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सुख-दुख

अमिताभ ठाकुर की कप्तान के रूप में देवरिया तैनाती पर इन दो पत्रकारों का लिखा पढ़िए!

ओ पी श्रीवास्तव-

निश्चित रूप से देवरिया पुलिस का कृत्य निन्दनीय है। सामान्य तौर पर पुलिसकर्मी अपने अधिकारियों की जायज नाजायज फरमानों को मानने के लिए विवश हैं। जब अमिताभ ठाकुर देवरिया में एस पी थे तो उस समय उनको जीजा कहने वाले कई लोग दीदी और जीजा की सेवा में चौबीस घंटे लगे रहते थे एवं एस पी आवास की परिक्रमा करते रहते थे। लेकिन आज बुधवार को वे कहीं भी नजर नहीं आए और ना ही किसी के गले से आवाज निकली।

सही है, यह कुछ अधिवक्ता और पत्रकार भाई ही हैं जो ग़लत या अन्याय के खिलाफ निडर होकर आवाज उठाने की ताकत रखते हैं। जैसे कि एडवोकेट विकास राय तथा कुछ साहसी पत्रकार। आपको कोटि कोटि नमन।

सन् 1999 में भी मैं एक पत्रकार था और लखनऊ से प्रकाशित होने वाले स्वतंत्र भारत अखबार में तब लिखता था। अमिताभ ठाकुर एक सरल और सहज पुलिस अधीक्षक थे। बिना किसी इगो के काम करते थे। उन्हीं दिनों स्वतंत्र भारत में एक खबर छपी कि पासपोर्ट बनवाने में एल आई यू वाले रिपोर्ट लगाने के नाम पर प्रत्येक व्यक्ति से दो हजार रुपए रिश्वत लेते हैं।

उस समय देवरिया में स्वतंत्र भारत अखबार बहुत ही कम आता था। लेकिन जैसे ही पुलिस अधीक्षक श्री ठाकुर को इसकी जानकारी हुई। उन्होंने इसकी जांच तत्काल सीओ सिटी को देकर एक सप्ताह में रिपोर्ट तलब कर लिया।

समाचार चूंकि सच था इसलिए जिस एल आई यू के पुलिसकर्मी ने रिश्वत मांगी थी उसकी हालत ख़राब हो गई। यह अलग बात है कि उस भ्रष्ट पुलिस कर्मी को बचाने की सिफारिश एक अखबार के ब्यूरो चीफ ने मुझसे की थी। कहने का मतलब यह कि यदि अमिताभ ठाकुर तक कोई शिकायत पहुंचती थी तो वह बिना किसी झिझक के कठोर कार्रवाई करने हेतु तत्पर रहते थे।

यह भी याद है उस समय शायद जाड़े के मौसम में बैतालपुर में गौरखपुर देवरिया मुख्य मार्ग पर बैतालपुर पुलिस चौकी के समीप एक रोड ऐक्सिडेंट हुआ था। जब इनको सूचना मिली तो ये पैजामा और शर्ट में ही हवाई चप्पल पहने हुए जिप्सी से तत्काल घटना स्थल पर पहुंचे थे। इससे उनकी संवेदना और सरलता को समझा जा सकता है।

वे जिला पंचायत गेट के ठीक सामने चर्चित एक पाईप फिटिंग व हार्डवेयर की दुकान पर भी बिना किसी ताम झाम व ठसक के ख़ूब बैठते थे। अमिताभ ठाकुर ने या उनके परिवार ने हो सकता है तथा कथित प्लाट से कुछ आर्थिक लाभ अर्जित किया हो। लेकिन आज भाजपा सरकार में जो लाखों, करोड़ों, अरबों रुपए का आर्थिक अपराध कर रहे हैं। उनके साथ क्यों नहीं इसी तरह से कठोर कार्रवाई की जा रही है।

इसी देवरिया में तमाम ऐसे अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं जिनका समाज में भय और आतंक व्याप्त है। भूमाफिया, राशन माफिया, ब्याज माफिया और स्कूल माफिया एवं अन्य बड़े बड़े भ्रष्टाचारियों को सभी आम एवं खास जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं।

आखिर क्यों? अपराध पर अपराध हो रहे हैं। लेकिन शासन प्रशासन सभी मौन है। शायद इसी वजह से कुछ लोगों का कहना है कि साहब सत्ता की डी जे पर कमर मटकाते रहिएगा तो आपको कोई चिंता नहीं होगी। जितना हो सके लूटिए और ऊपर तक थोड़ा बहुत पहुंचाते रहिए। कोई कानून आड़े नहीं आएगा।

वैसे कानून तो सबके लिए समान है। तो सभी अपराधियों के साथ समान व्यवहार क्यों नहीं किया जा रहा है। इसका जवाब कौन देगा? वैसे एक बात सत्य है कि अपराध चाहे छोटा या बड़ा। उसका प्रतिफल तो मिलता ही है। चाहे देर से मिले या तत्काल।

क्या यह अमिताभ ठाकुर जानता था कि उसकी आवाज पर पूरे जिले की जो पुलिस कभी नत मस्तक रहतीं थीं, उसे ठेल कर इसी देवरिया के जेल में चौदह दिन बिताने के लिए मजबूर कर देगी। इसी वजह से मेरा मत है कि कोई भी अपराध करने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति को सौ बार सोचना चाहिए।

यह भी अजीब संयोग है कि इसी धरती से जुड़े सहारा ग्रुप के निदेशक ओ पी श्रीवास्तव को भी इन दिनों जेल की रोटी खानी पड़ रही है। बताया जाता है कि ये बाबू मोशाय भी अपने मित्र सहारा श्री (सुब्रत राय) के द्वारा बोए गए बबूल की फसल के कांटों को अब महाभारत के कर्ण की भांति बर्दाश्त करते हुए जी रहे हैं।

यदि अमिताभ ठाकुर और ओ पी श्रीवास्तव की उम्र भी सीनियर सिटीजन की श्रेणी में है तो निश्चित मानिए कि दोनों ने कभी एक ही प्याली से चाय पी होगी। मैं यह नहीं जानता कि अमिताभ ठाकुर और सहारा के ओ पी श्रीवास्तव में कोई आपसी ताल्लुकात है या नहीं? सम्बन्ध गहरा था या हल्का?

हालांकि दोनों का नाम अ अक्षर से ही शुरु होता है। वैसे यह मानना पड़ेगा कि राजनीतिक रूप से प्रचुर उत्पादन क्षमता रखने वाली देवरिया की धरा आजकल सुर्खियों में है?


विनय मौर्या-

एक बार देवरिया पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाना हुआ। तत्कालीन कप्तान विक्रांत वीर उस समय बड़ी तल्लीनता से फरियादियों की समस्याएँ सुन रहे थे और मौके पर ही निवारण भी कर रहे थे। दो स्थानीय और मेरे समेत तीन बनारसी पत्रकार उनसे मिलने पहुँचे। फरियादियों से फ़ारिग होकर वे हमसे मुखातिब हुए। चाय की चुस्कियों के बीच हाल खबर हुई, स्थानीय पत्रकारों की समस्याओं पर चर्चा हुई और उनका समाधान भी। निजी नंबरों का आदान प्रदान हुआ। कुल मिलाकर उनका व्यवहार सौम्य, सरल और सहयोगात्मक रहा।

इसी बीच नज़र दीवार पर टंगे उस बड़े बोर्ड पर गयी, जहाँ पूर्व में पदस्थ रहे पुलिस कप्तानों के नाम लिखे थे। कई नामों के बीच एक परिचित नाम उभर आया अमिताभ ठाकुर। बसपा सरकार के समय से ही मैं उन्हें सोशल मीडिया के जरिए जानता हूँ कई दफा टेलीफोनिक वार्ता भी हुई है। वह दरम्याने नौकरी से ही वह सत्ता के कमियों पर बोलते लिखते रहे। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, कुर्सियाँ बदलीं… पर उनका सुर कभी नहीं बदला। सपा सरकार में भी उनके बयान असहज कर देते थे और बीजेपी सरकार में तो उनकी सीधी भाषा इतनी खटकने लगी कि उन्हें जबरन रिटायर तक कर दिया गया।

रिटायरमेंट के बाद भी वह रुके नहीं। भ्रष्टाचार, अपराध और पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे और झेलते रहे मुकदमे, जेल, प्रताड़ना उनके जीवन का हिस्सा बन गयें। हाल ही में कफ सिरप कांड पर भी वह लगातार नए तथ्य सामने ला रहे थे। तभी खबर आई कि बनारस में उन पर मुकदमा दर्ज हो गया। आज सूचना आई कि दिल्ली से शाहजहांपुर के बीच दस पंद्रह लोगों ने उन्हें उठा लिया। उनके सोशल मीडिया अकाउंट डिसेबल कर दिए गए। अब बताया जा रहा है कि देवरिया पुलिस उन्हें किसी पुराने मामले में उठाकर ले गई।

सोचिए… वही देवरिया पुलिस, जहां के पुलिसकर्मी कभी उनके सामने सलाम बजाती रहे होंगे। वही दरोगा, वही इंस्पेक्टर, वही सिपाही जो कप्तान साहब के सामने “यस सर, यस सर” कहते नहीं थकते होंगे। आज वही लोग उन्हें धकियाकर पकड़ते हैं। अमिताभ ठाकुर 1992 बैच के आईपीएस रहे हैं। आज सेवा में होते तो एडीजी होते। ऐसी परिस्थिति में दरोगा इंस्पेक्टर छोड़िये शायद कोई सीओ तक उनकी आँख में आँख डालकर बात न करता। मगर सेवा में नहीं हैं, तो हुक्मरानों के इशारे पर कोई भी उनकी गरदन दबोच सकता है।

मेरे एक इंस्पेक्टर मित्र, जो जीआरपी लखनऊ में पदस्थ थे, बताते हैं एक बार वे कहीं से लौटकर लखनऊ स्टेशन पर उतरे तो वे लपककर अमिताभ ठाकुर का बैग उठाने लगे। मगर उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया अपना बैग मैं खुद उठाऊँगा।अमिताभ ठाकुर को कई लोग नापसंद भी करते होंगे, कुछ कहते हैं अब वह जिद्दी या उदंड हो गए हैं। हो सकता है उम्र का असर हो, या कुछ और।

लेकिन सवाल यह है कि सरकार का किसी व्हिसलब्लोअर के साथ ऐसा व्यवहार क्या उचित है, यह तो तानाशाही है। और जहाँ तक पुलिस की बात है पुलिस हुक्मरानों की हुक्मबरदार संस्था है। यहाँ लेकिन किन्तु परन्तु या प्रश्न नहीं कर सकते। यहां मात्र यस सर, ओके सर, नोटेड सर होता है। पुलिस को सियासी मामलों में किसी आरोपी के साथ पेशेवर अपराधियों की तरह व्यवहार से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा व्यवहार उनके प्रति सकारात्मक सोच में बाधा उतपन्न करती है।

ढूंढ लीजिए पुलिस का कोई अपना नहीं होता। अधिकांश लोगों के मन में पुलिस के छोटे से बड़े अधिकारी तक के बारे में लोगों की धारणा नकारात्मक ही होती है, वजह कुछपुलिसकर्मियों की उदंडता औऱ प्राप्त शक्तियों का दुरुपयोग प्रमुख है।

कभी गौर करियेगा पुलिस वालों की आवाज और हितचिंतक मित्र पत्रकार ही होते हैं, जो हर विपरीत परिस्थिति में उनके साथ उनकी आवाज बनकर खड़े रहते हैं, भले पुलिस वाले मानें या न मानें। मैं अमिताभ ठाकुर के साथ सरकार के इस व्यवहार की कड़ी भर्त्सना करता हूँ।

यह खबर मैंने तब लिखा था जब अमिताभ ठाकुर को जबरिया रिटायर किया गया था ।


संस्मरण…..

मैं जब दसवीं की छात्रा थी तब श्री अमिताभ ठाकुर फिरोजाबाद जिले के एसपी बनकर आये थे। प्रदेश में तब सपा सरकार थी। हमारे यहां जंगल राज चल रहा था‌। माफिया, कुशासन, कुप्रबंधन, अपराध इत्यादि था। हमको लगता था कि हम बहुत दबे कुचले हुए है। चीजें कभी सही नहीं होगीं। अमिताभ ठाकुर ने फिरोजाबाद की दिशा ही बदल दी थी। हमारे जिले में मजनूं अभियान चलाया। किशोरी लड़कियों के लिए तो वह वरदान थे। हमारे यहां एनकाउंटर भी खूब हुए। उनकी छवि ईमानदार अफसर की थी। फिरोजाबाद में आज भी उनकी पूजा होती है। मैं समझ नही पा रही कि योगी सरकार में योगी के वोटर्स के राज में अमिताभ ठाकुर के ऊपर अत्याचार क्यों हो रहा है? भाजपा सरकार को सोचना चाहिए कि आप हमेशा न तो सत्ता में थे और न आप हमेशा रहेंगे। जिस दिन सपा सरकार में आयेगी तो आपके वोटर्स को धरकर कूटा जायेगा। और आपके वोटर्स आपके सत्ता विहिन होने पर भी अत्याचार से ग्रसित रहे हैं। इसलिए हमारी योगी आदित्यनाथ जी से करबद्ध निवेदन है कि वह अपने मतदाताओं का मनोबल न गिराये और अमिताभ ठाकुर को तत्काल रिहा करें।
आपकी एक मतदाता!

-एडवोकेट शिवानी

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