तिरुवनंतपुरम। “बस्तर अब एक युद्ध क्षेत्र जैसा बन गया है।” — यह कहना है प्रखर समाचार से जुड़ी पत्रकार पुष्पा रोकड़े का। केरल इंटरनेशनल मीडिया फेस्टिवल में मंगलवार को आयोजित पैनल चर्चा ‘मिररिंग द ट्रुथ’ में उन्होंने बताया कि संघर्षग्रस्त क्षेत्र में पत्रकारिता करना किस तरह का जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण कार्य है।
पुष्पा रोकड़े ने कहा कि पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि गाँववालों की परेशानियों पर लिखें तो सरकार उन्हें माओवादी समर्थक मान लेती है। लेकिन अगर उनकी कहानियाँ न लिखें तो कई ग्रामीण मारे जाते हैं या जेल में डाल दिए जाते हैं।
जंगलों में पैदल सफर और महिलाओं की कठिनाई
अंग्रेजी अखबार द हिंदू की वेबसाइट में प्रकाशित इस बातचीत के अनुसार, पुष्पा बस्तर की उन गिनी-चुनी महिला पत्रकारों में से एक हैं, जो घंटों जंगलों में पैदल चलकर गाँववालों की स्थिति दर्ज करती हैं—चाहे वह भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतें हों या सरकार के खिलाफ उनकी शिकायतें। उनका कहना है कि इन कहानियों को दुनिया तक पहुँचाना बेहद कठिन है।
मुकेश चंद्राकर की हत्या
चर्चा के दौरान उन्होंने बीजापुर के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या का ज़िक्र किया। मुकेश एक सड़क निर्माण प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार का खुलासा कर रहे थे, जिसकी लागत 50 करोड़ से बढ़कर 120 करोड़ रुपये तक पहुँच गई थी।
रोकड़े और उनके साथियों को शक हुआ और जब उन्होंने दबाव बनाया, तब एक सेप्टिक टैंक से मुकेश का शव बरामद हुआ। उनका कत्ल इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने सच उजागर किया था। “पत्रकार सच लिखने की कीमत अपनी जान देकर चुकाते हैं। अक्सर उन्हें न्याय तक नहीं मिलता, परिवार ही अकेला लड़ता रह जाता है,” उन्होंने कहा।
सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी
रोकड़े ने बताया कि बस्तर के गाँवों में आज हर जगह सुरक्षा बलों के कैंप हैं। “एक कैंप में उतने जवान रहते हैं जितने यहाँ इस हॉल में लोग बैठे हैं। कई बार एक गाँव में पाँच-पाँच कैंप होते हैं। बस्तर अब जंग का मैदान बन चुका है।”
उनका कहना है कि सरकार इस अभियान को किस अंजाम तक ले जाएगी, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन पिछले कुछ महीने गाँववालों के लिए बेहद कठिन रहे हैं। पुष्पा आगे कहती हैं-
“हमें नहीं पता कि इस अंतिम धक्का-मुक्की में कितने लोग मारे जाएँगे। निर्दोष ग्रामीण बीच में फँस रहे हैं और उन्हें बचाना ज़रूरी है। अगर पत्रकार आगे नहीं आएँगे, तो ये लोग कुचल दिए जाएँगे।”
‘स्वास्थ्य-शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं’
उन्होंने सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा, “सरकार की सारी ऊर्जा सिर्फ माओवादियों को खत्म करने पर है। स्वास्थ्य, शिक्षा या अन्य ज़रूरी मसलों पर उसका कोई ध्यान नहीं है।”


