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पंडित छन्नू लाल मिश्रा को बीमारियों से ज्यादा घर के क्लेश ने जल्दी निपटा दिया

मुझे कई बार लगा है कि दुनिया का कोई झगड़ा ऐसा नहीं है, जो बातचीत से नहीं सुलझाया जा सकता है। और ये भी लगा है कि इसके लिए आपका बहुत ज्यादा पढ़ा-लिखा होने की जरूरत भी नहीं है। बस विवेक की जरूरत है…

अतुल कुमार राय-

आदमी जितना जल्दी बीमारियों से नहीं मरता, उससे ज्यादा जल्दी से घर का क्लेश मार देता है। जिस घर में क्लेश होने लगे उसकी हालत उस घर की हो जाती है, जिस पर आगे महंगा संगमरमर तो लगा है लेकिन अंदर कई साल से सफाई नहीं की गई है।

अपने जीवन काल में पंडित छन्नू लाल मिश्रा भारत रत्न छोड़कर सारे बड़े पुरस्कार औऱ सम्मान अर्जित कर चुके थे। लेकिन पिछले दो साल से घर के क्लेश ने उनको अपना ही घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। बुढ़ापे में अपना ही बनाया घर छोड़ना पड़े, इससे ज्यादा कष्टकारी क्या हो सकता है? दो साल से वो बनारस छोड़कर अपनी छोटी बेटी के यहाँ रहने लगे थे।

मीडिया में आए दिन समाचार आता कि पंडित जी कोविड में पत्नी और एक बेटी को खोने के बाद बाकी बेटे और बेटियों के रवैये से बेहद आहत हैं।

एक बेटी प्रेस कान्फ्रेंस करती कि उन्हें उनकी छोटी बहन से जान का खतरा है। छोटी बेटी मीडिया को बताती कि बड़ी बहन ने पिताजी के एकाउण्ट से बहुत सारा पैसा अपने नाम ट्रांसफ़र करवा लिया है। कौन कितनी संपत्ति लेगा, कौन सा घर किसके हिस्से आएगा… ये डिसाइड ही नहीं हो रहा है।

हालात इतने खराब थे कि पंडित जी निवारण के लिए सरकार के दरवाजे तक अर्जी लगा चुके थे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई थी।

जानता हूँ…90 साल से अधिक कोई क्या ही जीवन देखेगा…! ये भी जानता हूँ कि पंडित जी के बेटे और बेटियां पढ़े-लिखे और बेहद सम्माननीय लोग हैं। जिनकी समाज में प्रतिष्ठा है। बावजूद इसके, जिस पिता की वजह से सारी संपत्ति बनी, जिसकी वजह से सारी प्रतिष्ठा बनी.. उसी को जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी तब बिसरा दिया गया। इससे बड़ा भी दुर्भाग्य क्या होगा?

सम्पत्ति और घर फिर आएंगे- जाएंगे.. लेकिन धरती पर पंडित छन्नू लाल मिश्रा दुबारा नहीं आ सकते। आज मुझे इस बात के रहस्योद्घाटन में कोई रुचि नहीं है कि पंडित जी के घर में झगड़ा चल रहा था। इसमें भी नहीं कि इन झगड़ों में कौन सही था या कौन गलत।

परिवार के झगड़े बाहर वालों को दिखते आसान हैं, होते नहीं।

मेरी रुचि बस इतनी है कि झगड़े आसान हों या न हो। इतना जानना बेहद आसान है कि व्यक्ति से बड़ा कोई धन नहीं होता। और परिवार सिर्फ पैसे से नहीं चलता बल्कि त्याग और समर्पण से ही चलता है।

एक व्यक्ति को इस समर्पण और त्याग की वेदी पर खुद को चढ़ाना पड़ता है। पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों की यही धुरी थी। कोई एक आदमी होता था..जो अपने बेटे को बेटा, अपनी बेटी को बेटी..अपने हित को अपना हित न समझकर पूरे परिवार के बारे में सोचता था।

कोई एक भाई होता था, जो अपने बेटे से ज्यादा अपने भाई के बेटे को प्रेम करता था। कोई एक चाची हुआ करती थी, जो अपने बेटे से पहले अपनी दयादिन के बेटे को खिला देती थी। कोई एक बड़े पिताजी हुआ करते थे जो अपने लिए कपड़े नहीं खरीदते, बाकी सबके लिए खरीद लाते थे।

मैंने अपने छोटे जीवन में कई ऐसे लोगों को देखा है। आप लोगों ने भी जरुर देखा होगा। लेकिन अफ़सोस आज ऐसे लोग दिखाई नहीं देते। तभी परिवार आज परिवार नहीं रहे, घर भी घर नहीं रहा।

आस-पास नज़रें दौड़ाएंगे तो आप पाएंगे कि क्लेश नामक दीमक घर को चाट रहा है। और कहना गलत न होगा कि पुरुष इसके सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं।

महिलाएं आपस में झगड़ लेती हैं। रो लेती हैं, चीख और चिल्ला लेती हैं। नैहर चली जाती हैं… प्रेस कान्फ्रेंस कर लेती है। अगले दिन आपस में मेल-मिलाप भी कर लेती हैं। लेकिन आज अधिकतर पुरुषों की आधी ऊर्जा परिवार की इज्ज़त बचाने में चली जा रही है और आधी ऊर्जा अपने अंदर के कष्ट को बाहर न आने देने में।

मुझे कई बार लगा है कि दुनिया का कोई झगड़ा ऐसा नहीं है, जो बातचीत से नहीं सुलझाया जा सकता है। और ये भी लगा है कि इसके लिए आपका बहुत ज्यादा पढ़ा-लिखा होने की जरूरत भी नहीं है। बस विवेक की जरूरत है।

कहना यही है कि आज हमको या आपको इस विवेक का प्रयोग करना जरूरी है। तभी परिवार नामक संस्था बचेगी। वरना सारा सम्मान और सारा अर्जित धन, धरा का धरा रह जाएगा और आप जिस व्यक्ति के कारण सम्पत्ति में हिस्सा खोज रहें हैं, वो असंतोष की सांस लेकर इस दुनिया से विदा हो जाएगा।

फिर आप भले अभी अफ़सोस न करें लेकिन जीवन में ऐसे मौके आएंगे कि अफ़सोस होगा। तब आंसू आंख नहीं हृदय से आंसू निकलेंगे….और कोई पोंछने वाला नहीं होगा। यूँ ही।


पिछले दिनों भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक पं छन्नूलाल मिश्र जी का निधन हुआ, एक वीडियो में उनकी बेटी उनके बारे में कई बातें बता रही थीं, तो याद आया कि बनारस में मोदी के एक बार के वे प्रस्तावक भी रहे थे फिर भी जब कोरोना काल में चार दिन के अंदर उन्होंने पत्नी और बेटी दोनों को खोया था तब उनकी बेटी की मौत को लेकर परिवार जांच चाहता था लेकिन बेटी की मौत पर कायदे से जांच तक नहीं हुई, सोशल मीडिया और अखबारों में ये खबर थी कि मौत के बाद अस्पताल ने जांच के लिए सीसीटीवी फुटेज देने मना कर दिया था, लाखों का बिल अलग से बना दिया था और इलाज क्या किया इसका कोई विवरण देने को तैयार नहीं हुआ अस्पताल, जबकि ये भी सच था कि मोदी को उन्होंने साक्षात राम का अवतार कहा था …. -मनोरमा सिंह

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