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आज के अखबार : अब व्हाइट कॉलर टेररिज्म का नया बहाना, सख्ती से निपटने का संदेश जैसे अभी तक… 

दो दर्जन पाकिस्तानी डॉक्टर भारत में?

संजय कुमार सिंह

आतंकी वारदात के बाद से ही मेरे ज्यादातर अखबारों में मामले की जांच से संबंधित खबरें ही छप रही थीं। खबर के बाद वारदात की सूचना तो ठीक है। बाकी मीडिया ट्रायल का कोई मतलब नहीं है। लेकिन आजकल यह सब सामान्य है। इतनी खबरें छप चुकीं कि कुछ भी समझना सोचना मुश्किल है। शायद यही मकसद हो। फिर भी आज दो खास बातें हैं जिन्हें रेखांकित करना जरूरी है। पहली तो इकनोमिक टाइम्स की यह खबर जो बताती है कि पाकिस्तान के दो दर्जन एमबीबीएस डॉक्टर पर नजर है। इनमें बांग्लादेश के डॉक्टर भी हैं। मैं तो नहीं जानता था कि भारत में डॉक्टर्स की इतनी कमी है कि पाकिस्तान के लोगों से काम चलाना पड़ रहा है। दूसरी ओर जब हम बांग्लदेशी घुसपैठियों से त्रस्त हैं तो आज पता चला कि बांग्लादेश के एमबीबीएस डिग्री वाले भी यहां काम कर रहे हैं। खबर बताती ह कि बांग्लादेश का एक एमबीबीएस पहले भी आतंकी वारदात में शामिल रहे हैं। यही नहीं, खबर यह भी बताती है कि पाकिस्तान के मेडिकल कालेज में दाखिला दिलाने के नाम पर यहां ठगी भी चल रही थी। कहने की जरूरत नहीं है कि ये लोग 2022 से पहले के छात्र हैं और सरकार को ऐसा करने की जरूरत तब लगी थी।  

हर बार की तरह इस बार भी आतंकी हरकत की टाइमिंग सबसे महत्वपूर्ण है। रही सही कसर रोज हो रहे नए खुलासे और पहला पन्ना इन्हीं खबरों से भर दिये जाने से पूरी हो रही है। कई दिनों बाद आज एक नई खबर है, व्हाइट कॉलर टेररिज्म (नवोदय टाइम्स)। मुंबई हमले के समय नरेन्द्र मोदी और उनके साथियों ने जो किया था और अब जो करते हैं उससे उनकी योग्यता, क्षमता, नीयत सब स्पष्ट है लेकिन बड़ी-बड़ी बातें करने की आदत जा नहीं रही है और मीडिया है कि सेवा का कोई मौका चूकता नहीं है। यह दिलचस्प है कि सरकार के पास कोई खुफिया जानकारी नहीं थी और विस्फोट के बाद अब छप रहा है कि देश भर में प्रमुख स्थानों पर हमले की साजिश थी (दि एशियन एज)। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, 32 कारों से चार शहरों को दहलाने की थी साजिश, जुटाए थे 26 लाख। आखिर सरकार की खुफिया एजेंसियां करती हैं कि उन्हें कुछ पता ही नहीं चलता है। अगर इतनी बड़ी साजिश थी तो सरकार को पता क्यों नहीं चला। अखबारों की मानें तो पता अभी भी नहीं चला है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार कार विस्फोट करने वाले कश्मीरी डॉक्टर उमर उन नबी के बारे में पता लगाया जाएगा कि वह अभी तक अनजाने किसी टेरर मोड्यूल के सदस्यों के संपर्क में तो नहीं था। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है कि दिल्ली ब्लास्ट के आरोपी से संपर्क के लिए उत्तर प्रदेश में दो कश्मीरी डॉक्टर गिरफ्तार किए गए। द हिन्दू की खबर है, दिल्ली ब्लास्ट के लिए दो और गिरफ्तार; विश्वविद्यालय को ऑडिट का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली विस्फोट के लिए आतंकवाद की इस वारदात को जब व्हाइट कॉलर टेररिज्म कहा जा रहा है तब इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि हरेक कश्मीरी आतंकी नहीं है जो है उसे कड़ी सजा दी जाए। बराबर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का बयान है, ऐसी मिसाल कायम की जाएगी कि भविष्य में ऐसी कोई आतंकी वारदात नहीं हो। मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कहने का भी कोई मतलब नहीं है। पढ़ते ही सवाल उठता है कि अभी तक कौन रोक रहा था। वैसे भी अपराध हो जाने के बाद सजा देने से अपराध रुकते होते तो सजा होती ही है। अगर अपराधी बच भी जाएं, बरी भी हो जाएं तो इसमें वर्षों लग जाते हैं। आतंकवादी हरकत रोकने का अमेरिकी तरीका सबने देखा है। इससे निपटने का तरीका यही है कि सबके साथ एक जैसी कार्रवाई की जाए। जांच एजेंसियों को खुली छूट दी जाए और कोई दबाव नहीं हो। अपने यहां समझौता ब्लास्ट हो या मालेगांव दोषियों का पता सबको है सजा नहीं हुई। अगर यही तेवर समझौता ब्लास्ट या मालेगांव मामले में होते तो शायद वारदात होती ही नहीं।

बात सिर्फ कट्टरपंथ की नहीं है। मामला अहसास होने और प्रतिक्रिया का भी है। द टेलीग्राफ ने आज इसपर लिखा है कि पढ़े-लिखे लोगों में घेराबंदी और अधीनता की भी भावना है न कि सिर्फ़ कट्टरपंथीकरण की। अखबार ने कश्मीरियों से बातचीत करके लिखा है कि मामला इतना काला और सफेद (कॉलर) का भी नहीं है। मुज़फ़्फ़र रैना ने लिखा है,  लाल किला विस्फोट में एक कश्मीरी डॉक्टर की संलिप्तता के आरोपों और एक “अंतरराज्यीय” और “देश भर के लिए” आतंकी मॉड्यूल के सिलसिले में उसके दो साथियों की गिरफ़्तारी के बीच “व्हाइट कॉलर टेररिज्म” शब्द अचानक राष्ट्रीय चेतना में उभर आया है। कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा सदमे में है। लेकिन यहां ज्यादातर शिक्षित लोग – जो अचानक संभावित संदिग्ध बन गए हैं – अपनी राय देने से हिचकिचा रहे हैं, वहीं कुछ लोगों ने इस प्रवृत्ति को “कट्टरपंथीकरण” की सर्वव्यापी घटना से जोड़ने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी है और कई कश्मीरियों द्वारा महसूस की जा रही घेराबंदी और अधीनता की भावना पर ज़ोर दिया है। इसे कट्टरपंथ कहे जाने वाले रूढ़िबद्ध ‘आर’ के चश्मे से देखने के बजाय वास्तविक विश्लेषण की ज़रूरत है। “यह अहसास” है कि कश्मीर की हर चीज़ – हमारी ज़मीन, हमारी संस्कृति और हमारे धर्म – पर हमला हो रहा है। सभी अधिकारी बाहरी हैं और हम पूरी तरह से शक्तिहीन हैं।” उन्होंने आगे कहा, “कुछ लोग सोचते हैं कि इस पर प्रतिक्रिया हिंसक होनी चाहिए और ऐसा ही हुआ है, हालाँकि मैं अब भी राज्य के बयान (“सफेदपोश आतंकवाद” की व्यापकता के बारे में) को पूरी तरह से सच नहीं मानता।

यह अखबार उस पत्रकार की पहचान छुपा रहा है, जो कभी एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी में काम कर चुका है और जिसे कश्मीर को कवर करने का दशकों का अनुभव है। द टेलीग्राफ ने डॉक्टरों सहित कई पेशेवरों को भी इस घटनाक्रम पर उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए बुलाया, लेकिन उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया, जिससे यह ज़ाहिर होता है कि ज़्यादातर लोग अपनी बात कहने के परिणामों को लेकर कितना डरे रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे श्रीनगर के मध्य में स्थित घंटाघर, जो कभी अलगाववाद का केंद्र था, 2019 के बाद अचानक पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया और उन्होंने कहा कि यह एक प्रकार की गर्व की भावना को दर्शाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि एक या कुछेक डॉक्टर के आतंकी वारदात में शामिल होने से सभी डॉक्टर आतंकी नहीं हो जाएंगे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार ने आतंकवाद नहीं रोक पाने का एक नया बहाना ढूंढ़ा, सभी अखबारों ने उसे पूरा प्रचार दिया है और देशबन्धु को छोड़कर सभी अखबारों की लीड आज भी यही है। बेशक जांच महीनों चलेगी। कई नए खुलासे होंगे, क्या सब पहले पन्ने पर छपने चाहिए? सरकार ने जो कहा है उसका एक मतलब यह भी लगता है कि अभी तक तो आतंकवादी हरकत करने वाले बदमाश होते थे उन्हें हम नहीं पकड़ पाए लेकिन इन पढ़-लिखे लोगों से सख्ती से निपटा जाएगा। निश्चित रूपू से यह देश-समाज पर भारी प्रभाव छोड़ने वाला मामला है लेकिन अखबारों में सरकारी प्रचार के अलावा कुछ नहीं है। द टेलीग्राफ के लिए अगर कश्मीर के सके रिपोर्टर ने किया तो दूसरे अखबारे अपने रिपोर्टर से अपने शहर के लोगों की राय ले सकते थे। लेकिन अब इसकी जरूरत ही कहां रह गई है। दूसरी ओर, एक सज्जन ने एक्स पर लिखा है अगर चुनाव के समय ही आतंकी वारदात होती है तो भारत में चुनाव कब नहीं होते हैं और अगर चुनाव के समय ही होते हैं तो एक देश एक चुनाव की बात होती है तो मुंह में दही क्यों जम जाता है। मुझे लगता है कि मंदिर बनाने वाली सरकार अब सत्ता में बने रहने के दूसरे तरके आजमा रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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