पुष्य मित्र-
इस स्टोरी के साथ लगी जिस तस्वीर को आप देख रहे हैं, वह दोन के जंगल के बीच से गुजरने वाली कापन नदी के तट की है। किनारे में दो युवा लड़के लैपटॉप लेकर बैठे हैं और इस इलाके के सैकड़ों किसान रोज इनके पास आते हैं, किसान पंजीकरण कराने। मुझे एक बुजुर्ग मिले जो चार दिन से रोज पांच से छह किमी का सफर तय कर आते थे और पांच से छह घंटे गुजार कर लौट जाते थे। उनका पंजीकरण नहीं हो पा रहा था। बिना पंजीकरण के अगले साल वे अपने गन्ने की फसल को बेच नहीं पाएंगे।
आज के वक्त में इंटरनेट की जो स्पीड हमें मिली है उसमें ऑनलाइन किसान पंजीकरण मुश्किल से पांच मिनट का काम है। मगर इस इलाके के लोगों के लिए यह काम इतना आसान नहीं है। क्योंकि एक तो इस इलाके के बहुत कम जगह इंटरनेट का सिग्नल आता है, जैसे इस नदी का तट, दूसरा स्पीड इतनी धीमी है कि मिनट का काम हफ्तों में होता है।
इन लड़कों ने बताया कि जिस रोज नेट की स्पीड ठीक रहती है, उस रोज भी बमुश्किल वे दो लोग मिलकर 10 से 11 पंजीकरण ही कर पाते हैं। आप इस दौर में ऐसे दृश्य की कल्पना कर सकते हैं क्या? मगर पश्चिमी चंपारण जिले के दोन के इस जंगल में यह आम दृश्य है।
यहां का संकट सिर्फ इतना नहीं है। जंगल और दर्जन भर छोटी बड़ी नदियों के बीच बसे इस इलाके में न सड़कें हैं, न बिजली पहुंची है और न ही आधुनिक विकास के कोई साधन। आजादी के अमृत महोत्सव के बीच यहां बसे थारू और उरांव आदिवासी विकास के सामान्य प्रतिमानों का अब तक इंतजार कर रहे है। थक हार कर इस चुनाव में यहां के 32 गांवों ने तय किया कि वे वोट बहिष्कार करेंगे। 19 बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़ा। मगर भारी मतदान की खबरों के बीच इनके बहिष्कार की खबरें दब गईं।
एक स्थानीय पत्रकार साथी Amit Kumar Yadav ने कहा कि आपको यहां आना चाहिए। वहां गया, उनकी दुनिया देखी, लोगों को सुना और यह खबर लिखी है। इस सफर के दौरान दो लोगों की बात याद रह गई। एक ने कहा, “बाढ़ के दिनों में हमें हरना टांड़ (लोकल बाजार) भी जाना हो तो पूरा दिन लगता है, जैसे जंगल में जानवर रहते हैं, वैसे ही हम भी तो यहां रहते हैं। क्या फर्क है हम दोनों में।” दूसरे ने कहा, “हमसे बेहतर तो बगहा जेल के कैदी हैं, वहां बिजली का संकट नहीं, बीमार पड़ने पर अस्पताल जाने की भी सुविधा है। हम तो यहां वन विभाग की खुली जेल के कैदी हैं।”
इंडिया टुडे के नए अंक में आई है।



