राजशेखर त्रिपाठी-
सुरेन्द्र मोहन पाठक के साथ हिदीं में जासूसी लेखन का ‘ख़त्मे नबूवत’ मान लिया गया था। ख़त्मे नबूवत का मतलब डिटेल में जानना हो तो किसी मुसलमान दोस्त से संपर्क करिए। शॉर्ट में समझना हो तो ये कि मुहम्मद साहब यानि रसूल (स.अ.) अल्लाह के आख़िरी नबी माने गए, पैगम्बरों का सिलसिला उन्हीं के साथ ख़त्म हो गया। हिंदी के लोकप्रिय लेखन में भी पाठक जी के साथ ही ‘थ्रिलर राइटिंग’ ख़त्म मान ली गयी थी। मगर कोविड के दौरान और उसके बाद अचानक क्या हुआ कि, हिंदी में जासूसी किस्सों की बाढ़ आ गयी। ये बूम क्यों और कैसे आया ये शोध का विषय है!
इसमें करवट बदलते हिन्दी के प्रकाशन उद्योग का कितना हाथ है, और कितना उन विदेशी प्रकाशकों का जो ‘बर्नाक्युक्लर’ में हाथ आजमाने को बेकरार थे…कहना मुश्किल है। हालांकि इनमें बहुत सारा कूड़ा ही था, लेकिन कुछ फिक़्शन सचमुच बांधने वाले और शानदार थे। मैं इसमें उनकी गिनती करता हूं, जिनका बैक ग्राउंड हद तक रीयल था, या फिर ऐतिहासक है।
इसी बाढ़ और शोर में एक किताब ऐसी भी आयी जिस पर चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है। ये किताब है गोपाल शुक्ला की मेटकाफ़ हाउस’! गोपाल शुक्ला का रिश्ता टीवी की क्राइम कथा से रहा है। किस्सों की झलकी सजाने के वो पहले ही माहिर हैं, मगर अंग्रेजी राज की एक कहानी को वो इतने बेहतरीन ढ़ंग से पेश करेंगे, इसका भरोसा नहीं था। ‘मेटकाफ हाउस’ दिल्ली में अंग्रेजों का बनाया एक शानदार बंगला था। इस बंगले में गदर से पहले और बहादुर शाह ज़फ़र के ज़माने में अंग्रेजों के नायब रेजीडेंट और मुगल दरबार में एजेंट थॉमस मेटकॉफ रहा करते थे। शाहजहानाबाद वाले अपनी जबान की सुविधा के लिए, जिसे मुख-सुख भी कहते हैं, इस बंगले को मटका हाउस कहा करते थे। आज भी मटका हाउस सिविल लाइन इलाके में मौजूद है, जिसमें डीआरडीओ का दफ्तर है।


गदर के दौरान मेरठ से आए बागी सिपाहियों ने उन्हें दिल्ली से भागते हुए मार गिराया था। मगर ये किस्सा ग़दर से पहले सन 1835 का है, लिहाज़ा उस कहानी के ज़िक्र का कोई मतलब नहीं। ये किस्सा है तब के रेजीडेंट विलियम फ्रेजर का, जिनका उनकी कोठी के ठीक बाहर कत्ल कर दिया गया और फिर शुरु हुई जांच कि क़ातिल कौन? जांच का सेंटर था यही ‘मटका हाउस’!
कहानी में एक तरफ़ केस को सॉल्व करने की थ्रिल से भरी जद्दोजहद है। कई तरह के दिल्ली वाले हैं, जिनमें एक ऐसा भी है जो केवल टॉपों के निशान देख कर घोड़े की पूरी कुंडली खोल सकता है। दूसरी ओर अंग्रेज साहब बहादुरों का ‘इंडियन फ्यूडल एलीट’ (नवाबों और सामंतों) के साथ रिश्ता है, जो बताता है कि अंग्रेज सिर्फ़ भारतीयों पर अत्याचार ही नहीं कर रहे थे! भारत में लंबा राज करने के लिए अंग्रेज खुद को लोकल कल्चर के मुताबिक ढाल भी रहे थे। इस पर अंग्रेजी में बहुत सी शोधपरक किताबें पहले से मौजूद हैं- आप चाहें तो खोज कर पढ़ सकते हैं। साहब बहादुर अचकन और शेरवानी पहनने लगे थे, दुपलिया टोपी लगाने लगे थे। होठों के एक कोने से पान की पीक बहती रहती थी। मसालेदार खाने के शौक़ीन हो चुके थे और देसी सामंतों की सोहबत में लोकल शराब भी पीने लगे थे। और तो और तवायफों के यहां सिर्फ मुजरा ही नहीं सुन रहे थे, मौसिक़ी के साथ आशिक़ी के रिश्ते भी बना रहे थे।
एक बात और उर्दू का लेखन और उसका भाषा प्रवाह अपने साथ बहाने वाला और बांध कर रखने वाला दोनों होता है। कहानी चूंकि शाहजहानाबाद की है, चांदनी चौक और कश्मीरी गेट की है। नवाबों और तवायफों की भी है। गोपाल शुक्ला ने अपनी ज़बान का ‘साउंड बेस’ और ‘फ़्लो’ भी उस दौर की उर्दू वाला ही रखा है। इसमें रेख़्ते के उस्ताद ग़ालिब एक और ही शक़्ल में बरामद होते हैं।
मज़े की बात ये कि गोपाल शुक्ला का ये जासूसी उपन्यास क्लाइमेक्स तक ऐसे नहीं पहुंचता कि…
- ”विजय हथियार फेंक दो, पुलिस ने तुम्हें चारों ओर से घेर लिया है।“ या फिर…
- “क़त्ल तुम्हीं ने किया है इसका पर्दाफ़ाश हो चुका है, बेहतर है सरेंडर कर दो”
दरअसल जितनी उलझी क़त्ल की कहानी है, उससे जटिल इसका अंत है। आप अंत तक पहुंचते – पहुंचते लगभग सब समझ चुके हैं, लेकिन लेखक अपने कलम से कुछ नहीं कहता है। जो कहता है पूरा उपन्यास कहता है, लिहाज़ा क़त्ल और कल्चर का ये समानान्तर बयानिया, पढ़ना दिलचस्प है।
हां, एक शिकायत है। इधर के दिनों में जो नए प्रकाशक आए हैं वो अच्छी साज-सज्जा के साथ, बेहतर काग़ज़ पर ‘सूदिंग फॉन्ट’ में किताबें तो छाप रहे हैं। मगर उनके पास प्रकाशन से पहले पांडुलिपी पढ़ने के लिए एक अदद संपादक नहीं है। ये कमी गोपाल शुक्ला की मेटकॉफ़ हाउस में ही नहीं….इस ‘जौनर’ की ढेर सारी किताबों में नज़र आयी है। उम्मीद है प्रकाशक इस पर गौर करेंगे।


