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बस्ती के दो मजदूर दोस्तों की दर्दनाक कहानी : अफसोस किसी हिंदी अख़बार में नहीं बल्कि न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी!

शमीमउद्दीन अंसारी-

नीरज घेवान की ‘होमबाउन्ड’ के बारे में सोशल मीडिया पर पढ़ते हुए कहीं ये नहीं पढ़ा कि इसके केंद्र में बस्ती जिले के दो दोस्तों मोहम्मद सैयूब सिद्दीक़ी और अमृत प्रसाद का कोविड की पहली लहर के दौरान सूरत से अपने गाँव बड़हुआ देवारी का सफ़र है, जिसमें अमृत की मृत्यु हो जाती है। सड़क पर एक मुसाफ़िर उनकी तस्वीर लेता है जिसमें सैयूब ने अमृत को अपनी गोद में लिटाया हुआ है और एक गीले रुमाल से उनके चेहरे को पोंछ रहे हैं। ये तस्वीर सोशल मीडिया पर आने के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बशारत पीर को बेचैन कर देती है, जो इन लड़कों के गाँव जाते हैं और न्यूयॉर्क टाइम्स में एक स्टोरी करते हैं – ‘टेकिंग अमृत होम’, जहाँ से ये कहानी निर्देशक नीरज घेवान तक पहुँचती है।

इण्डियन एक्सप्रेस ने आज इन दो दोस्तों पर एक स्टोरी की है। ये किसी हिन्दी अखबार में आ सकती थी, ‘टेकिंग अमृत होम’ भी किसी हिन्दी अखबार में आ सकती थी। मगर क्या कहें।

मोहम्मद सैयूब सिद्दीक़ी इन दिनों रोजी-रोटी के लिए दुबई में हैं, जहाँ वो एक निर्माण स्थल पर मजदूरी करते हैं। वहाँ उनके साथ 4 और लड़के हैं जो उनकी तरह ही यूपी से हैं और दो तो उनके गाँव बड़हुआ देवारी के ही हैं। सैयूब हर महीने 12000 से 13000 रुपये अपने घर भेजते हैं।

सैयूब और अमृत इसी तरह सूरत में मिले थे। दोनों बचपन के दोस्त थे और दर्जा 5 तक सरकारी स्कूल में साथ पढ़े थे। उनके घर गाँव में थोड़ी दूर पर थे। पढ़ाई छोड़ने के बाद दोनों काम की तलाश में अलग-अलग जगहों पर चले गए। अमृत ने बाद में सैयूब को सूरत बुला लिया जहाँ की टेक्सटाइल मिलों में दूसरे प्रवासी मजदूरों की तरह मामूली मजदूरी पर काम करने लगे।

2020 की गर्मियों में लॉकडाउन लगने के साथ ही मिल को बन्द कर दिया गया। 22 साल के ये दोनों लड़के अपने गाँव वापस जाने के 1500 किमी के सफ़र पर निकले। दोनों को दूसरे प्रवासी मजदूरों साथ एक ट्रक पर जगह मिली जहाँ गर्मी की वजह से अमृत की तबीयत बिगड़ने लगी।

ट्रक तब तक मध्य प्रदेश के शिवपुरी तक पहुँचा था। सैयूब ने ड्राइवर से मिन्नतें की कि वो अमृत के इलाज के लिए गाड़ी रोक दे, लेकिन दूसरे मुसाफिरों और ड्राइवर ने उनकी न सुनी। सैयूब अपने दोस्त अमृत के साथ ट्रक से उतर गए जिससे वो अपने दोस्त की जान बचा सकें। वो सड़क के किनारे अमृत का सर अपनी गोद में लिए बैठे थे और एक गीले रुमाल से उनके चेहरे को पोंछ रहे थे। तभी एक राहगीर की नजर उन पर पड़ी जिसने उनकी मदद करने की कोशिश कि और उनकी तस्वीर ली।

अमृत को बचाया नहीं जा सका। सैयूब ने किसी तरह एक एम्बुलेंस का इंतज़ाम किया और दो दिन बाद 17 मई 2020 को अपने गाँव पहुँचे।

‘होमबाउन्ड’ की ख़बर 2000 की आबादी वाले गाँव बड़हुआ देवारी पहुँची है, हालाँकि किसी ने उसे अभी तक देखा नहीं है। गाँव के सबसे क़रीब का सिनेमा हाल ‘बादशाह’ गाँव से 25 किमी दूर है।

अमृत घर में कमाने वाले अकेले लड़के थे। उनके जाने के बाद घर का गुज़ारा मुश्किल हो गया। अमृत की पाँच छोटी बहनें और एक भाई हैं। ‘होमबाउन्ड’ के निर्माताओं ने अमृत के घर वालों से अमृत के बारे में जानकारी ली, मगर बाद में उनसे कोई सम्पर्क नहीं रखा। चलने से पहले उन्होंने अमृत के पिता को 10,000/- रुपये दिए (टुच्चे साले)।

हालाँकि सैयूब ने दोस्त होने का अपना फ़र्ज़ निभाया और अमृत की दो बहनों की शादी में मदद की।

सैयूब 2023 से दुबई में हैं और अभी गाँव वापस नहीं जा सकेंगे। उन्हें एक और अफ़सोस है कि उनके जिस फोन में अमृत की ढेरों तस्वीरें थीं, वो खराब हो गया और उन्होंने वो सारी तस्वीरें खो दीं।

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