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दिल्ली

महिला पत्रकारों को घुसने नहीं दिया; पुरुष पत्रकारों के बहिष्कार की वकालत कर रहे लोग मीडिया के कल्चर को नहीं समझते!

गिरिजेश वशिष्ठ-

पत्रकार अपनी आज़ादी खो चुका है. महिला पत्रकारों को घुसने नहीं दिया. पुरुष पत्रकारों की हिम्मत नहीं हुई कि कहते हम भी कवर नहीं करेंगे. क्यों? क्योंकि अगर खबर मिस हो जाती तो एक नया बालक जिसका कोर्स भी पूरा नहीं हुआ है असाइनमेन्ट से जवाब मांगता, इसके बाद रिपोर्टर की बात सीनियर से करवाई जाती फिर वो गालियां देता. और ये भी मुमकिन है कि नौकरी चली जाती.

खबर पर अपने आप कॉल लेने के जमाने गए. वो दौर अलग था जब प्रेस कांफ्रेंस में लंबा इंतजार करवाया जाता था तो रिपोर्टर उठकर चल देते थे. अब तो रिपोर्टर रीढ़ दिखा ही नहीं सकता. प्रिंट वाला तो दूसरे से खबर लेकर काम चला लेगा. टीवी वाला किसी से फुटेज ले भी ले तो दफ्तर में आदमी बैठकर माइक ढूंढता है कि अपना माइक दिख रहा है कि नहीं. और नहीं दिखा तो फिर वही सीनियर फोन करेगा. ऐसी बातें बोलेगा कि कोई दूसरा बोले तो ठूंसा मार दो लेकिन सुननी पड़ती है.

ये एक्सेस रिपोर्टर ने ही दी है. अब न तो उसका स्टैंड होता न ओपिनियन. सिर्फ एक यंत्र की तरह काम करता है. पुलिस के खिलाफ खबर नहीं चला सकता. चलाई तो कल से क्राइम होगा और पुलिसवाला बताएगा नहीं. खबर दूसरी जगह छपेगी तो गाली पड़ेगी.

इस सब के कारण एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो प्लांट की गई खबरों को भी धमाके मानकर चल रहा है. उसे लगता है कि कहां चक्कर में पड़ें. अफसर जो बता रहा है छाप दो. वो भी खुश दफ्तर भी खुश.

पहले लोग अपनी खबर की भनक तक नहीं पड़ने देते थे. गुप्त रखते थे. ताकि मेरे पास जो खबर हो वो दूसरे को न मिल सके. अब फुटेज बांटते रहते हैं ताकि जिंदगी चलती रहे. गालियां न पड़ें. आज मैं तेरी पीठ खुजाऊं कल तू मेरी खुजाना.

लेकिन इस पूरी दशा में जन सरोकार कहां हैं. रिपोर्टर की अपनी ताकत कहां हैं. कहां रिपोर्टर खोजी खबर लाए. उसे तो माइक लेकर आज यहां कल वहां भागना है. संबंध तक नहीं बना पाता तू सूत्र क्या खाक बनाएगा.

वैचारिक रूप रे पिलपिलापन इतना कि बीजेपी की बीट कवर करने लगे तो भाजपाई हो गए. कांग्रेस की बीट कवर करने लगे तो कांग्रेसी. समस्या यहां भी वही है. नेता से बिगाड़ तो लूं लेकिन कल से बाइट नहीं देगा तो दफ्तर में हंटर लेकर बैठा थानेदार पीठ छील देगा.

पहले लोग अपनी खबर दूसरे रिपोर्टर के दे दिया करते थे कि मरे नहीं.. लेकिन अब वो भी बंद हो गया है. नौकरी करें या क्रांति. इस पर अरुण पुरी फिक्की में भाषण देते हैं कि पूंजी का अधिकार बढ़ता जा रहा है. अरे सर पहले वर्क कल्चर सुधारो. बहस की संस्क़ति को वापस लाओ जो थी अपने यहां.

रिपोर्टर लड़ता था खबर सही है या नहीं इस पर. अब वो लड़ता नहीं है डरता है. और चिल्लाने का कल्चर ऊपर से नीचे आए तो समस्या और भी है. तो इन महिला पत्रकारों को घुसने नहीं दिया तो कोई सोच रहा है पुरुष पत्रकार भी बहिष्कार कर देते तो वो मीडिया के कल्चर को नहीं समझता..

अरुण पुरी ने फिक्की के कार्यक्रम में क्या कहा था? पढ़ें…

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