समस्या यह नहीं है कि मतदाता सूची में नाम के लिए आधार को वैध दस्तावेज नहीं माना गया या ऐसी कोशिश लंबे समय तक कामयाब रही। समस्या यह है कि पासपोर्ट को भी नहीं माना जा रहा है और उस पर भी सवाल है या उसकी भी जांच की जरूरत समझी जा रही है। ऐसे में एक जन प्रतिनिधि, जिसका साक्षर होना कानूनन जरूरी नहीं है, ने अपने नेता से सवाल करने वाली अधिकारी के प्रमाणपत्रों को संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग की है। व्यवस्था ऐसी है कि प्रधानमंत्री की शिक्षा और डिग्री से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जरूरत ही नहीं है। शपथ पत्र की सत्यता की पुष्टि नहीं हुई है और पहले से सार्वजनिक दस्तावेज को गोपनीय बता दिया गया है। आरटीआई के तहत संबंधित आदेश को खारिज कर दिया गया है। वह भी तब जब डिग्री के मामले में (गैर भाजपाई) नेता के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन भाजपा वालों की डिग्री का मामला मुद्दा ही नहीं है। जाहिर है, व्यवस्था को ठीक करना जरूरी है। चीजों को समग्रता में देखा जाना चाहिये।
संजय कुमार सिंह-
इन दिनों देश में सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता और सर्वोच्चता से लेकर राज्यपालों के अधिकार और आधार की उपयोगिता तक के मामले चल रहे हैं। ऐसे कई मुद्दों पर मीडिया चर्चा नहीं है। सब अलग अपनी चला रहे हैं। व्यवस्था चरमरा गई है। उदारीकरण, उसके लाभ और सफलता के बावजूद प्रधानमंत्री स्वदेसी का राग अलापने लगे हैं। अपनी मनमानी और विरोधियों की परेशानी सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट समेत अदालतों को भी घसीट लिया गया है। नतीजा यही नजर आ रहा है कि व्यवस्था बहाल नहीं हो रही है फिर भी मीडिया में उसकी चर्चा या चिन्ता नहीं है। आज सभी अखबारों में यह खबर प्रमुखता से है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि बिहार में चल रहे एसआईआर के दौरान आधार कार्ड को व्यक्ति की पहचान के लिए 12वां मान्य पहचान दस्तावेज माना जाए। मेरे ख्याल से मुद्दा यह था कि एसआईआर गैर जरूरी है, समय कम है आदि आदि। आधार पर आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह दस्तावेज नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकता। खबरों में यह नहीं लिखा है कि मतदाता सूची भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है और दो-चार विदेशियों या तथाकथित घुसपैठियों के लिए देश के आम नागरिकों समेत पूरे सिस्टम को बेमतलब नहीं बनाया जा सकता है। भारत में नेपाल के नागरिक सामान्य तौर पर रह सकते हैं, जमाने से रह रहे हैं और सीमा के उस पार जाना या वहां से आने पर कोई रोक नहीं है। कोई औपचारिकता या हिसाब नहीं है। ऐसे में नेपाली नागरिक भारत में वोटर हो सकते हैं कि नहीं यह स्पष्ट होना चाहिये। तथ्य यह है कि 1956 से भारत में ‘अवैध रूप से रह रहे’ नागरिकों (महिलाओं) और यहीं शादी करने के मामले में किसी की कोई खबर नहीं है। ऐसे में क्यों माना जाये कि चुनाव आयोग की यह खोज सही है या किसी मायने में अर्थपूर्ण है? कायदे से ऐसे मामले उठाये ही नहीं जाने चाहिये या उठाये गये हैं तो आगे के लिए स्पष्ट निर्देश होने चाहिये वरना मतदाता सूची बनाना या उसमें नाम दर्ज करना पासपोर्ट बनाने से भी मंहगा हो जायेगा और तब क्या यह व्यवस्था चलेगी।
नागरिकता तय करने का काम चुनाव आयोग या उसकी ओर से तैनात किसी बीएलओ का नहीं हो सकता है। जो नियम है उसका पालन करना निश्चित रूप से आसान है लेकिन नियम को स्पष्ट नहीं करके या उसकी अस्पष्टका के आधार पर मनमानी करना या करने देना व्यवस्था नहीं हो सकती है। इसी तरह घुसपैठिये हैं तो समस्या घुसपैठ की है उनकी नागरिकता की नहीं होनी चाहिये। वे नागरिक हैं या नहीं उनकी पहचान किसी दस्तावेज से हो और कहा जाये कि वह दस्तावेज विश्वसनीय नहीं है तो आधार या किसी और दस्तावेज का क्या मतलब? लेकिन फर्जी डिग्री पर कार्रवाई नहीं होगी तो आधार पर कैसे होगी और नहीं होगी तो व्यवस्था कैसे चलेगी? जैसे चल रही है वह तो जिसकी लाठी उसकी भैंस का मामला है। देश में घुसपैठिये हैं तो तय होना चाहिये कि कौन हैं और यह भी तय होना चाहिये कि वे घुसपैठ कर कैसे गये और कर गये तो रह कैसे रहे हैं और इसे रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिये ताकि मतदाता की पहचान में दिक्कत नहीं हो। जो स्थितियां हैं उनमें मतदाता बनने के लिए बिहार के लोग और एक तरह से पूरा बिहार करीब दो महीने से परेशान है। इतनी परेशानी उठाकर कौन मतदाता बनेगा और जो बनेगा क्या वह आम नागरिक होगा जिसे सरकार चुनना है। जिसकी लाठी उसकी भैंस का फॉर्मूला मतदाता बनाने में ही लगा दिया गया है और बात ये होती है कि बैलट पेपर से चुनाव होते थे तो बूथ लूट लिये जाते थे। सच यही है कि जहां जो मजबूत होता था वही बूथ लूट पाता था। नई व्यवस्था यह नहीं हो सकती है कि जो डिजिटली मजबूत हो वही बूथ लूट ले या जो नियम बनाये वही अपने लोगों (या अपनी विचारधारा वालों) का जीतना सुनिश्चित कर दे। जो हो रहा है और काफी समय से चल रहा है वह यही है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी आगे के चुनाव भी हमेशा जीतने का प्रयास कर रही है। इसमें चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल की मिलीभगत तो साफ हो गई है लेकिन और भी संवैधानिक संस्थाओं को भाजपा (या सत्तारूढ़ दल अथवा उसकी विचारधारा) का समर्थन करते देखा जा सकता है। जो लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं उनपर दबाव तो स्पष्ट है। मेरी चिन्ता यह है कि अभी तक यह मुद्दा ही नहीं है।
मतदाता सूची में नाम के लिए आधार कार्ड तो छोड़िये, पहले से नाम होने को भी आधार नहीं मानना अति है। सरकारी तौर पर ऐसा किया गया होता तो बात समझ में आती लेकिन यह काम चुनाव आयोग अपने स्तर पर कर रहा है, सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में होने के बावजूद कर रहा है और उसके कहने के बावजूद करता रहा। ऐसे में कल का आदेश जारी करने में इतना समय तब लगा जब सुप्रीम कोर्ट में तमाम मामले पहले से लंबित हैं और लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा है। एक तरफ अगर यह तय नहीं हो रहा है या होने दिया जा रहा है कि नागरिकों की पहचान चुनाव आयोग क्यों, कैसे करे और किसलिये करे तो दूसरी ओर जो नागरिक है (राहुल गांधी) उसकी नागरिकता पर सवाल है और उसमें पासपोर्ट को भी वैध दस्तावेज नहीं माना जा रहा है और तथाकथित जांच या कार्रवाई चल रही है और यह वैसे ही है कि 1991 के पूजास्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम के बावजूद काशी-मथुरा का मामला जिन्दा है और आम नागरिक यह कहते नहीं हिचकता, “मैं जरूर चाहूंगा कि मेरे जीवन में काशी मथुरा का मसला निपट जाय और भव्य मंदिर बन जाए”। मुझे नहीं पता या समझ में नहीं आया कि अयोध्या में मंदिर बन जाने (या कश्मीर में 370 हटा दिये जाने से भी) देश या हिन्दुत्व का क्या भला हुआ। अगर इनका नहीं हुआ तो देश, जनहित या व्यवस्था का क्या लाभ हुआ। जाहिर है, कानून बनाकर मामले निपटाने, खत्म करने या नए को सामने आने से रोकने की कोशिश भी नाकाम है।
यह धार्मिक उन्माद फैलाने और नागरिक मानने या मतदाता बनाने के मामले में भी है। सरकार इसी से बनती है और यह एक खास विचारधारा को स्थायी संरक्षण दिलाने की कोशिश लगती है फिर भी जारी है। मेरा मानना है कि अयोध्या का मामला ‘निपट गया’, मानने वाले लोगों को इस बात से मतलब नहीं है कि इसके लिए क्या कीमत चुकानी पड़ी और वे चाहते हैं कि काशी-मथुरा का भी मामला निपटे – इसलिये यही सरकार बनी रहे और इसके लिए जो सब करे वह सही है। लेकिन एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश में यह सही नहीं हो सकता है और सभी जिम्मेदार लोगों, संस्थाओं को इसे समझना चाहिये इसके लिए काम करना चाहिये। यह इसलिए नहीं कि मुझे या ऐसा काम करने वालों को धर्म पसंद नहीं है या लोकतंत्र पसंद है या नहीं है बल्कि इसलिये कि भारत को जो बनाने की कोशिश की जा रही है वह पाकिस्तान और नेपाल पहले से है और वह किसी भी सूरत में भारत से बेहतर नहीं है। अगर भारत को पाकिस्तान या नेपाल जैसा ही बना दिया जाये तो देश को, यहां की जनता को कोई लाभ नहीं होगा और हम अभी यह सब कह पा रहे हैं पाकिस्तान जैसे हो गये तो कह भी नहीं पायेंगे और कहेंगे या कामयाब ही हो गये तो कहीं बांग्लादेश जैसे न हो जायें। फिर भी सब चल रहा है तो इसके कई कारणों में एक यह भी है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सच नहीं बताता और अपनी भूमिका सही ढंग से नहीं निभा रहा है।
आज आधार पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश खूब छपा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, नेताओं को मोटी चमड़ी का होना चाहिये – वह पहले पन्ने पर प्रमुखता से नहीं है। तेलंगाना भाजपा के महासचिव वेंकटेश्वरलू ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के खिलाफ मानहानि का दावा किया था। उन्होंने दावा किया था कि 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान रेड्डी ने कहा था कि अगर बीजेपी 400 सीट जीती तो आरक्षण समाप्त कर देगी। भाजपा महासचिव का कहना था कि इससे पार्टी को नुकसान हुआ है। इसपर तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि, नेताओं को मोटी चमड़ी का होना चाहिए, राजनीतिक लड़ाइयों के लिए सुप्रीम कोर्ट का उपयोग नहीं करना चाहिए। सीजेआई बीआर गवई, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने याचिका भी खारिज कर दी। हैदराबाद ट्रायल कोर्ट ने पिछले साल अगस्त में कहा था कि रेड्डी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत मानहानि के अपराध और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125 के तहत केस बनता है। अधिनियम की धारा 125 चुनाव से जुड़े वर्गों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित थी। रेड्डी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसमें दावा किया गया कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से उनके खिलाफ केस नहीं बनता। उन्होंने तर्क दिया था कि राजनीतिक भाषणों को मानहानि का विषय नहीं बनाया जा सकता। मुझे लगता है कि नेताओं के खिलाफ इस खबर को हेडलाइन मैनेजमेंट ने निगल लिया है और इसीलिए यह अमर उजाला तथा टाइम्स ऑफ इंडिया को छोड़कर मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। मुझे लगता है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर यह कड़ी टिप्पणी है और मौजूदा समय में पर्याप्त महत्वपूर्ण है।
आज उपराष्ट्रपति का चुनाव है। यह खबर भी महत्वपूर्ण है और सोशल मीडिया पर कई खबरें हैं जो इस चुनाव को महत्वपूर्ण बनाती हैं। पाठकों की उत्सुकता तो होगी ही। दि एशियन एज ने इस खबर को पांच कॉलम में छापा है और शीर्षक का भाव है, एनडीए की जीत तय। पर मुद्दा यह है कि इसमें नया क्या है और आंकड़ों के अनुसार जीत तय है फिर यह पहले पन्ने पर छह कॉलम की खबर कैसे हुई और अगर आज छह कॉलम की है तो कल जीत के बाद खबर बैनर होगी? दि एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने राजग के सांसदों से अपील की कि ‘स्वदेशी मेला’ का आयोजन करें”। यह खबर आज मेरे किसी और अखबार में लीड नहीं है। द टेलीग्राफ, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू की आज की लीड बिहार के एसआईआर के लिए आधार को 12वां दस्तावेज मानने की खबर लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध में आंदोलन और इसमें 19 लोगों की मौत की खबर है। अमर उजाला की लीड यही है पर शीर्षक थोड़ा अलग है, नेपाल में हिंसक प्रदर्शन और 20 मौतों के बाद सोशल मीडिया से प्रतिबंध हटा। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, नेपाल में उबाल।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


