संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मणिपुर यात्रा से संबंधित खबरें भरी हुई हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक के अनुसार, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उसे नियमित अंतराल पर एसआईआर कराने के लिये नहीं कहा जा सकता है। द हिन्दू के शीर्षक के अनुसार, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि, एसआईआर कब और कैसे करायें – से संबंधित फैसला करने का ‘विशिष्ट’ अधिकार उसके पास है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज पहले पन्ने पर आधा से ज्यादा विज्ञापन है। लिहाजा, मणिपुर की खबर तो लीड है लेकिन चुनाव आयोग की खबर सिंगल कॉलम की है। शीर्षक के अनुसार चुनाव आयोग ने शपथपत्र में कहा है कि एसआईआर पर केवल हम फैसला करते हैं, सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इंडियन एक्सप्रेस में मणिपुर की एक से ज्यादा खबर है। विज्ञापन नहीं है लेकिन चुनाव आयोग की खबर नहीं है। दि एशियन एज में भी पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है। मणिपुर और प्रधानमंत्री की कई खबरें हैं लेकिन चुनाव आयोग की खबर नहीं है। भाजपा के प्रचार की एक एक्सक्लूसिव खबर है, युवा सांसद बिहार के युवाओं को प्रभावित करेंगे। द टेलीग्राफ में भी आधे पन्ने पर विज्ञापन है, मणिपुर दौरे की खबर लीड है लेकिन एसआईआर की खबर सिंगल कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया की तरह यह भी खबर अंदर होने की सूचना है जो इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस में मणिपुर दौरे से संबंधित अंदर की खबरों की सूची भी पेज एक पर है। ऐसे में मीडिया के लिए यह मुद्दा ही नहीं है कि चुनाव आयोग के मुखिया की नियुक्ति ही जब विवादों में है तो चुनाव आयोग के अधिकार की बात उसके बाद ही होनी चाहिये।
मेरे तीन हिन्दी अखबारों में अमर उजाला में मणिपुर की खबर लीड है। उसके बराबर में चुनाव आयोग की खबर है लेकिन शीर्षक वो नहीं है जो दूसरे अखबारों में है। अमर उजाला में मुख्य शीर्षक है, अगले साल से देशभर में कराई जाएगी एसआईआर। फ्लैग शीर्षक से बताया गया है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में ऐसा कहा है। जो खबर दूसरे अखबारों में मुख्य शीर्षक है वह यहां डेढ़ कॉलम की एक दूसरी खबर का शीर्षक है, एसआईआर को लेकर आयोग को पूर्ण विवेकाधिकार, कोई भी निर्देश अतिक्रमण। नवोदय टाइम्स में मणिपुर की खबर लीड है। शीर्षक दिलचस्प और वोट बटोरू है – मोदी पहुंचे मणिपुर का दुख बांटने। उपशीर्षक में बताया गया है कि विस्थापित परिवारों से बात की और 7300 करोड़ की परियोजनाओं की आधारशिला रखी। आज की ज्यादातर खबरों और शीर्षक में 865 दिन बाद मणिपुर जाना मुद्दा नहीं है और सरकारी परियोजनाओं के लिए धन की खबर ऐसे छपी है जैसे किसी राजा ने रियाया को इंतजार का फल बांटा हो। अव्वल तो इतने दिन बाद दौरे की खबर पहले पन्ने लायक नहीं थी पर ऐसा होता भी नहीं है और इसलिए इसे पत्रकारिता के सामान्य पैमाने से नापा भी नहीं जा सकता है। लेकिन दिखाई दे रहा है कि परियोजनाओं की धनराशि से इसे बड़ी खबर बनाया गया है। यह मोदी सरकार का हेडलाइन मैनेजमेंट है। हिंसा ग्रस्त क्षेत्र में प्रधानमंत्री 865 दिन बाद गये यह मुद्दा गौण हो गया, शीर्षक में कहीं दुख बांटने की सूचना है तो कहीं यह आश्वासन कि, शांति व स्थिरता के प्रयासों में सरकार साथ है।
आप जानते हैं कि मणिपुर में जातीय हिंसा भड़की थी और भले ही इसका कारण गुजरात दंगे के कारण से अलग हो पर मामला दो समुदायों का ही था। जेल में बंद, आईपीएस की नौकरी से हटा दिये गये संजीव भट्ट ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने 27 फरवरी 2002 को एक उच्च स्तरीय बैठक में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से कहा था कि हिंदुओं को “अपना गुस्सा निकालने” दिया जाए। भट्ट ने यह भी दावा किया था कि उसी बैठक में यह कहा गया था कि मुसलमानों को “सबक सिखाया जाए” और अधिकारी हिंसा रोकने में उदासीन रहें। यह अलग बात है कि नरेन्द्र मोदी ने इससे इनकार किया और एसआईटी को इसका कोई भरोसेमंद सबूत नहीं मिला। मुझे मणिपुर का मामला ऐसा ही लगता है और लड़ने वालों को लड़ने-मरने के लिये छोड़ दिया गया था, भले ऐसा आदेश नहीं दिया गया हो पर दो साल हाल पूछने नहीं जाना गुजरात मामले में जो आरोप है उससे मेल खाता है। पद बदलने या बढ़ने का असर वैसा ही है जैसा इस सोच में अपेक्षित होगा। पर यह सब खबर नहीं है और हो भी नहीं सकती। इसके बावजूद मणिपुर दौरे की खबरों और शीर्षक से पता चलता है कि इनमें सरकार और नरेन्द्र मोदी का प्रचार कूट-कूट कर भरा हुआ है। इसके लिए प्रधानमंत्री के प्रयास कम नहीं हैं और शीर्षक से यह भी दिखता है।
उदाहरण के लिए देशबन्धु में (फ्लैग) शीर्षक है, हिन्सा के दो साल बाद मणिपुर पहुंचे मोदी, बोले (मुख्य शीर्षक) मणिपुर मां भारती के मुकुट पर सजा रत्न। कहा जा सकता है कि मां भारती के माथे या मुकुट की चिन्ता तो की जानी चाहिये थी रत्न की नहीं की गई और अब 8500 करोड़ दे दिये तो भरपाई हो गई। यह सही हो या गलत – एक सोच तो हो ही सकती है। और सोच न भी हो तो जो हुआ और मामले को जैसे रिपोर्ट किया गया है उससे ऐसा ही लगता है। देशबन्धु में चुनाव आयोग वाली खबर तो नहीं है लेकिन भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच पर उद्धव ठाकरे का विरोध प्रमुखता से छपा है। मुख्य शीर्षक है, मोदी ने देशभक्ति का व्यावसायीकरण कर दिया है। उद्धव ठाकरे की फोटो दो कॉलम में छपी है और उसके नीचे बड़े फौन्ट में लिखा है, मोदी को याद दिलाया ‘पानी और खून’ वाला बयान। आपको बता दूं, आज एशिया कप 2025 में भारत बनाम पाकिस्तान का मैच होगा। यह दुबई इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में भारतीय समयानुसार शाम 8:00 बजे से खेला जाना है। आप जानते हैं कि अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे। तब भारत सरकार ने इसे पाकिस्तान की करतूत कहा था और पाकिस्तान के साथ युद्ध भी छेड़ दिया गया था। इसके बाद जो सब हुआ वह भले राजनीति हो लेकिन पाकिस्तान से मामला निपटा नहीं है। पर मैच हो रहा है। निपटा तो तब भी नहीं था जब 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को भी शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। अब बहु‑राष्ट्रीय टूर्नामेंट की बाध्यता बताई जा रही है। भारत सरकार और बीसीसीआई ने तर्क दिया है कि एशिया कप, आईसीसी टूर्नामेंट जैसे बहु‑देशीय में भाग लेने से इंकार करना संभव नहीं होता। यदि टीम हिस्सा न ले तो पॉइंट गंवाने होते हैं।
जो भी हो, युद्ध संभव है (था) पर ट्रम्प के युद्धविराम से इनकार करना भी संभव नहीं हुआ और पॉइंट तो छोड़िये युद्ध में जान गवांने की भी चिन्ता नहीं की जाती है। सब करके भी क्रिकेट मैच खेला जायेगा और उसका बचाव किया जा रहा है। हालांकि, नवोदय टाइम्स के अनुसार, भारत पाकिस्तान के बीच मैच को लेकर हाइप नहीं है। आज होने वाले मैच के लिए शनिवार तक टिकट उपलब्ध थे। शुक्रवार को भारत के अभ्यास सत्र में भी बहुत कम लोग थे। पहलगाम हमले में मारे गये शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशन्या ने कहा है और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है, बीसीसीआई के लिए उनकी शहादत का कोई मूल्य नहीं है। शायद इसलिये कि उनलोगों ने अपने किसी को नहीं खोया। इस मैच का बहिष्कार करें इसे टेलीविजन पर न देखें। इस मैच से पाकिस्तान पहुंचने वाला हर एक रुपया निश्चित रूप से आतंकवाद के लिए इस्तेमाल होता है। खेलकर हम उन लोगों को मजबूत कर रहे हैं जो हमपर हमला करते हैं। यहां बहुत सामान्य सा सवाल है, आपरेशन सिन्दूर चलाने वाले कहां हैं। कहीं हों, मणिपुर यात्रा से शानदार हेडलाइन मैनेजमेंट हुआ है। आइये, आज के शीर्षक देख लें। अनुवाद मैंने किया है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, मोदी ने जातीय हिंसा प्रभावित मणिपुर में सद्बाव की अपील की। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने हिंसा प्रभावित मणिपुर में जातीय आधार पर बंटे को एक करने पर जोर दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, मणिपुर में मोदी : पहाड़ और घाटी में सद्भाव के सेतु की आवश्यकता। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “मणिपुर में प्रधानमंत्री ने विभाजन को पाटने की कोशिश की : शांति जरूरी है, मैं आपके साथ हूं, भारत सरकार आपके साथ है।” दि एशियन एज का शीर्षक है, “मोदी ने मणिपुर को शांति, संपन्नता का प्रतीक बनाने की प्रतिज्ञा की”। अंग्रेजी अखबारों के ये सारे शीर्षक सरकार की तारीफ करने वाले हैं और लगभग वही सब हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहे, किये या दिये हैं। अकेले द टेलीग्राफ का शीर्षक आलोचनात्मक है। अखबार ने 864 दिन को ही मुख्य शीर्षक बनाया है और याद दिलाया है कि इस दौरान 260 से ज्यादा मरे, कम से कम 60,000 विस्थापित हैं, राज्य जलकर बर्बाद हो चुका और बिखरा हुआ है, आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी को मणिपुर जाने का समय मिला। शीर्षक है, भविष्य की राह और रोडमैप जो उन्हें नहीं मिला।
कहने की जरूरत नहीं है कि ज्यादातर अखबारों की खबर जो लीड की जगह छपी है, वही है जो प्रधानमंत्री चाहते होंगे। 864 दिन मणिपुर नहीं जाने, तमाम विरोध और इस दौरान मुद्दे पर मुंह सिले रहने के बावजूद। आज जो दो बड़ी खबरें हैं वह इसके चक्कर में दब गई। चुनाव आयोग का यह कहना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है कि वह एसआईआर के संबंध में स्वयं निर्णय ले सकता है और किसी को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। इससे पहले चुनाव आयोग कह चुका है कि वह संवैधानिक संस्था है और सुप्रीम कोर्ट के कई बार कहने पर भी उसने आधार को वैध दस्तावेज नहीं माना। लिखित आदेश का क्या हुआ पता नहीं और अब यह दावा। वैसे तो इस मामले में कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट को करनी है और मुख्य न्यायाधीश कह चुके हैं कि हमें अपने संविधान पर गर्व है। इसलिए मुझे यकीन है कि कोई ना कोई रास्ता जरूर निकलेगा लेकिन जो स्थितियां हैं उनपर गौर करने की जरूरत है और चिन्ता की बात यह है कि मीडिया इनपर ध्यान नहीं देता है या मौके पर इनकी चर्चा नहीं करता है। संवैधानिक संस्था और एसआईआर के मामले में अधिकार संपन्न होने का दवा करने वाला चुनाव आयोग वोट चोरी के आरोपों पर चुप है, शिकायत के साथ शपथ पत्र मांगने का कोई मतलब नहीं है पर खबरों से लगता है कि समाजवादी पार्टी ने शपथपत्र के साथ शिकायत दी है, उसके बारे में झूठ बोला गया है और शपथपत्र के साथ शिकायत होने पर भी कार्रवाई नहीं की गई है।
बिहार में एसआईआर के दौरान गड़बड़ियों की तमाम शिकायतों के बावजूद चुनाव आयोग अपने ढंग से, दूसरे स्टेक धारकों को जबरन जोड़कर या बनाकर काम करवाने के लिए आमादा है और जो गलतियां हुई हैं उसके लिए कोई जवाबदेही नहीं है। 65 लाख नाम बिना आवेदन हटा दिये गये पर जोड़ने के लिए आवेदन चाहिये। तेजस्वी यादव जैसे मतदाता का नाम नहीं होने की शिकायत पर दो एपिक नंबर का नाटक रचा गया, नोटिस दी गई लेकिन कार्रवाई के मामले में क्या हुआ नहीं बताया। डेढ़ महीना होने को आये। पवन खेड़ा कांग्रेस की ओर से आरोप लगाते रहे हैं उन्हें भी दो एपिक कार्ड या दो जगह नाम के मामले में फंसाने की कोशिश हुई है जबकि अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि पवन खेड़ा का मामला 2017 का है। नाम स्थानांतरित करने के आवेदन के साथ उन्होंने पुरानी जगह से नाम हटाने का आवेदन दिया था। इसकी पावती उनके पास है लेकिन मामला अब उठाया गया है तो जाहिर है सब कुछ ठीक नहीं है और जो भी हो, चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण नहीं है। इसलिये यह तो कहा ही जा सकता है कि चुनाव आयोग को अधिकार भी हो तो वह अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है या कर पा रहा है। उसके खिलाफ कई शिकायतें हैं, जवाब नहीं है और जो है वह संतोषजनक नहीं है। ऐसे में उसका यह दावा और देश भर में एसआईआर कराने का निर्णय अगर समीक्षा के योग्य है तो उसकी चर्चा मीडिया को जरूर करनी चाहिये। खासकर नए दावे के संदर्भ में। वैसे भी मुख्य चुनाव आयुक्त का दावा मीडिया के लिए मुद्दा होना चाहिये क्योंकि उनकी नियुक्ति को ही चुनौती दी गई है और मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
जहां तक मुझे याद है, सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने एक फैसला दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक चयन समिति के माध्यम से होनी चाहिए। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। इस फैसले के बाद, केंद्र सरकार ने 2023 में एक नया कानून पास किया जिसमें चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया और समिति में एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इस संशोधन/नये कानून को याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और अन्य संगठनों‑व्यक्तियों ने यह दलील दी है कि चयन समिति में सीजेआई की मौजूदगी संविधान पीठ के फैसले के अनुरूप थी और नये कानून से चुनाव आयोग या आयुक्त की संवैधानिक स्वतंत्रता तथा चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की तारीख तय की लेकिन कई बार सुनवाई स्थगित हो गई है। अब पता नहीं इस मामले की क्या स्थिति है, एडीआर के प्रमुख का निधन हो चुका है। दूसरी ओर, नियुक्ति के समय भी कहा गया था कि जब मामला अदालत में है तो सरकार को फैसले का इंतजार करना चाहिये था। जो भी हो, याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अपील की है कि 2023 के नए कानून पर रोक लगायी जाए लेकिन अभी ऐसा हुआ नहीं है। मामला खत्म भी नहीं हुआ है। मुझे लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति ही संदेह के घेरे में है तो उनके दावे पर सुनवाई करने से पहले जरूरी है कि उनकी नियुक्ति से संबंधित निर्णय कर लिया जाये।
दूसरी ओर, मीडिया के लिए तो यह मुद्दा होना ही चाहिये। पर ऐसा कुछ मीडिया में आपको दिखा क्या? वोट चोरी के आरोप से लेकर, तेजस्वी को नोटिस, तेजस्वी के आरोप, पवन खेड़ा को नोटिस उसका जवाब उसपर लंबित कार्रवाई और जवाब सब मीडिया की चर्चा के केंद्र में होना चाहिये पर ऐसा कुछ नजर नहीं आता है। वह भी तब जब चुनाव आयोग मनमानी करेगा, वोट चोरी पर कार्रवाई नहीं करेगा और पहले से चुनी हुई सरकार चुनाव नहीं हारेगी और वह मतदाता सूची ऐसी बनायेगा जो जीती हुई पार्टी के अनुकूल हो तो देश में चुनाव का क्या मतलब रह जायेगा। वह भी तब जब देश में अनिल मसीह जैसे अधिकारी हैं जो पंचपरमेश्वर की भूमिका में होने के बावजूद बेईमानी के आरोपी हैं और सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की है। अब उसी सुप्रीम कोर्ट से कहा गया है अनिल मसीह जैसे अधिकारियों वाला चुनाव आयोग अपनी मर्जी से एसआईआर करा सकता है और उसी समय (या उससे पहले) करायेगा जब देश में जनगणना होनी है। आप जानते हैं कि 2021 की जनगणना अभी तक नहीं हुई है। अगली जनगणना 2027 की कही जायेगी। जनगणना से संबंधित हाउस‐लिस्टिंग / पूर्व तैयारी आदि कार्य संभवतः अप्रैल 2026 से शुरू हो सकते हैं और असली गिनती तथा डेटा संग्रह मुख्य रूप से मार्च 2027 में पूरा होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इसके साथ मतदाता सूची का काम हो जाये तो बहुत कम खर्च में ज्यादा शुद्ध सूची बन सकती है। इसके लिए शुद्ध मतदाता सूची और धन की बर्बादी रोकने की इच्छा शक्ति नेताओं में होनी चाहिये जो अभी दुर्लभ है। मीडिया इसके लिए माहौल बना सकता है लेकिन वह भी अपने फैसले खुद करने के लिए स्वतंत्र और अधिकृत है। ऐसे में देखते रहिये ऊंट किस कंरवट बैठता है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


