गीताश्री-
पत्रकार -यू टयूबर – ज्योतिषी मृत्युंजय शर्मा के पास वैज्ञानिक दृष्टि है, अंध समर्थन नहीं. वे किसी तरह के उपायों से लोगों को भरमाते नहीं. वो कहते हैं- “एक अच्छा ज्योतिषी आपको सिर्फ उम्मीद दे सकता है, भाग्य को बदलने का उपाय नहीं बता सकता. जो लिखा है, उसे कोई नहीं बदल सकता.”
मृत्युंजय जी हमारे साथ -साथ चले पत्रकारिता में. बाद में अलग राह पकड़ ली. जिधर भी गए , खूब काम किया, डूब कर किया और खूब सफल हुए.
मैं हमेशा उनसे खुल कर ज्योतिष शास्त्र पर बात करती हूँ. खूब सवाल पूछती हूँ. मेरे कई मित्र इतना पगलाए रहते हैं कि वो हर काम ज्योतिषी से पूछ कर ही करते हैं. कुछ लोग इतने सनकी होते हैं कि बिना पूछे दोस्ती तक नहीं करते. अपने घर की हर चीज पूछ कर करते हैं. उँगलियाँ तरह -तरह के पत्थरों की अंगूठियों से भरी रहती हैं. दिन और मुहूर्त देख कर कदम उठाते हैं.
ऐसे लोगों को मैंने बहुत परेशान देखा है. कोई काम नहीं आता. जो बुरा होना होता है, वो होकर रहता है. कोई पत्थर , कोई माला बचाव नहीं कर पाता है.
पत्थर पहनने वालो के बारे में मृत्युंजय एक मज़ेदार टिप्पणी करते हैं- “लोग तरह तरह के सस्ते पत्थर धारण करते हैं. बढ़िया पत्थर महंगे आते हैं. लाख -दो लाख से कम में नहीं आएगा. जो इतना महंगा पत्थर पहनेगा, या पहनने की क्षमता होगी तो उसके बुरे दिन कैसे होंगे?”
मृत्युंजय जी की सबसे अच्छी बात ये लगती है कि वे तार्किक हैं, कोई पाखंड नहीं करते. बल्कि उपायों को ख़ारिज करते हैं. उन्हें इस विधा में नयी नयी खोज करने का शौक है. संपूर्ण रुप से जानना चाहते हैं.
इसीलिए “शनि” देव पर ही रिसर्च कर लिया. किताब ही लिख दी – “शनि : वैदिक परम्पराओं में सैटर्न का समग्र अध्ययन”


यह किताब भारतीय तथा वैश्विक दृष्टि से शनि ग्रह के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक अर्थों का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है. अंग्रेज़ी में आई है ये किताब. थोड़ी महंगी है मगर इसकी छपाई देख कर मूल्य का अंदाज़ा हो जाएगा. अंदर पेपर बहुत बढ़िया है और रंगीन फ़ोटो लगे हैं.
युवा पत्रकार निहारिका ने उचित ही कहा है – “यह पुस्तक अंधविश्वास, बाज़ारवाद से परे जाकर शनि के शाश्वत संदेश — धैर्य, न्याय और आत्मपरिवर्तन को आधुनिक युग के लिए प्रासंगिक बनाती है।”
शनि को लेकर कई साक्ष्य दिए गए हैं और लेखक द्वय – मृत्युंजय और वंदना ने शनि के कर्मकांड को ही ख़ारिज कर दिया और ये बताया कि शनि भारत की नहीं पश्चिम की देन है. इसका प्रमाण भी सचित्र दिया है. वो तो शनि पर हर शनिवार तेल चढ़ाने को भी सही नहीं मानते.
लेखक शनि से डराते नहीं हैं. हमारे यहां धर्म भय से जुड़ा है. भयभीत लोग क्या क्या उपाय नहीं करते. शनिवार की शाम को देखिए, शनि पर तेल चढ़ाते डरे हुए लोग मिल जाएंगे.
यह पुस्तक सारी भ्रांतियां दूर करती है. लेखक द्वय ने इस पुस्तक में भारतीय वेद–उपनिषदों, पुराणों, ज्योतिषशास्त्र, यूनानी, मेसोपोटामियाई, मिस्री और चीनी सभ्यताओं के संदर्भों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि शनि का स्वरूप कैसा है, और कैसे हर सभ्यता में समय, न्याय और संतुलन के सार्वभौमिक प्रतीक की तरह सामने आते हैं. पुस्तक यह भी बताती हैं कि शनि, मनुष्य के कर्मों का लेखा-जोखा लेने वाले दंडाधिकारी नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आत्मज्ञान के गुरु हैं. फिर शनि से डरना कैसा और क्यों?
- पूरी दुनिया में शनि को “ रात का सूरज “ या “काला सूरज”
- कहा गया है. अंधेरों से क्या डरना. हर रात की सुबह होती है.
उम्मीद है , ज्योतिष शास्त्र में रुचि रखने वाले पाठकों को यह पुस्तक पसंद आएगी. दो साल की अथक मेहनत से लिखी गई है. अब शीघ्र ही यह पुस्तक हिंदी में भी आएगी.



Anant verma
October 31, 2025 at 11:50 am
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