सुभाष सिंह सुमन-
ट्रंप चचा का दावा कि भारत की अर्थव्यवस्था ‘मरी हुई’ है, शुद्ध बकवास है। भारत न सिर्फ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, बल्कि 2014 से लगातार फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकॉनमी बना हुआ है। अगले कई दशकों तक ऐसा ही रहने वाला भी है। यह बात IMF कह रहा है।
IMF के हिसाब से 2025 और 2026 में भारत की GDP ग्रोथ 6.4% रहेगी, जो चचा के अमेरिका (2-3%) से बहुत आगे है। पिछले साल हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिका से दोगुनी तेजी से बढ़ी, और इस साल तीन गुना तेज होगी। भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 2030 तक तीसरी सबसे बड़ी बन जाएगी। तब हमसे आगे सिर्फ अमेरिका और चीन होगा। हमारी अर्थव्यवस्था की सबसे खास बात है कि हम बहुत ज्यादा निर्यात पर निर्भर नहीं हैं। हमारी खुद की खपत दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे तेजी से उभरता बाजार तैयार करती है।
कायदे से देखें तो हमारे बाजार की जितनी जरूरत अमेरिका को है, हमारे लिए अमेरिका उतना जरूरी नहीं है। सौदा इस बात पर होना चाहिए।
ट्रंप चचा की किताब में फैक्ट की परिभाषा ही अलग चलती है। दुनिया का हर सेंसिबल आदमी यह बात जानता है। लेकिन फिर भी अपने यहाँ कुछ लोग चचा की बात को ब्रह्मवाक्य मानकर इतनी तेज उड़ान भर रहे हैं, जैसे मस्क ब्रो का नया वाला रॉकेट पीछे लगा लिए हों।
ट्रंप चचा ने भारत पर जो टैरिफ लगाया है, वह क्या चीज है?
ट्रंप चचा के टैरिफ को सरल तरीके से समझने के लिए आयात शुल्क मान लीजिए। इसका नाम कुछ भी रख दें, काम आयात पर लगने वाले शुल्क का ही है। भारत पर 25 फीसदी टैरिफ का मतलब है, भारत के सामानों पर 25 फीसदी का आयात शुल्क। मतलब भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों पर यह 25 फीसदी शुल्क लगेगा। भारत के लिए यह निर्यात है, लेकिन अमेरिका के लिए आयात। इसी आयात पर अमेरिका शुल्क लगा सकता है, लगा रहा है।
इससे क्या होगा?
इससे होगा कि भारत से जाने वाला जो सामान अमेरिकी बाजार में पहले 100 रुपये में मिल रहा था, वह अब 125 रुपये में मिलेगा।
कौन भरेगा टैरिफ?
स्वाभाविक बात है, जो सामान खरीदेगा। अमेरिका के स्टोर में सामान अमेरिकी लोग ही खरीदेंगे। मैं या आप तो पैरासिटामोल खरीदने के लिए न्यूयॉर्क नहीं ही जायेंगे।
तो टैरिफ का क्या असर होगा?
टैरिफ का पहला असर होगा कि अमेरिकी लोग 100 रुपये की चीज 125 रुपये में खरीदेंगे। अमेरिका में महँगाई बढ़ेगी।
भारत में आम लोगों पर कितना असर होगा?
भारत में आम लोगों पर इस टैरिफ से उतना ही असर होगा, जितना दो दिन पहले रूस-जापान में सुनामी आने से हुआ है।
मतलब भारत में कुछ असर नहीं होगा?
बिलकुल होगा, लेकिन भारत में असर सेक्टर-स्पेसिफिक होगा। उदाहरण के लिए रत्न-आभूषण, दवा, वस्त्र-परिधान आदि। ये सारे सेक्टर श्रम-प्रधान हैं और अमेरिका इनके लिए ठीक-ठाक महत्व वाला बाजार है। भारत में बनने वाले सामान महँगे हो जायेंगे और वही सामान बांग्लादेश या वियतनाम में बनकर कुछ सस्ता पड़ेगा, तो भारतीय सामानों की अमेरिका में बिक्री कम हो जायेगी। बिक्री कम होगी तो उत्पादन भी कम होगा। लेकिन दूसरी तरफ नये विकल्प भी खुल रहे हैं। ब्रिटेन के साथ हमारा समझौता हुआ है। यूरोप के साथ जल्द होने वाला है। इससे पूरी तो नहीं, लेकिन बहुत हद तक भरपाई हो जायेगी।
आईटी सेक्टर?
आईटी सेक्टर पर अभी बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता है। ट्रंप टैरिफ फिलहाल गुड्स यानी वस्तुओं के लिए है। आईटी में हम सर्विस (सेवा) निर्यात करते हैं। अगर तनाव बहुत बढ़ जाता है तो संभव है आईटी सेक्टर पर बड़ा असर हो। हालाँकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है। आईटी सेक्टर की परेशानी ट्रंप टैरिफ नहीं, एआई है।
भारत की जीडीपी पर?
असर होगा, लेकिन बहुत सीमित होगा। जीडीपी का सरल मतलब है आर्थिक गतिविधियाँ। किसी खास अवधि में जो आर्थिक गतिविधियाँ होती हैं, उन सभी के मूल्य (वैल्यू) को जोड़कर जो आँकड़ा आता है, वही उस अवधि की जीडीपी है। आर्थिक गतिविधियों में कारखानों का विनर्माण और निर्यात भी आता है। तो असर बिलकुल होगा। विश्लेषणों से पता चलता है कि यह असर जीडीपी के 1% से भी कम होगा।
फिर कुछ ज्ञानी भारत में सामान महँगे होने की चिंता में क्यों दुबले हो रहे हैं?
भारत में कुछ खास लोगों को एक खास बीमारी है। चूँकि लोग खास हैं, उनकी बीमारी भी खास है। इसी बीमारी में 2014 से भारत में हिटलर के आने का ढोलहा पीटा जा रहा है, लेकिन हिटलर आने का नाम ही नहीं ले रहा है। दु:ख की बात है कि इस बीमारी का इलाज नहीं है।
भारत के लिए चिंता की बात क्या है?
कायदे से देखा जाये तो भारत के लिए चिंता की बात टैरिफ नहीं, ट्रेड डील है (क्यों, ये अलग से समझाया जायेगा)। टैरिफ पर आम भारतीयों की समझ बहुत कच्ची है और यह बहुत आम बात है। खास बात क्या है कि खास लोगों की समझ आम लोगों से भी गयी-गुजरी हुई है। खास लोगों को हर विषय का विशेषज्ञ बनने की चुल्ल है। यह चुल्ल भी गलत बात नहीं है। सोशल मीडिया के चरमोत्कर्ष काल में यह चुल्ल एक स्वाभाविक प्रवृत्ति बनती जा रही है। गलत बात है कि इस चुल्ल के निष्पादन से पहले थोड़ा पढ़-समझ लेना चाहिए। संध्याकर्म की तरह या ब्रेकिंग बिजनेस की तरह जब निष्पादन करते हैं, तो खास लोग उन बेचारे आम लोगों की सोच प्रदूषित कर देते हैं, जो अभी तक साफ बचे हुए थे।
(मैंने सोचा, कम-से-कम उन्हें तो सही-सही जानने का हक है, जो वास्तव में जानना चाहते हैं और मुझसे इन विषयों पर कुछ उम्मीद रखा करते हैं। इसीलिए आज थोड़ी मेहनत कर लिए।)
ये भी पढ़ें…


