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आज के अखबार : अफगानिस्तान के बाद कनाडा की विदेश मंत्री, पाकिस्तान संग तालिबानी टकराव दिल्ली से

हिन्दूस्थान बनाने की कोशिश में झूठीस्तान बनाने की ओर अग्रसर? संवैधानिक संस्थाओं के बाद आरटीआई कानून को भी लील गए। पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मिटाने का दावा तो मुद्दा ही नहीं है वोट और वोट चोरी के लिए ‘कुछ भी करेगा’ को भी समर्थन है।

संजय कुमार सिंह

भारत की विदेश नीति के बारे में आपकी राय जैसी हो, सच्चाई यह है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान से दोस्ती थी, अब रगड़ा चल रहा है। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद भारत ने काबुल से कुट्टी कर ली थी। कनाडा के साथ हाल का पंगा तो जगजाहिर है। चीन, अमेरिका इजराइल, पेगासस, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता, मेक इन इंडिया के बावजूद हाल में ब्रिटेन से रक्षा सौदा किसे याद होगा। या कौन इनका ध्यान रखता है। ताजा मामला तो तालिबानी विदेश मंत्री का भारत दौरा और तालिबानी फरमान पर विदेश मंत्रालय की लाचारी थी। अब मामला उससे आगे का – आज पता चला कि वे (तालिबानी विदेश मंत्री मुत्ताकी), 16 अक्तूबर तक भारत दौरे पर हैं। लौट जाएं तो हम धनतेरस मनाएंगे और धार्मिक बातें करेंगे। अभी, भारत से उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी दी है, शांति प्रयास काम नहीं करेंगे तो उनके पास दूसरे विकल्प हैंइंडियन एक्सप्रेस ने आज यह खबर देते हुए पहले पन्ने पर चार कॉलम की तस्वीर छापकर दिखाया है कि तालिबानी मंत्री ने अफगानिस्तान दूतावास में (दूसरी) प्रेस कांफ्रेंस की जिसमें महिलाएं शामिल हुईं। भारत सरकार की ओर से विदेशमंत्री ने कहा था कि प्रेस कांफ्रेंस दूतावास में हुई थी इसलिए भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। कल इंडियन एक्सप्रेस ने ही खबर छापी थी कि अफगानिस्तान दूतावास के कर्मचारी नहीं चाहते थे कि दूतावास में प्रेस कांफ्रेंस हो और यह भी कि, विदेश मंत्रालय ने मौजूदा कर्मचारियों के भरोसे मुत्ताकी को दूतावास में प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन करने दिया। इतना ही नहीं, एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि विदेश मंत्रालय ने सीडीए से “सहयोग करने और तालिबान को दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने देने” का अनुरोध किया है। जो भी हो, आज के अखबारों (हिन्दुस्तान टाइम्स) की खबर है कि कनाडा की विदेश मंत्री इतवार को दिल्ली पहुंच चुकी हैं।

अखबारी और राजनीतिक मकसद चाहे जो हो, कनाडा से भारत के संबंध ठीक होते दिखते हैं और खराब होने से मुश्किल में फंसे लोग अब भी कुछ आशावादी या धनखड़ बने रह सकते हैं। एक तरफ अगर भारत पाकिस्तान से रगड़ा करके तालिबान से दोस्ती कर रहा है और दूसरी ओर कनाडा से संबंध सामान्य होता दिखा रहा है तो माना जा सकता है कि मकसद बिहार चुनाव है और इसके लिए शुरू किए गए ऑपरेशन सिन्दूर, अस्पष्ट युद्ध विराम के बाद अब भारत की धरती से पाकिस्तान को तालिबानी धमकी दिलाना है। इसके लिए उनकी प्रेस कांफ्रेंस में महिलाओं को नहीं बुलाया जाना और अपने विदेश मंत्री का कहा बेमतलब हो जाना – नजरअंदाज करने वाली बात भले न हो, अखबारों को महत्वपूर्ण नहीं लगी है। कनाडा की विदेश मंत्री को इससे जोड़ने की तो कोई गुंजाइश भी नहीं है जैसा पाकिस्तान को धमकी दिलाने की खबर या कारण इंडियन एक्सप्रेस की खबर से समझ में आता है। जो अखबार खबर देते थे अब राजनीति भी कर रहे हैं। पहले भी करते हों तो इतने बेशर्म नहीं होते थे। संपादक पहले राज्यसभा में जाते थे अब विज्ञापनों से खरीद लिए गए हैं। राज्यसभा वाले को विधानसभा चुनाव लड़वाकर फिर सदस्य बनाने का कारनामा हो चुका है। हजार रुपए रोज की नौकरी के लिए तरस रहे लोग इस लालच या गाजर के बाद कितनी और कैसी पत्रकारिता कर पाएंगे यह मुद्दा भले न हो समझने वाली बात तो है ही।

वैसे भी, यह देखने वाली बात है कि भाजपा और उसकी सरकार की यह राजनीति हिन्दू तालिबान से कितनी मेल खाती है। मैंने चैट जीपीटी से पूछा, भारतीय जनता पार्टी को हिन्दू तालिबान कहा जाता है। इस आरोप के आलोक में अफगानिस्तान सरकार से भारत सरकार के संबंध को कैसे देखते हैं? जवाब था, “हिंदू तालिबान” या “हिंदुत्व तालिबान” जैसे शब्द किसी औपचारिक विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक आलोचना के तौर पर प्रयोग किए जाते हैं खासकर, भाजपा और उससे जुड़ी विचारधारा (आरएसएस, हिंदुत्व राजनीति) पर। इस आरोप का मूल तर्क यह होता है कि भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और सामाजिक नियंत्रण के उस मॉडल को बढ़ावा देती है जो तालिबान की इस्लामी कट्टरता की याद दिलाता है। हालांकि, यह तुलना प्रतीकात्मक है, तथ्यात्मक नहीं। विपक्षी दल और कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे “मूल्य-समानता” की बहस के रूप में उछाला है: यानी, क्या भारत में भी राजनीति धर्म आधारित कट्टरता की दिशा में जा रही है? मुझे लगता है कि हां और इसलिए सवाल के दूसरे हिस्से के जवाब से मैं सहमत नहीं हूं। हालांकि यहां मामला कट्टरता से ज्यादा किसी भी तरह सत्ता में बने रहने का है ताकि वोट चोरी की जांच न हो और हो भी जाए तो बात सजा तक नहीं पहुंचे। अपराधी नंबर वन को बचाने के लिए कानून बनाया जा चुका है और उसी दम पर चेले पूछते हैं, आपके सबूत है तो अदालत क्यों नहीं जाते। भोले के चेले नहीं जानते हैं कि अदलाल को आदेश देने में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और जो दिए हैं उनपर कार्रवाई कहां हुई है। ऐसे में अखबार क्या रिपोर्ट कर रहे हैं या क्या बता-पढ़वा रहे हैं उसे समझना जरूरी है।

इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर दरअसल भाजपा के तालिबानी उपयोग का बचाव और प्रचार है भले इसमें वास्तविकता भी है। आइए दूसरे अखबारों को देखते समझते हैं। अमर उजाला की आज की लीड जोहो संस्थापक और देसी मैसेजिंग एप अरट्टै के जनक डॉक्टर श्रीधर वेम्बु का किसी भी समाचार पत्र से पहला साक्षात्कार है। इसके जरिए तकनीकी स्वायत्तता, युद्ध भी अब प्रौद्योगिकी की लड़ाई है, अरट्टै की क्षमताएं बढ़ेंगी, हमारा डाटा देश में ही रहेगा जैसी सूचनाएं हैं और मुझे लगता है कि यह सरकार और सरकारी नीतियों का प्रचार तथा उसका समर्थन है। टेक्नालॉजी के मामले में अरट्टै, व्हाट्ऐप्प जैसा लग रहा है और उसके लिए पेगासस सरकार के पास है या नहीं स्पष्ट नहीं है। ऐसे में हमारे यहां यह सरकार के पास नागरिकों के खिलाफ विदेशी हथियार है और सरकारी दुरुपयोग को नहीं रोकने तथा आम लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की स्थिति है। स्वदेशी और मेक इन इंडिया के बावजूद। दूसरी ओर अरट्टै व्हाट्सऐप्प का देसी वर्जन लग रहा है जो पेगासस मुक्त हुआ तो जो सब हो सकता है उसकी चर्चा यहां करके विषयांतर नहीं हो रहा हूं। निजी तौर पर मैं मानता हूं कि व्हाट्सऐप्प का माल सोशल मीडिया पर नहीं डाला सकता है। उसके अपने खतरे हैं और ऐसे में व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी के विस्तार की यह कोशिश राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा आदि यहां मुझे बेमतलब लगता है। इसलिए अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने की लीड की बात करता हूं। इसका शीर्षक है, अफगानिस्तान का दावा, 58 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, 200 अफगान आतंकी किए ढेर। इसमें एक शीर्षक है, “पाकिस्तानी शरारत का दिया जवाब : मुत्ताकी”। इसकी चर्चा इंडियन एक्सप्रेस की खबर में है और पहले कर चुका हूं।

देशबन्धु में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर है और इसका शीर्षक है, अफगानिस्तान की तालिबान सरकार का दावा – सैन्य अभियान में 58 पाकिस्तानी जवान मार गिराए। मुझे लगता है कि यह अफगानिस्तान के विदेश मंत्री के भारत में होने का नतीजा है या उसके कारण है। जो भी हो, पाकिस्तान का दावा इसमें नहीं है और यह खबर काबुल डेटलाइन से है। जब खबरों से खेल हो रहा हो, राजनीति चल रही हो तो कारण चाहे जो हो, खबरों और उसकी प्रस्तुति को समझने की जरूरत है। कौन राजनीति कर रहा है और कौन राजनीति का शिकार हो गया – यह भी मुद्दा है और इसे भी समझना होगा। मुद्दा यह भी है कि आज कई अखबारों में लीड है, बिहार में राजग के बीच टिकटों का बंटवारा हो गया। इससे बिहार (चुनाव) में राजग की स्थिति बेहतर लगती है। लेकिन यहां एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं छपी है। भ्रष्टाचार दूर करने का दावा कर सत्ता पाने वाले से तो यह पूछा ही जाना चाहिए था कि कांग्रेस भ्रष्ट थी पर उसने आरटीआई कानून दिया। आप पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं लेकिन आरटीआई कानून से आपकी परेशानी दिखती रही है अब खबर है और कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने सूचना के अधिकार कानून को कमजोर कर दिया है। द टेलीग्राफ में आज आरटीआई पर अच्छी खबर है – “सूचना चाहिए? 29 साल इंतजार कीजिये”। नवोदय टाइम्स की लीड – आईपीएस सुसाइड मामला और इसपर हरियाणा में महापंचायत की खबर है। इसका शीर्षक है, राज्य सरकार को 48 घंटे का अल्टीमेटम। कहने की जरूरत नहीं है कि हरियाणा की डबल इंजन सरकार के खिलाफ एक मामला है जिसे नवोदय टाइम्स ने तो लीड बनाया, दूसरे अखबारों को पहले पन्ने लायक नहीं लगा।

दि एशियन एज की लीड बिहार में एनडीए का सीट बंटवारा है लेकिन तालिबान की खबर चार कॉलम में है। शीर्षक से बताया गया है कि महिलाओं को प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बुलाने को लेकर शुरू हुए विवाद में तालिबानी विदेशमंत्री ने हार मानी या गलती स्वीकार की (ऑन बैक फुट यानी पांव पीछे की ओर खींचे)। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तालिबान का अच्छा प्रचार किया है। मुख्य शीर्षक है, जम्मू और कश्मीर पर तालिबान ने भारत की संप्रभुता का समर्थन किया तो पाकिस्तान नाराज। इसके तहत तीन खबरें हैं। लगभग इन्हीं खबरों के साथ इनकी चर्चा पहले कर चुका हूं।  बाकी सरकारी प्रचार पहले की तरह जारी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में तालिबान और पाकिस्तान की खबर लीड है। इसका शीर्षक है, हिन्सा बढ़ी तो तालिबान ने पाकिस्तान को चेतावनी दी। इसके साथ दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, मुत्ताकी की दूसरी प्रेस कांफ्रेंस में महिलाएं शामिल हुईं। उल्लेखनीय है कि जब महिलाओं को प्रेस कांफ्रेंस में शामिल नहीं होने दिया गया था तो खबर सिंगल कॉलम की थी अब दो कॉलम की है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – मुत्ताकी ने कहा, पाकिस्तान से वार्ता के लिए तैयार लेकिन विकल्प खुले हैं। इसकी चर्चा पहले हो चुकी है। यहां नई बात यह है, विदेश मंत्री (मुत्ताकी) ने कहा – शुक्रवार की प्रेस कांफ्रेंस से तकनीकी कारणों से महिला पत्रकार छूट गई थीं। अब इसे मानना या नहीं मानना आपके ऊपर है। हालांकि उससे फर्क क्या पड़ना है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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