नंदा जी के जौहर और पूछ से वो लोग भी वाकिफ हैं जिन्होंने उनकी कभी कोई किताब नहीं पढ़ी। किसी से भी पूछिए इस कारोबार का हिन्दी में सबसे मकबूल लेखक कौन है, बिना सोचे समझे सहज, सरल, स्वाभाविक जवाब श्रोता के मुंह से निकलेगा – गुलशन नंदा।
नंदा जी के मुकाबले में शर्मा ‘ऑल्सो रैन’ भी नहीं है फिर भी वो ‘वर्दी वाला गुंडा’ का बखान यू करता था, उसे यूं महिमा मंडित करता था, जैसे नंदा जी की उसके सामने कोई हैसियत ही नहीं थी।
भारत में दूसरा कोई फिनामिनल सेल वाला लेखक हुआ है तो वो चेतन भगत है। मैं निसंकोच कहता हूँ कि पापुलरिटी में शर्मा भगत की परछाईं भी कभी नहीं था। लेकिन उसका या उसके प्रकाशक का उसकी सेल के मामले में इतना बड़ा दावा कभी पेश नहीं हुआ। फिर भगत – या गुलशन नंदा – काहे का बड़ा राइटर हुआ जबकि उसकी लाखों की सेल से मुकाबिल करोड़ों की सेल वाला लेखक मौजूद था!
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