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आज के अखबार : मालदीव से ‘संबंधों’ का रीसेट बटन दबाने की सूचना में कहीं खुलापन, कहीं शर्म दोनों है

मालदीव से संबंध और भारत में बने हथियार से नीन्द उड़ना तो ठीक है पर किसकी नीन्द उड़ी है और कैसे पता चला यह कौन बतायेगा या कैसे पता चलेगा? ऑपरेशन सिन्दूर या पाकिस्तान पर हमला (जो युद्ध में बदल गया था) अचानक क्यों समाप्त हो गया, किसने करवाया और क्या सच है कि कई बार पूछने पर भी नहीं बताया गया तथा अब यह दावा। युद्ध में हुए नुकसान की चर्चा तो है पर उसकी पुष्टि या खंडन दोनों नहीं है।

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ में से तीन अखबारों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मालदीव में होने, वहां स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने, मुइज्जू के भारत को अहम साझेदार कहने जैसी खबरों के साथ यह सूचना दी है कि “मोदी, मुइज्जू ने द्विपक्षीय संबंधों में अहम सुधार के संकेत दिये”। यह द हिन्दू की लीड का शीर्षक है। अंग्रेजी में इसके लिए रीसेट शब्द का इस्तेमाल किया है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का फ्लैग शीर्षक है, भारत-मालदीव रीसेट। मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने समर्थन दोहराया तो मुइ्जजू ने भारत को एक अहम साझेदार कहा। उपशीर्षक है, मोदी ने मालदीव के स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लिया; मुइज्जू ने कहा, अहम दौरा संबंधों की स्पष्ट शुरुआत करेगा। दि एशियन एज का मुख्य शीर्षक है, “भारत मालदीव की चाहतों का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है : मोदी”। द हिन्दू का उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री ने भारत और मालदीव के बीच समय की जांच पर परखी मित्रता के लिए समर्थन को रेखांकित किया; द्वीप देश के राष्ट्रपति ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर जोर दिया लेकिन प्रमुख क्षेत्रों में विदेशी सहायता को स्वीकार किया। स्पष्ट है कि इन तीनों अखबारों ने बताया है कि मालदीव के साथ संबंध अब चाहे जितने अच्छे हों या अच्छे बनाने की कोशिश चल रही हो, यह सब रीसेट बटन दबाना है। यह उन पाठकों के लिए जरूरी था जो पुराने हैं और खबर में इसका जिक्र ढूंढ़ सकते हैं। फिर भी भारत में संसद का सत्र छोड़कर विदेश गये प्रधानमंत्री के दौरे की खबर इन्हीं तीन अखबारों में लीड है। चौथे, हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम की फोटो है। कैप्शन हिन्दी में कुछ इस प्रकार होगा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को माले में मालदीव के स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लिया। इन चार अखबारों के अलावा यह खबर देशबन्धु में पहले पन्ने पर है। बाकी में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

भारत में बने हथियार

प्रधानमंत्री मालदीव में हैं तो खबर लीड होना सामान्य है। फिर भी इन अखबारों के अलावा दूसरे अखबारों की दूसरी लीड है। उनपर आने से पहले आज का सबसे बड़ा प्रचार प्रधानमंत्री का यह दावा है कि आतंक के आकाओं की आज भी नीन्द उड़ाये हुए हैं भारत में बने हथियार : मोदी।  उपशीर्षक के अनुसार प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान दुनिया ने देखी मेक इन इंडिया की ताकत। यह खबर आज अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। इसे सेकेंड लीड भी मान सकते हैं। प्रधानमंत्री ने यह दावा इस तथ्य के बावजूद किये हैं कि भारत में बने हथियारों के कारनामों की कोई खबर चर्चा में नहीं है ना ही ऐसा कोई हथियार चर्चा में है। प्रधानमंत्री ने बताया जरूर है और यह सेकेंड लीड बनने के लिए पर्याप्त है लेकिन तथ्य यह है कि पहलगाम में इस्तेमाल किये गये हथियारों की चर्चा नहीं है और हाल की चर्चित घटना में क्या भारत में बने हथियार का इस्तेमाल किया गया था? तथ्य यह भी है कि हमलावर अभी तक पकड़े नहीं गये हैं उनके हथियारों का क्या पता होगा। हालांकि, मौके पर खाली खोखों से हथियार का पता चल जाता है। जाहिर है ऐसा कुछ होता तो खबर छपी होती या उसकी चर्चा होगी। आतंक के आकाओं की नीन्द जब हथियारों से ही उड़ी हुई है तो पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध किसलिये छेड़ा गया था और जब छेड़ ही दिया गया था तो ट्रम्प ने युद्ध विराम  की घोषणा कैसे की। पूरे मामले में कई झोल है। यह इतना बड़ा और गंभीर मामला है कि विपक्ष इसपर विशेष सत्र की मांग कर रहा था पर मानसून सत्र की घोषणा कर दी गई। अब सत्र के दौरान, पर सदन से बाहर यह दावा किया गया है और प्रचार के रूप में अमर उजाला में लीड बन गया है। आतंक के आका कौन हैं और उनकी नीन्द उड़ी हुई है ये कैसे पता चला?   

आप जानते हैं कि मालदीव से भारत के संबंध ठीक नहीं थे और भारत का विरोध करके मोइज्जू राष्ट्रपति बने हैं। फिर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके स्वतंत्रता दिवस समारोह में मेहमान हैं। इस कारण आज के कुछ शीर्षक याद रखने और गौर करने लायक हैं। लेकिन उससे पहले कुछ पुराने शीर्षक इस प्रकार हैं

  • मालदीव में क्यों चलाया जा रहा भारत के ख़िलाफ़ ‘इंडिया आउट’ कैंपेन – बीबीसी न्यूज (17 सितंबर 2020)
  • मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान #IndiaOut विरोध प्रदर्शन किस बारे में है? यह अब ज़ोर क्यों पकड़ रहा है? – द हिन्दू (27 सितंबर 2021)
  • मालदीव: ‘इंडिया आउट’ का नारा देने वाले मुइज़्ज़ू का भारत को एक और झटका, मोदी सरकार के पास क्या है काट? बीबीसी (16 दिसंबर 2023)  

इसके बावजूद आज के कुछ शीर्षक हैं

  • इंडिया ऑउट से इंडिया इन तक… चीन की गुलामी करने वाले मुइज्जू ने तोड़ा प्रोटोकॉल, भारत के खेमे में कैसे लौटे? एक्‍सपर्ट से समझें। – नवभारत टाइम्स

शीर्षक में जो समझ में नहीं आ रहा है वह यह कि लौटे तो मोदी हैं, मोइज्जू तो अपने ही देश में हैं। और खेमे में तो हो ही सकते हैं। मोदी के जाने से उनका लौटना कहां पता चल रहा है।

  • इंडिया का बॉयकॉट, चीन से दोस्ती; फिर डिफॉल्ट के टैग से बचने के लिए मोदी के सामने कैसे झुके मोहम्मद मुइज्जू? – दैनिक जागरण

कहने की जरूरत नहीं है कि स्वतंत्रता दिवस समारोह में निमंत्रण अगर झुकना है तो निमंत्रण स्वीकार करके देश में संसद सत्र और उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के विवाद के बीच जाना क्या है।

  • कंगाली का मंडराया खतरा तो उतर गया ‘इंडिया आउट’ का बुखार, भारत से क्यों रिश्ते मजबूत कर रहे मुइज्जू? – एबीपी लाइव डॉट कॉम

यहां भी वही बात है, कंगाली में कोई मेहमान बुलाता है? और जो मेहमान कंगाल मेजबान मेजबानी स्वीकार करे वह क्या होगा।

  • इंडिया आउट कहने वाले मुइज्जू ने अब क्यों कहा इंडिया इन, चीन को भी क्यों नहीं ऐतराज? समझ लीजिए सारी वजह – न्यूज18

इस शीर्षक से यह समझ में आ रहा है कि इसमें प्रधानमंत्री को महान बनाने की कोशिश हो भी तो बेशर्मी कुछ कम है या हिसाब से है। पर बाकियों ने तो मोदी को महान बनाने के लिए मन की बात कर दी है और ये भी नहीं सोचा कि पढ़ने वाला क्या सोचेगा। 

  • चीन के खिलाफ भारत की कूटनीतिक जीत? समझिए कैसे मोदी-मुइज्जू की ट्यूनिंग से ड्रैगन के सपनों पर फिरा पानी – जनसत्ता

इसमें समझने की बात तो यह भी है मोदी-मुइज्जू की ट्यूनिग कब और कैसे हुई? क्या इसका मकसद ड्रैगन के सपनों पर पानी फेरना ही था। कबरों से संदेश तो यह मिल रहा है कि ड्रेगन के साथ भी ट्यूनिग ठीक करने की कोशिश चल रही है।

इनके अलावा, आज के बाकी अखबारों की लीड इस प्रकार है

  1. राहुल गांधी ने फिर साधा निर्वाचन आयोग पर निशाना (फ्लैग) कांग्रेस की हार के लिए पक्षपाती अंपायर जिम्मेदार मुख्य शीर्षक)। गुजरात में कांग्रेस के जिला अध्यक्षों को संबोधित किया। (देशबन्धु)
  2. होमगार्ड परीक्षा में बेहोश युवती से अस्पताल ले जाते समय एंबुंलेंस में सामूहिक दुष्कर्म (अमर उजाला)
  3. भारत की अमरीका, ईयू व्यापार वार्ता उन्नत चरण में
  4. गया में एम्बुलेंस में बलात्कार के बाद चिराग ने नीतिश की आलोचना की (फ्लैग) अपराधों की बाढ़ पर बिहार के मुख्यमंत्री पर आरोपों की बौछार (द टेलीग्राफ)
  5. पाकिस्तान, चीन मोर्चे पर सेना अपनी ताकत बढ़ायेगी। (टाइम्स ऑफ इंडिया)  
  6. पहला चरण पूरा हुआ, बिहार के मतदाता सूची में 9% को निकाला जा सकता है। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, विपक्ष ने कहा कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ गठजोड़ की सहायता कर रहा है। इसपर एनडीए ने पलट वार किया। (हिन्दुस्तान टाइम्स)

वैसे भी, चुनाव आयोग की शिकायत की गई तो एनडीए को ‘पलटवार’ करने की जरूरत क्यों पड़ी। समझना मुश्किल नहीं है। ऊपर लिख चुका हूं कि प्रधानमंत्री के मॉरीशस दौरे से जुड़ी खबरों को लेकर जो शीर्षक हैं वो प्रधानमंभी, उनके काम और व्यक्तित्व की प्रशंसा करने वाले हैं। डबल इंजन वाले चुनावी बिहार राज्य में रेप की खबर अमर उजाला में दुष्कर्म है और द टेलीग्राफ के अलावा देशबन्धु में भी पहले पन्ने पर है। यहां इसका शीर्षक है, बिहार में कानून व्यवस्था पर बरसे चिराग (मुख्य शीर्षक है) नीतीश सरकार को समर्थन करने का दुख। यह भाजपा सरकार के खिलाफ बुहत सख्त टिप्पणी है लेकिन देशबन्धु और टेलीग्राफ में ही है। आज बिहार चुनाव से संबंधित आयोग का दवा हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है पर खबर यह भी है कि बिहार की मतदाता सूची पर कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। अब यह खबर तो सबको मालूम है। इसलिये इसे सभी अखबारों में प्रमुखता से नहीं छापा गया है। लेकिन चुनाव आयोग का यह दावा टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है कि बिहार में मरे हुए लोग भी एसआईआर के फॉर्म भर रहे हैं और उसने यह बात सुप्रीम कोर्ट से कही है। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, गंभीर फ्रॉड… चुनाव आयोग द्वारा नागरिकता की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघन करता है। अखबार ने एडीआर के हवाले से यह बात लिखी है। उपशीर्षक है, याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च अदालत में चुनाव आयोग के जवाबी शपथपत्र का जवाब दाखिल किया। आज की खबरों में चिराग पासवान वाली खबर लगती है कि वह नीतिश कुमार के खिलाफ है तो भाजपा के भी खिलाफ है और ऐसी खबर इतनी प्रमुखता से ज्यादातर अखबारों में छपी है तो सब सामान्य है। पर वह भाजपा की राजनीति भी हो सकती है और इसके जरिए भाजपा को नहीं, नीतिश को बदनाम किया जा रहा है। यह चिराग पासवान की जरूरत या राजनीति भी हो सकती है और इस खबर का प्रमुखता से छपना सामान्य तो नहीं ही है।

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