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आज के अखबार : नहीं बताते कि भारत ने तालिबानी शर्त कुबूल कर अफगानिस्तान से संबंध ‘सुधारे’  

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ अखबारों में से सात की लीड एक ही है – भारत काबुल में फिर दूतावास खोलेगा। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, काबुल में फिर दूतावास खोलेंगे : जयशंकर / हमारी सरजमीं से भारत विरोध नहीं : मुत्ताकी। इस खबर में कई संबंधित सवालों के जवाब नहीं हैं। और तमाम छोटी खबरों, उनके शीर्षक, हाईलाइट आदि में यह नहीं बताया गया है कि ये दूतावास जब, जैसे बंद हुए थे और अब जब, जैसी हालत में खुल रहे हैं तो बदला क्या है। बहुत सारे सवाल हैं और अखबारों में उनका जवाब नहीं है। अभी तक तो मैं यही मानता था कि कई अखबारों के पहले पन्नों से काम की सारी खबरें मिल जाती हैं लेकिन आज पता चला कि एक खबर के सभी पहलू कई अखबारों में कवर होते हैं और सबको देखना संभव नहीं है। अमर उजाला में लाल रिवर्स में एक शीर्षक है, आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा। लेकिन यह तालिबान पर भारत सरकार के यू टर्न के लिए पर्याप्त नहीं है। हालांकि राजनयिक भाषा में इसे “पॉलिसी री-कैलिब्रेशन” या “प्रैग्मैटिक रियलिज़्म” कहा जाता है। इसमें मोदी सरकार की योग्यता, क्षमता और प्रदर्शन देखने के बाद खबरों से कुछ उम्मीद होनी ही थी पर उनका प्रदर्शन भी देख ही रहा हूं। इसलिए, अगर आपके अखबार में आपके सवालों के जवाब नहीं हैं तो एआई का सहारा लीजिए। नॉन बायोलॉजिकल लोग इसे आई या माई का सहारा मान सकते हैं लेकिन आई और माई से काफी अलग है एआई। हम सबको इसका उपयोग शुरू कर देना चाहिए। मैंने महसूस किया है कि मूर्ख बनकर सवाल करने से जवाब अच्छे मिलते हैं और चीजों को समझना बहुत आसान हो जाता है। बचपन में ही बताया गया था कि पहली कक्षा की पढ़ाई पहली में समझ में नहीं आएगी तो दूसरी कक्षा में पूछने में शर्म आएगी और पहली की पढ़ाई समझे बिना आगे की पढ़ाई समझ में नहीं आने वाली है। इसलिए मुझे चीजों को समझने में दिक्कत नहीं आती है। हालांकि, मूर्ख या अनजान बनकर सवाल पूछने में झेंप होती है। आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर – पूछना साधारण नहीं है। इसलिए महान पत्रकारों को इंटरव्यू करने का मौका दिया गया था। अभी वह सब मुद्दा नहीं है। उनकी रिपोर्टिंग जरूर हो सकती है। एआई से सवाल पूछना आसान है। जवाब तो मिलता ही है। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता स्थापित हुई थी तो मैंने पहली बार सुना या पढ़ा था जिसका भाव यह था कि भारतीय जनता पार्टी हिन्दू तालिबान है या उसी के जैसी है। अभी मुद्दा वह नहीं है लेकिन खबरों से जुड़ा तथ्य है जो मुझे एआई से मालूम हुआ और इसका संकेत द टेलीग्राफ की खबर से मिला।

कहने की जरूरत नहीं है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनाने के बाद अगर दूतावास बंद हुए थे और अब खुल रहे हैं तो वहां क्या बदला यह जानना या बताना खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता। लेकिन अमृतकाल की पत्रकारिता ऐसी नहीं है। अब वही जानना होता है जो बताया जाए। बाकी आपके काम का नहीं हैं। 10 साल में तो इतिहास से लेकर किताबें, पाठ्यक्रम और पाठ्यक्रम के किताबों की कहानियां तक बदल चुकी हैं। ऐसे में तालिबान से संबंध क्यों ठीक किए जा रहे हैं या उसकी जरूरत क्यों पड़ी या उससे लाभ क्या होगा – बताना भी खबर की एक जरूरत है। लेकिन ऐसा बहुत कुछ आज की खबरों में नहीं है। द टेलीग्राफ की आज की लीड का फ्लैग शीर्षक है, पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के बीच तालिबान से संबंध – भारत (दिल्ली) काबुल दूतावास फिर खोलेगा। इस खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है उसके अंतिम पैराग्राफ में लिखा था, यहां अफगानिस्तान  दूतावास में पूरी तरह पुरुषों की प्रेस कांफ्रेंस में इस बारे में पूछे जाने पर दूर-दराज के (रिमोट) क्षेत्र में हमले के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाया। नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और जहां है वहां यह भी बताया गया है कि काबुल पर पाकिस्तान के हवाई हमले हुए हैं। खबर के अनुसार, काबुल, अफगानिस्तान को जंग की धमकी देने के बाद वीरवार रात पाकिस्तान की वायु सेना ने काबुल पर हवाई हमले किए। ये हमले ऐसे समय में किए गए हैं, जब तालिबानी विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी भारत के दौरे पर हैं। पाकिस्तान का दावा है कि उसने अफगानिस्तान की राजधानी पर यह एयरस्ट्राइक तहरीके तालिबान (टीटीपी) के नेता नूर वली महसूद को निशाना बनाकर किया था। तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने बताया कि काबुल में धमाके सुने गए और इनकी जांच जारी है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, काबुल सिटी में एक धमाका सुना गया मगर चिंता की कोई बात नहीं, सब ठीक है। फिर भी भारत सरकार दूतावास फिर से खोल रही है, भारतीयों को वहां तैनात किया जाएगा और पाकिस्तान को भारतीयों को निशाना बनाने के लिए काबुल भी एक जगह हो जाएगी। पर वह अलग मुद्दा है।

मैंने चैट जीपीटी से पूछा, आज खबर यह भी है कि यह घोषणा (फिर से दूतावास खोलने और संबंध सुधरने की) अफगानिस्तान के दूतावास में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में की गई जिसमें सिर्फ पुरुष थे। महिलाएं नहीं थीं। इसपर क्या खबर है। जवाब मिला, अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्ताकी ने न्यू दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमे कोई महिला पत्रकार मौजूद नहीं थी। मीडिया की रपटों के अनुसार, यह फैसला तालिबान की टीम का था कि आमंत्रित पत्रकारों में महिलाएं न हों। भारतीय पक्ष ने यह सुझाव दिया था कि महिला पत्रकारों को भी आमंत्रित किया जाए, लेकिन इस सुझाव को माना नहीं गया। जाहिर है, भारत ने भारत की धरती पर, दिल्ली में यह होने दिया। उसकी मजबूरी या सोच के बारे में मैं कुछ नहीं कह रहा। बस याद दिला रहा हूं कि सवाल मुश्किल हो तो वसुधैव कुटुम्बकम और स्थिति मुश्किल हो तो सिर्फ पुरुषों से काम चला लो या चलाने की शर्त मान लो। यह 56 ईंची बहादुरी हो सकती है। इस पर पत्रकार, राजनीतिक हस्तियाँ और सामाजिक मीडिया ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। इसे “लैंगिक भेदभाव”, “मीडिया में पुरुष वर्चस्व” और “भारत के लोकतन्त्रिक मूल्य की उपेक्षा” कहा गया है। कुछ पत्रकारों ने यह भी कहा कि महिलाओं को प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बुलाना, हमारे देश में इस तरह की नीति को “स्वीकर करने” या इसकी इजाजत देने जैसा है। मुत्ताकी ने इस पर कहा, “हर देश की अपनी परंपराएँ, कानून और सिद्धांत होते हैं, उन्हें सम्मान मिलना चाहिए।” यहां यह मुद्दा तो है ही कि भारत तालिबान से अब संपर्क क्यों बढ़ाना चाहता है और उसे अपनी मनमानी यहां क्यों करने दे रहा है। इस तरह की घटनाएँ निश्चित रूप से भाजपा सरकार के लिए नकारात्मक है लेकिन उसे ऐसी बातों की परवाह ही नहीं है और दिलचस्प यह कि इसकी खबर भी नहीं होती है।

आज मेरे नौ में से दो अखबारों में यह खबर लीड नहीं है। इनमें एक तो नवोदय टाइम्स है जिसकी लीड, मारिया को नोबेल, ट्रम्प को… है। दूसरा अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स है। इसकी लीड दीवाली पर दिल्ली एनसीआर में पटाखे चलाने की इजाजत मिलने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ऐसा कहा है। यहां तथ्य है कि पिछले साल दीवाली पर पटाखे चलाने पर प्रतिबंध था और आरोप लगा कि भाजपा नेताओं ने भी पटाखे चलाए और आम लोगों ने तो इतने पटाखे चलाए कि लगा ही नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगाया था। ऐसे में इस साल सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कह दिया है तो खबर है और जाहिर है बड़ी खबर है। कुत्तों का मामला हम देख चुके हैं। लेकिन कितने लोग इसे खबर मानते हैं यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इसे किसी और ने लीड नहीं बनाया है। देशबन्धु ने इसे रूटीन खबर की तरह छापा है। हाइलाइट किए हुए अंशों में एक है, भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देंगे अपनी जमीन : आमिर खान मुत्ताक। इसका आप चाहे जो मतलब लगाइए, पाकिस्तान हमारा दुश्मन है, लेकिन उसके साथ हम क्रिकेट खेलते हैं। हार जाता है तो प्रधानमंत्री कहते हैं ऑपरेशन सिन्दूर हो गया और अब एक ऐसे देश से दोस्ती के मामले में यू टर्न ले रहे हैं जिसकी पाकिस्तान से तनी हुई है। आपको याद होगा कि जुलाई 2022 में, अमेरिका ने एक ड्रोन हमले में अयमान अल-ज़वाहिरी को काबुल में मार गिराया था। ज़वाहिरी अल-क़ायदा का नेता था और लंबे समय से अमेरिका के “सबसे वांछित आतंकियों” में शामिल था।

इससे पहले अगस्त 2021 में, तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता हथिया ली थी और पूर्व सरकार (अशरफ गनी नेतृत्व) को पलायन करना पड़ा था। भारत ने उसी समय अपने राजनयिक मिशन (दूतावास और वाणिज्य दूतावासों) को बन्द करने तथा भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया शुरू की थी। अब जब भारत फिर से दूतावास खोल रहा है तो यह नहीं बताया गया है कि क्या बदला है। उल्टे, बिना महिलाओं की प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाजत दी गई और इस आशय की खबर को प्रमुखता नहीं मिली। इंडियन एक्सप्रेस में लीड के साथ छपी खबर में इसकी जानकारी दी गई है और यह भी कि दूतावास में तालिबानी झंडा फहराने का विरोध हुआ। खबर इस प्रकार है, तालिबान के नेतृत्व वाले अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्ताक़ी के दिल्ली स्थित अफ़ग़ान दूतावास में प्रवेश करने से कुछ मिनट पहले, एक नाराज़ अफ़ग़ान युवक झंडे का डंडा लेकर बाहर निकल आया। उसने कहा, “जब तक मैं हूँ, मैं उन्हें तालिबान का झंडा नहीं फहराने दूँगा।” अफ़ग़ान दूतावास में कई वर्षों से काम कर रहे इस युवक ने कहा, “भारत सरकार तालिबान सरकार को आधिकारिक तौर पर मान्यता दे, तभी वे तालिबान का झंडा फहरा सकते हैं।” उसने अपने देश में बदले की कार्रवाई के डर से नाम न बताने का अनुरोध किया। तालिबान के सदस्यों के साथ हुई इस झड़प के बीच, दिल्ली में तैनात अफ़ग़ान अपने स्थान पर डटे रहे और उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के इस्लामी अमीरात (तालिबान इसे गणराज्य के बजाय अमीरात कहते हैं) का झंडा फहराने नहीं दिया।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड और इसका शीर्षक सुंदर, सुशील, देसी जरूरतों के अनुकूल है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, भारत ने तालिबान से संबंध बेहतर किए, दूतावास फिर से खोलेगा। अफगानिस्तान राजनयिकों की तैनाती करेगा, पर कोई राजदूत अभी नहीं। द हिन्दू की खबर और शीर्षक भी ऐसा ही है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, नई दिल्ली ने तालिबान से राजनयिक संबंध मजबूत किए। इसके साथ छपी खबर का कैप्शन है, शुक्रवार को काबुल को पांच एम्बुलेंस सौंपने के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर अफगानिस्तान के अमीर खान मुत्ताकी के साथ। इस खबर के साथ सिंगल कॉलम की दो छोटी खबरें हैं। एक में बताया गया है कि तालिबान की प्रेस कांफ्रेंस में कोई महिला नहीं थी और हवाई हमलों को लेकर अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाई। दि एशियन एज में यह खबर लीड है। शीर्षक है, भारत काबुल में मिशन को अपग्रेड करके पूरा दूतावास बनाने के लिए तैयार।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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