ओम थानवी-
आजकल नाम से पहले पन्ने का संपादकीय (Signed Edit) कौन संपादक लिखता है? कल ‘पत्रिका’ में प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने विमानों की अवरुद्ध आवाजाही पर लिखा तो अच्छा लगा। मैं कई बार सोचता आया कि कोई अख़बार इस अव्यवस्था पर आवाज़ क्यों नहीं उठाता।
विदेश का उदाहरण देना स्वदेशियों को नहीं सुहाता, पर मुझे कहना चाहिए कि अपनी विदेश यात्राओं में कभी उड़ानों की ऐसी देरी, ऐन वक़्त पर गेट की बदली, घंटों की ग़फ़लत के बाद उड़ान ही रद्द कर देना कभी नहीं देखा। कई बार आगे की उड़ानें और कार्यक्रम तय होते हैं, वे कभी नहीं छूटे।
नागरिकों के साथ होने वाले ऐसे आपराधिक सलूक से छुटकारा कौन दिलाएगा? हर जगह कर्त्तव्य-पालन क्या अदालतें ही सिखलाएँगी?
शीतल पी सिंह-
यह जो तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, वो किसी हॉरर फिल्म से कम नहीं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद के एयरपोर्ट पर हजारों यात्री रात-रात भर फर्श पर पड़े हैं। बच्चे रो रहे हैं, बुजुर्ग बीमार पड़ रहे हैं, शादी, नौकरी के इंटरव्यू, इलाज… सब कुछ दाँव पर लग गया है क्योंकि IndiGo ने अचानक 550 से ज्यादा फ्लाइट्स कैंसल कर दीं।
लोग सुबह 4 बजे से लाइन में लगे हैं, काउंटर पर कोई जवाब नहीं। बोर्डिंग पास हाथ में है, लेकिन फ्लाइट ही नहीं है। एक महिला ने बताया कि उसकी माँ का कैंसर का अपॉइंटमेंट था, अब अगली डेट 3 महीने बाद मिलेगी। एक लड़की का UPSC इंटरव्यू था, वो रोते-रोते बोर्डिंग काउंटर पर बैठ गई। किसी की शादी थी, बारात हवाई अड्डे पर ही फँस गई।


IndiGo कह रही है “पायलटों की कमी और आराम की नई नियमावली” की वजह से ये हुआ। लेकिन सवाल ये है कि इतनी बड़ी एयरलाइन को अचानक ये बात कैसे नहीं पता थी? महीनों पहले से प्लानिंग क्यों नहीं की गई? अब माफी माँगने और “फरविवार तक नॉर्मल हो जाएगा” कहकर यात्रियों को ठेंगा दिखाया जा रहा है।
यात्री भूखे-प्यासे, बिना सूचना के घंटों इंतज़ार कर रहे हैं। रिफंड मिलेगा या नहीं, ये भी पता नहीं। सरकार चुप है, DGCA सिर्फ़ “जाँच कर रहे हैं” बोलकर टाल रहा है।
ये सिर्फ़ फ्लाइट कैंसिलेशन नहीं, हज़ारों लोगों के सपनों, ज़रूरी कामों और भावनाओं का कत्ल है। IndiGo, aviation ministry शर्म करो। यात्रियों का दर्द देखो, ज़िम्मेदारी लो।


