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राइट टू डिस्कनेक्ट बिल मीडियाकर्मियों के जीवन की उस परत को छूता है, जिस पर न कानून ने ध्यान दिया और न संस्थानों की नैतिकता ने!

मनोज अभिज्ञान-

भारतीय मीडिया वह क्षेत्र है जहाँ काम के घंटे आमतौर पर तय नहीं होते, लेकिन काम की अपेक्षाएँ लगातार तय कर दी जाती हैं। यहां पत्रकार, प्रोड्यूसर, कैमरापर्सन और डिजिटल टीम यह जानते हुए दिन शुरू करते हैं कि उनका दिन कब खत्म होगा, यह तय नहीं है। फोन हर समय ऑन रहता है, नोटिफिकेशन कभी बंद नहीं होते, और छुट्टी अक्सर महज़ तकनीकी शब्द बनकर रह जाती है। ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर बना यह 24×7 अलर्ट मोड धीरे-धीरे पेशे की अनिवार्य शर्त बन चुका है, जिसे चुनौती देना अव्यावहारिक नहीं, बल्कि अनैतिक समझा जाने लगा है। ऐसे समय में Right to Disconnect Bill मीडिया कर्मियों के जीवन की उस परत को छूता है, जिस पर अब तक न कानून ने ध्यान दिया और न संस्थानों की नैतिकता ने। Right to Disconnect Bill, 2025 (राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025) निजी सदस्य का विधेयक है, जिसे सांसद सुप्रिया सुले ने 6 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश किया।

यह केवल श्रम कानून का विषय नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की आत्मछवि से जुड़ा सवाल है। मीडिया खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहता है, लेकिन इसी स्तंभ के भीतर काम करने वाले लोग अक्सर अपने समय और मानसिक शांति से वंचित रहते हैं। देर रात कॉल उठाना, छुट्टी के दिन अपडेट भेजना और हर समय उपलब्ध रहना पेशेवर प्रतिबद्धता का प्रतीक मान लिया गया है। Right to Disconnect Bill इस प्रतीकात्मक सोच को उलट देता है और यह सवाल सामने रखता है कि क्या खबर की अहमियत इतनी है कि उसके लिए खबर बनाने वाले इंसान का निजी जीवन स्थायी आपात स्थिति में बदल जाए।

Right to Disconnect Bill, 2025 का मूल तर्क यह है कि कर्मचारी का अधिकार केवल काम करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि काम से बाहर निकलने तक भी होना चाहिए। बिल में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तय कार्य समय समाप्त होने के बाद कर्मचारी किसी भी कार्य-संबंधी कॉल, ई-मेल, मैसेज या डिजिटल निर्देश का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं होगा। छुट्टियों और अवकाश के दौरान भी यही सिद्धांत लागू होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अधिकार का प्रयोग करने पर कर्मचारी को किसी भी प्रकार की सज़ा, नकारात्मक मूल्यांकन, पदोन्नति में बाधा या अप्रत्यक्ष दंड नहीं दिया जा सकेगा। यानी चुप रहना, जवाब न देना या फोन न उठाना अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि संरक्षित अधिकार माना जाएगा।

बिल यह भी साफ करता है कि यदि वास्तव में नियोक्ता को ऑफिस समय के बाहर कर्मचारी से काम करवाना आवश्यक हो, तो उसे अपवाद के रूप में ही देखा जाएगा, न कि सामान्य कार्य-संस्कृति के रूप में। ऐसे मामलों में कर्मचारी की स्पष्ट सहमति अनिवार्य होगी और उस अवधि को अतिरिक्त श्रम मानते हुए ओवरटाइम भुगतान देना होगा। “बस थोड़ी देर का काम”, “एक लाइन का अपडेट” या “इमरजेंसी है” जैसी अस्पष्ट भाषा को बिल स्वीकार नहीं करता। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल माध्यमों के जरिए काम के घंटों का विस्तार मुफ्त श्रम के रूप में न किया जाए और हर अतिरिक्त कार्य की कानूनी और आर्थिक कीमत तय हो।

इन प्रावधानों के अनुपालन के लिए बिल में एक Employees’ Welfare Authority के गठन का प्रस्ताव भी रखा गया है, जो कर्मचारियों की शिकायतें सुनेगी, नियमों के पालन की निगरानी करेगी और उल्लंघन की स्थिति में दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकेगी। नियोक्ता द्वारा इस अधिकार का उल्लंघन किए जाने पर आर्थिक जुर्माने का प्रावधान भी प्रस्तावित है, ताकि कानून केवल कागज़ी घोषणा न रह जाए। कुल मिलाकर, यह बिल काम और निजी जीवन के बीच कानूनी सीमा तय करने का प्रयास करता है और यह संदेश देता है कि डिजिटल उपलब्धता का अर्थ 24×7 श्रम नहीं हो सकता, चाहे काम किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो।

मीडिया में काम को अक्सर दूसरे क्षेत्रों से अलग मानकर देखा जाता है। कहा जाता है कि खबर समय की पाबंद नहीं होती, इसलिए पत्रकार भी समय की सीमा में नहीं बंध सकता। यह तर्क सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह ऐसी वैचारिक ढाल बन गया है, जिसके पीछे शोषण को छुपा लिया जाता है। ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर देर रात कॉल, छुट्टी के दिन रिपोर्ट, और “बस थोड़ी देर का काम” कहकर घंटों की मानसिक मशक्कत मीडिया कर्मी की रोजमर्रा की सच्चाई बन चुकी है।

आज किसी मीडिया संस्थान में अच्छे पत्रकार का अर्थ धीरे-धीरे बदल चुका है। यह अब उस व्यक्ति को नहीं कहा जाता जो विषय को समझता हो, तथ्य जांचता हो और संयम से लिखता हो। अच्छा पत्रकार वह माना जाता है जो सबसे जल्दी कॉल उठाए, बिना सवाल किए तुरंत काम शुरू करे और निजी समय को बोझ की तरह छुपा दे। जवाब देने की गति योग्यता बन गई है। Right to Disconnect Bill इस परिभाषा को उलट देता है। यह कहता है कि जवाब न देना, या देर से देना, अनुशासनहीनता नहीं है। यह विचार मीडिया के लिए असहज है, क्योंकि पूरी व्यवस्था फौरन उपलब्धता पर खड़ी है।

मीडिया में सबसे ज्यादा अदृश्य श्रम होता है, और यही इस बिल की केन्द्रीय समस्या बनता है। एक लाइन का अपडेट, एक फोटो फॉरवर्ड करना, एक हेडलाइन सुझा देना या एक वॉयस नोट भेज देना ऐसा लगता है मानो काम नहीं, बस औपचारिकता हो। लेकिन ये छोटे-छोटे काम मिलकर ऐसा विस्तारित कार्यदिवस बना देते हैं, जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं होता और जिसका कोई भुगतान नहीं। बिल साफ करता है कि ऑफिस समय के बाद कराया गया हर कार्य, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, अतिरिक्त श्रम की श्रेणी में आता है। मीडिया में यह बात मान लेना ही बड़ा बदलाव होगा।

न्यूज रूम में नए लोगों को अक्सर यह सिखाया जाता है कि अगर आप समय, वेतन या निजी जीवन की बात कर रहे हैं, तो आप इस पेशे के लिए गंभीर नहीं हैं। देर रात काम करना, छुट्टी रद्द होना और अचानक असाइनमेंट मिलना एक तरह का दीक्षा-संस्कार माना जाता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे शोषण को परंपरा में बदल देती है।

महिला मीडिया कर्मियों के लिए देर रात कॉल और अचानक काम सिर्फ थकान का सवाल नहीं, बल्कि सुरक्षा, घरेलू दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं का भी सवाल होता है। अक्सर उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे मीडिया की डिमांडिंग नेचर के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी बिना शिकायत निभाएं। Right to Disconnect Bill, अगर सही ढंग से लागू होता है, तो यह पहली बार संस्थागत रूप से स्वीकार करेगा कि मीडिया कर्मियों का निजी समय भी वैध और संरक्षित है।

फ्रीलांसर, स्ट्रिंगर और अनुबंधित पत्रकार आज मीडिया का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे असुरक्षित हिस्सा हैं। उनसे न ऑफिस समय पूछा जाता है, न ऑफ-ड्यूटी का कोई सिद्धांत लागू होता है। कॉल उठाना उनके लिए विकल्प नहीं, मजबूरी बन चुका है, क्योंकि अगला असाइनमेंट उसी पर निर्भर करता है। Right to Disconnect Bill सीधे तौर पर इस वर्ग के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन इसके विचार स्वीकार किए जाते हैं, तो यह मांग मजबूत होगी कि मीडिया में भी समय और श्रम की परिभाषा तय की जाए, चाहे नियुक्ति कैसी भी हो।

बिल का एक महत्वपूर्ण असर पत्रकारिता की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लगातार थका हुआ, चिंतित और दबाव में रहने वाला पत्रकार गहराई से नहीं सोच सकता। वह जल्दी निष्कर्ष निकालता है, तीखी भाषा चुनता है और सनसनी की ओर झुकता है। आराम और मानसिक दूरी खबर को बेहतर बनाती है, कमजोर नहीं। Right to Disconnect इस बुनियादी सच को मान्यता देता है कि अच्छी पत्रकारिता के लिए भी विचार का खालीपन जरूरी है।

मीडिया मालिकानों के लिए यह बिल सबसे असहज है, क्योंकि यह उनके सबसे प्रिय नैरेटिव पर हमला करता है। मीडिया संस्थान अक्सर खुद को केवल उद्योग नहीं, बल्कि मिशन कहकर पेश करते हैं। इसी मिशन के नाम पर कम वेतन, अस्थिर नौकरी और अनिश्चित समय को नैतिक रूप से सही ठहराया जाता है। अगर यह सचमुच मिशन है, तो उसका बोझ हमेशा कर्मचारियों पर ही क्यों पड़े। यह सवाल मीडिया की नैतिक आत्मछवि के भीतर दरार पैदा करता है।

यह भी सच है कि मीडिया में आपात स्थितियां होती हैं। बड़ी घटनाएं, संकट और जनहित से जुड़ी खबरें समय की सीमा नहीं देखतीं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब हर छोटी खबर को आपातकाल बना दिया जाता है। आपात स्थिति अपवाद है, नियम नहीं। मीडिया के लिए यह फर्क स्वीकार करना सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी है। भारतीय संदर्भ में यह बिल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां नौकरी का डर बहुत गहरा है। मीडिया में छंटनी, वेतन कटौती और संस्थानों का बंद होना आम बात है। ऐसे माहौल में अधिकार की बात करना जोखिम भरा लगता है।

हर खबर के पीछे एक इंसान खड़ा होता है, कोई मशीन नहीं। लोकतंत्र के लिए पत्रकारिता जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पत्रकार का जीवन खुद स्थायी ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाए। अगर मीडिया का काम समाज को सच दिखाना है, तो उसे अपने भीतर भी सच देखने की हिम्मत रखनी होगी।

Right to Disconnect Bill मीडिया के भीतर उस हिम्मत की शुरुआती भाषा है। यह कानून बने या न बने, इसने एक जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है: क्या मीडिया कर्मी केवल खबर के लिए जीते हैं, या उन्हें भी खबर से बाहर निकलकर जीने का अधिकार है। इस सवाल का जवाब ही आने वाले समय में पत्रकारिता के मानवीय चेहरे को तय करेगा।

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1 Comment

1 Comment

  1. Subodh

    December 7, 2025 at 6:49 pm

    मीडिया में इस बिल का कोई मूल्य नहीं है, कम से कम अपने संस्थान में तो इसे कभी लागू नहीं होने दूंगा

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