नवंबर 2023 में अपनी युवा बेटी को तीव्र लीवर फेलियर में खो देने वाला एक परिवार उसकी यादों को सहेजकर, संजोकर, एक कोमल प्रयास के रूप में उसे ज़िंदा रखे हुए है। वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव की पुस्तक ‘श्रीति: अ लाइट दैट स्टिल शाइन्स’ इसी स्मरण-यज्ञ का संवेदनशील प्रमाण है—बेटी को शब्दों और भावना में अमर करने वाला एक स्नेहिल ग्रंथ।
भूलना भी कभी-कभी याद करने का ही एक तरीका होता है। यह जानबूझकर किया गया प्रयास है—इच्छाशक्ति से उपजा हुआ, कभी-कभी मजबूरी भी। बीस वर्षों में धीरे-धीरे संचित हुई स्मृतियों का वह ढेर, जिसे मन हर बार समेटने की कोशिश करता है, मगर वे यादें ताश के पत्तों-सी ढह पड़ती हैं।
श्यामलाल और उनका परिवार यही सब जी रहा है—उस दिन से जब श्रीति ने इस दुनिया के सारे रंग, मोह, आकर्षण पीछे छोड़ किसी और दुनिया की ओर सफ़र चुन लिया, दो वर्ष पहले।
उसने पाँच दिनों तक एक योद्धा की तरह जीवन से लड़ाई लड़ी, मगर अंततः लीवर फेलियर की त्रासदी से हार गई। वह पीछे छोड़ गई—एक टूटे हुए परिवार को, दोस्तों को, परिचितों-अपरिचितों को, और उन अनगिनत लोगों को जो उसे उसके पिता की पोस्टों में बस जान पाए।
उसकी कहानी अधूरी ही छूट गई—जैसे जेनी डाउनहैम की किताब Before I Die की तरह। वही किताब, जो उसके पिता को उसकी मेज़ पर मिली। त्रासदी की यह अचानकता ऐसी लगती है मानो किसी अनजानी, विराट शक्ति ने नियति लिख दी हो—और सबको अवाक् कर दिया हो।
कौन इस तरह चला जाता है? सब कुछ अधूरा छोड़कर। अनकहा, अनसुना, अनजाना, अनदेखा। श्रीति चली गई।
प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘श्रीति: अ लाइट दैट स्टिल शाइन्स’ किसी भी व्यक्ति के लिए एक शुद्धिकारी अनुभव है—जिसने कभी भी किसी प्रिय को अचानक खोया हो। यह दर्द को कम नहीं करती, लेकिन resilience की एक हल्की-सी लौ ज़रूर जलाती है।
184 पृष्ठों की यह पुस्तक एक कोमल स्मारक है—हमें बताती है कि शोक चाहे कितना भी निजी क्यों न हो, उसकी अनुभूति हमें एक-दूसरे से जोड़ती है, और स्मरण ही हमारे भीतर की टूटन में बल देता है।
सबसे मार्मिक टिप्पणी चंद्र भूषण सिंह की है, जो पितृ-दु:ख को प्राचीन शास्त्रों के संदर्भ के साथ व्यक्त करते हैं— “कन्या पितुः प्रियम् हृदयम्”— बेटी पिता के हृदय का सबसे प्यारा अंश होती है।
वे आगे लिखते हैं कि ग्रंथों में कहा गया है—जब पिता-बेटी एक साथ खाना खाते हैं, पिता अकाल मृत्यु से बच जाते हैं। बेटी मानो पिता को अमरता दे देती है। लेकिन कोई भी श्लोक बेटी को बचाने की बात नहीं करता—
शायद ऋषियों ने ऐसे शोक की कल्पना भी नहीं की थी।
अपने हिस्से की चिकित्सा-समझ जोड़ते हुए प्रो. अनूप सराया—जो उस समय एम्स में विभागाध्यक्ष थे और आज ILBS में हैं—श्रीति की बीमारी को समझने और उसके लक्षणों को समय पर पहचानने के महत्व पर प्रकाश डालते हैं, ताकि जागरूकता से ऐसी जिंदगियाँ बचाई जा सकें।
यह पुस्तक एक ऐसी लड़की का जश्न है—जिसे हममें से कई कभी नहीं मिले, लेकिन जो अपने पिता के प्रेमपूर्ण शब्दों और पोस्टों के ज़रिए हमारे जीवन में प्रवेश कर गई।
अक्सर मन पूछता है—अगर वह रहती, तो क्या होती?
वह उत्कृष्ट होती। वह उड़ान भरती। वह उजास का प्रतीक होती।
वह जीवंत थी, दयालु थी, संवेदनशील और ऊर्जा से भरी—जैसा उसके शिक्षकों, पड़ोसियों और परिचितों ने याद किया है।
जैसे यह दर्दभरा शेर—
फ़ूल तो दो दिन बहार-ए-जाँफ़ज़ा दिखला गए,
हसरत उन ग़ुँचों पे है जो बिन खिले मुरझा गए।
इस पुस्तक के माध्यम से श्रीति एक ऐसी रोशनी बन जाती है, जो बुझकर भी चमकती है—हमें यह सिखाते हुए कि हानि में भी आशा की लौ ढूँढी जा सकती है। यादें ही उसे हमारे साथ रखती हैं, और यही स्मरण सबको एक साझा यात्रा में जोड़ता है—जहाँ दुःख, प्रेम और आशा एक-दूसरे में घुल-मिल कर सहारा बन जाते हैं।
आउटलुक की वेबसाइट पर पत्रकार शिल्पी ए सिंह द्वारा किए बुक रिव्यू पर आधारित
राकेश सिंह-
बड़े भाई और चर्चित पत्रकार आदरणीय श्यामलाल यादव जी की पुत्री श्रीति यादव की स्मृति में लिखी गई पुस्तक ‘श्रीति : अंतस का उजास‘ का लोकार्पण हुआ, यह कार्यक्रम अत्यंत भावुक और अमिट स्मृतियों को समर्पित रहाl

कार्यक्रम में पूर्व केन्द्रीय मंत्री डा. हर्षवर्धन बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे, अध्यक्षता आदरणीय रामबहादुर राय जी ने किया, विशिष्ट अतिथि के रूप में डा. अनूप सराया (प्रोफेसर, इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज, नई दिल्ली) एवं वरिष्ठ पत्रकार सुश्री रितु सरीन जी की उपस्थिति रही l कल्याण सिंह सरकार मे मंत्री रहे बालेश्वर त्यागी जी, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक आदरणीय राजकमल झा जी, वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी जी, जगदीश उपासाने जी, जयशंकर गुप्त जी और मनोज मिश्र जी भी उपस्थित रहे.
श्यामलाल यादव-

पुत्री Shreeti Yadav की याद में लिखी पुस्तक “Shreeti: A Light That Still Shines” और “श्रीति: अंतस का उजास” का सोमवार को विमोचन हुआ. प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन जी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष आदरणीय श्री राम बहादुर राय जी (पद्म भूषण), आइएलबीएस के प्रो. अनूप सराया जी, इंडियन एक्सप्रेस की कार्यकारी संपादक ऋतु सरीन जी, प्रकाशक श्री पीयूष कुमार जी ने अनेक वरिष्ठ राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, अधिवक्ताओं, अधिकारियों और शिक्षाविदों आदि की उपस्थिति में किया. कार्यक्रम में श्रीति के कई प्रिय दोस्त भी शामिल हुए.
पुस्तक के दोनों संस्करण आमेजन आदि पर उपलब्ध हैं.


