
असीम अरुण-
राष्ट्रपति सुश्री मुर्मू जी से हाथ मिलाने से पहले उनके सैन्य सहायक से राष्ट्रपति पुतिन द्वारा हाथ मिलाने की चर्चा सभी जगह हो रही है। कोई कह रहा है कि पुतिन के केजीबी के बैकग्राउंड के कारण वे वर्दीधारियों से विशेष लगाव रखते हैं तो कोई याद दिला रहा है कि वे कई बार ऐसा ही कुछ कर चुके हैं।
इस प्यारी सी घटना और उसकी चर्चा से मुझे एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा है जिसका मैं स्वयं चश्मदीद गवाह हूँ। बात है 2007 के गणतंत्र दिवस की, जब पुतिन जी मुख्य अतिथि के रूप में परेड के मंच पर थे। मैं प्रधान मंत्री डॉ मनमोहन सिंह की सुरक्षा में उनके साथ था, अर्थात उनके पीछे खड़ा था।
परेड शुरू हुई तो काफ़ी कोहरा था लेकिन सूरज चढ़ने के साथ धीरे-धीरे धूप निकलने लगी और फिर कुछ तेज़ सी हो गई। मैंने और मेरे अन्य सुरक्षाकर्मी साथियों ने नोटिस किया कि पुतिन ने अपने PSO (सुरक्षाकर्मी) को हल्का सा इशारा अपनी आँख की ओर किया और PSO ने अपना चश्मा उतार कर उन्हें दे दिया।
पुतिन ने बड़े आराम से चश्मा लगा लिया। कार्यक्रम चलता रहा। समापन पर, यानी मंच से उतरने से पहले पुतिन ने चश्मा PSO को वापस किया जिसने फिर लगा लिया।
हम लोगों के लिए यह नन्ही सी घटना बहुत कौतूहल का विषय बन गई। प्रेसिडेंट और PSO चश्मा शेयर करें यह बड़े अचरज की बात थी।
कोई बोला डॉ सिंह भी बहुत सहज हैं, वे भी ऐसा कर सकते हैं क्या? अरे नहीं यार, उनका तो पॉवर का चश्मा है, बदल गया तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर यह चर्चा शुरू हो गई कि पुतिन ने PSO का चश्मा पहना था या PSO ने पुतिन का!
आपको क्या लगता है? वैसे हम यह चर्चा कर ही क्यों रहे हैं?
क्या रूस के राष्ट्रपति और उनके सुरक्षाकर्मी इंसान के रूप में बराबर नहीं हैं, चश्मा शेयर नहीं कर सकते?
क्या भारत के राष्ट्रपति और उनके सैन्य सहायक इंसान के रूप में बराबर नहीं हैं, क्या बड़ी बात हो गई जो पुतिन ने मुर्मू जी से पहले उनसे हाथ मिला लिया। आपको क्या लगता है?
लेखक पूर्व आईपीएस हैं और मौजूदा समय में कन्नौज से विधायक और योगी सरकार में मंत्री हैं।


