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साहित्य

लेखक की भाषा नहीं, सृजन बड़ा होता है- उसे प्रूफरीडर मत बनाइए!

मज़कूर आलम-

जब भी लेखक या लेखन की बात होती है, हम भाषा पर उतर आते हैं। मैं नित दिन ये बहसें देख रहा हूँ, मगर आजतक समझ नहीं आया क्यूं?

हमें सबसे पहले ये स्वीकारना होगा कि लेखक भाषाविद नहीं हैं। वह भाषा की शुद्धता पर सान नहीं चढ़ा रहा होता है, बल्कि वह सृजनकर्ता है।

मगर मैं देखता हूँ कि साहित्यकार भी खुद को लेखक के तौर पर कम और भाषाविद के तौर पर ज्यादा पेश करने में अपनी इज़्ज़त समझते हैं। और ऐसा इसलिए है कि भाषा के व्याख्याताओं ने लेखन को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया है व उनका साहित्य पर अघोषित क़ब्ज़ा है।

हमें ये स्वीकार करना होगा कि भाषा से बहुत ज्यादा बड़ी चीज सृजन है। विभिन्न क्षेत्र जैसे- डॉक्टर, इंजीनियर, जेनेटिक्स, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र… तमाम क्षेत्रों से आए लेखक हो सकते हैं तो अनपढ़ भी। लेकिन लेखन कला में वे शानदार थे। कबीर को ही ले लीजिए आप। उनकी भाषा को कहां रखेंगे? मैं तो सोचता हूँ कि अगर आज बेचारे रज़ा अली खान उर्फ रम्ज़ अजीमाबादी होते तो उनके अशआर को हमारे आज के विद्वान लेखकगण (मेरे शब्दों में भाषाविद भी नहीं, स्टीरियोटाइप भाषा के जानकार) उन्हें ‘रिक्शाछाप’ क़रार देते।

अब कुछ ऐसे विश्वस्तरीय लेखकों के उदाहरण भी यहां देख लेते हैं, जिनकी भाषा पर पकड़ कम थी, मगर उनका लेखन ऐसा कि साहित्य का इतिहास उनके नामों और लेखन के बिना पूरा नहीं हो सकता है।

ऐसे एक-दो नहीं, कई लेखक और कवि हुए हैं। मगर यहां मैं उदाहरण सिर्फ एक-दो का ही दे रहा हूँ। इन लेखकों के भाव और कथावस्तु इतनी गहरी और प्रभावशाली रही है कि भाषा के नियमों (व्याकरण या वर्तनी) में कमी भी उनके महानता को रत्तीभर कम न कर सकी। इनमें से तो कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने शुद्धतावाद को नकारने के लिए भाषा बिगाड़कर लिखी। आइए देखते हैं कुछ नाम और उनके कारनामें। एक बात और, मैं यहां जो उदाहरण दे रहा हूँ, वह सिर ऐसे बहादुरों की है, जिन्होंने अपनी रचना की भाषा सुधारने के लिए किसी प्रूफरीडर की मदद भी नहीं ली।

विलियम फॉकनर (William Faulkner) : नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी लेखक। उनके लेखन में लंबे, जटिल वाक्य, कम या अनियमित विराम चिह्न तो होते ही थे, इसके अलावा व्याकरण संबंधी असावधानियां भी खूब होती थी। इसके बावजूद, उनकी कहानियाँ और उपन्यास, जैसे “द साउंड एंड द फ्यूरी,” उनकी गहरी मानवीय अंतर्दृष्टि और कथा-शैली के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।

​ई.ई. कमिंग्स (E.E. Cummings) : अमेरिकी कवि। इन साहब ने तो हद ही कर दिया। इन्होंने जानबूझकर अपने नाम e.e. cummings और कविताओं में विराम चिह्न और व्याकरण के पारंपरिक नियमों को तोड़ा। इसके बावजूद कि उनके छंदों की संरचना और शैली अपरंपरागत थी, फिर भी आलोचकों ने उनके काव्य-सौंदर्य और अभिव्यक्ति को असाधारण माना और विश्व साहित्य ने भी इसे स्वीकार किया। इसकी वजह यह है कि उन्हें ‘जड़’ आलोचना से कम गुजरना पड़ा। हिंदी में होते तो मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि आलोचकों के टोचन से या तो वे ‘आत्महत्या’ कर लेते या थोड़े ढीठ होते तो अपने साहित्य की आत्महत्या (लिखना बंद) करवा देते।

जोस सारामागो (Jose Saramago) : नोबेल पुरस्कार विजेता पुर्तगाली लेखक। विलियम फॉकनर तो अपने उपन्यासों में संवाद को अलग से दर्शाने वाले उद्धरण चिह्नों (Quotation Marks) का थोड़ा-बहुत उपयोग कर भी लिया करते थे, मगर सारामागो तो एकदम नहीं करते थे (इसी तरह की भाषा को लेकर गीतांजलिश्री के मैन बुकर पुरस्कार विजेता उपन्यास ‘रेत-समाधि’ को अब तक लोगबाग गरिया रहे हैं, लेकिन यह स्मरण रखिए कि उसी भाषा के साथ सारामागो और फॉकनर नोबेल ले चुके हैं) और उनके वाक्य बहुत लंबे होते थे। उनका यह व्यक्तिगत अंदाज़ उनकी कहानियों की प्रवाहमानता और भावनात्मक गहराई के लिए ख़यात है।

​इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि सृजन ज्यादा बड़ी चीज है और भाषा सिर्फ माध्यम… तो भाषा बिगड़ी है और अभिव्यक्ति शानदार है तो लेखक अद्भुत है। वह नोबेल जीत सकता है। लोगों के दिल पर राज कर सकता है। भाषा शानदार है और कथ्य भी शानदार है तो डॉक्टर राही मासूम रज़ा हो सकता है और भाषा शानदार हो, मगर कथ्य ही न हो तो राजेन्द्र अवस्थी भी हो सकता है।

तो… मैं तो स्पष्ट रूप से मानता हूँ कि भाषा का अधिकार (व्याकरण की शुद्धता) कला के अनुभव और सशक्त अभिव्यक्ति से कम महत्वपूर्ण होता है और है। वह सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम है और अगर बिगड़े रूप में भी सशक्त है तो लेखक को उसी रूप में लिखना चाहिए। लेखक को तो सिर्फ असाधारण विचार और गहरे भाव पर ध्यान देना चाहिए। बाकी ‘भाखा आ सुधता’ को बोलिए- हमरी बलाइया से।

अंत में, आखिरकार, आपसब से हथजोड़ी है कि शुद्धतावाद के नाम पर लेखक की जगह प्रूफरीडर को आगे मत बढ़ाइए। ऐसे में तो लेखन में सिर्फ मिडियोकर ही रह जाएंगे। लेखक का काम शानदार सृजन करना है। भाषा सुधारने का काम, प्रकाशकों, संपादकों, प्रूफरीडरों पर छोड़िए न।

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1 Comment

1 Comment

  1. प्रदीप शुक्ला

    October 10, 2025 at 10:38 pm

    भाई जी एकदम सटीक और सही गहरी बात आपने कही। यह एक बहुत सही काम है और वाकई लेखक संपादक और प्रूफ रीडर के कामों को विभाजित करके देखने की जरूरत को इंगित करता है।

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