संजय कुमार सिंह
आज द टेलीग्राफ की लीड पर आता हूं। खबर यह है कि भारत की सेंट्रल ड्रग रेगुलेटरी (केंद्रीय औषधि नियामक) एजेंसी ने न तो यह बताया है कि उसने कथित नकली एंटी-रेबीज वैक्सीन की जांच की है, और न ही उसने गुणवत्ता से संबद्ध 694 अन्य एनफोर्समेंट एक्शन में शामिल कंपनियों या उनके उत्पादों नाम बताए हैं। जाहिर है कि जांच हुई है तो उसका कारण बताया जाना चाहिए और नतीजा बताना तो जरूरी ही है। आज जब अखबारों के पास लीड लायक कोई खास खबर नहीं है तब अकेले द टेलीग्राफ में इसका छपना संयोग तो हो ही सकता है पत्रकारिता में यह नियम रहा है कि ऐसी खबरें उस दिन छापी जाती हैं जिस दिन कोई खास खबर नहीं हो। इससे इसे लीड बनाया जा सका और संभव है कि लीड नहीं बनती तो कम लोगों का ध्यान जाता। इस तरह जो खबर नहीं छप रही थी या छिपाई जा रही थी उससे खास प्रचार मिल जाता है। टेलीग्राफ ने ऐसा किया हो या नहीं दूसरे अखबार नहीं कर रहे हैं इसे रेखांकित किया जाना जरूरी है। ऐसा नहीं है यह मामला बहुत गुप्त है। सच्चाई यह है कि मीडिया ने कोशिश की होती तो कौशल विकास योजना का घपला भी पहले ही खुल गया होता। हालांकि, वह तो सिर्फ पैसे का मामला था यह दवाई का मामला है इसलिए लोगों की जान से भी जुड़ा है। एंटी रैबीज टीके से संबंधित खबर पर पीआईबी ने एक फटीचर फैक्ट चेक भी किया था जो मुझे अभी नहीं मिला। इसमें कहा गया था कि सरकारी कंपनी पर नकली दवा बनाने का आरोप है और उसने खुद स्वीकार किया है कि एक बैच में गड़बड़ी थी। इसलिए इस खबर में कुछ नहीं है लेकिन अब पता चला रहा है कि मामला जानकारी होने के बावजूद चुप रहने का है और यह काम सरकारी नियामक ने भी किया या उससे करवाया गया।
नई दिल्ली डेटलाइन से जीएस मुदुर ने लिखा है, डॉक्टर्स और उद्योग के जानकारों का कहना है कि सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएसओ) द्वारा जानकारी न देने से रेगुलेटरी पारदर्शिता की कमी का एक बड़ा पैटर्न दिखता है, जो कथित नकली वैक्सीन से लेकर कफ सिरप और क्वालिटी चेक में फेल होने वाली दवा बनाने वाली कंपनियों तक फैला हुआ है। इन लोगों ने 13 जनवरी, 2025 को वैक्सीन बनाने वाली कंपनी इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (आईआईएल) से सीडीएससीओ को नकली बैच के बारे में चेतावनी मिलने और तथा मार्च को दिल्ली ड्रग्स डिपार्टमेंट के पब्लिक नोटिस के बीच 74 दिनों तक कोई पब्लिक अलर्ट जारी न होने पर भी सवाल उठाए हैं। रेबीज एक वायरल इन्फेक्शन है जो सेंट्रल नर्वस सिस्टम, खासकर दिमाग पर हमला करता है। अगर इसे रोका न जाए तो यह लगभग हमेशा जानलेवा होता है। इस वैक्सीन का इस्तेमाल वायरस के संपर्क में आने के बाद इन्फेक्शन को रोकने के लिए किया जाता है, न कि लक्षण दिखने के बाद बीमारी का इलाज करने के लिए। ड्रग रेगुलेटरी मामलों से परिचित एक इंडस्ट्री के अधिकारी ने द टेलीग्राफ को बताया, “रेबीज वैक्सीन जैसी इतनी ज़रूरी चीज़ पर चुप्पी चौंकाने वाली है। वायरस के संपर्क में आए लोगों के पास वैक्सीन से खुद को बचाने के लिए बहुत कम समय होता है। नैतिकता के हिसाब से जल्द से जल्द पब्लिक अलर्ट जारी करना चाहिए था।” इस अखबार ने सीडीएससीओ और आईआईएल को 74 दिनों के गैप के बारे में भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं मिला है। लेकिन एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सीडीएससीओ ने सभी राज्य ड्रग रेगुलेटर्स को फॉलो-अप कार्रवाई के लिए पत्र भेजे थे। दिल्ली ड्रग्स डिपार्टमेंट के पब्लिक नोटिस में सीडीएससीओ के पत्र का हवाला दिया गया था। डॉक्टर्स का कहना है कि देश भर में हजारों कुत्ते के काटने के शिकार लोगों को उन दो महीनों के दौरान एंटी-रेबीज शॉट लगे होंगे। उस समय रेगुलेटर्स को नकली बैच के बारे में पता था लेकिन जनता को नहीं। भारत में सालाना अनुमानित 2.3 मिलियन लोगों को एंटी-रेबीज शॉट लगते हैं और प्रभावित वैक्सीन की बाजार में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी है, इसलिए हर दिन 2,500 से ज़्यादा लोगों को उस वैक्सीन की खुराक मिलती है। पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञों का कहना है कि सीडीएससीओ की चुप्पी रेगुलेटरी ज़िम्मेदारी की बुनियादी विफलता को दिखाती है।
सरकारी कंपनी, इंडियन इम्युनोलॉजिकल्स लिमिटेड ने स्वीकार नहीं किया कि पूरी वैक्सीन “नकली थी।” उसने कहा है कि एक बैच में पैकिंग/चेन संदिग्ध था और उन्होंने उसे बाजार से हटाया। ऑस्ट्रेलिया सरकार की एडवाइजरी को पीआईबी फैक्टचेक ने भ्रम फैलाने वाला/असत्य बता दिया। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों ने यह चेतावनी दी है कि भारत में अभयरैब (Abhayrab®) नामर रैबीज वैक्सीन के कुछ संदिग्ध/नकली बैच पाए गए हैं। यात्रियों और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं से सतर्क रहने के लिए कहा गया है। ऑस्ट्रेलिया सरकार के अनुसार, 2023 से भारत में नकली रेबीज वैक्सीन बिक रही है। नवंबर 2023 से वहां वैक्सीन लगवाने वाले यात्री सुरक्षित नहीं हो सकते हैं और उन्हें इनवैलिड डोज़ को ऑस्ट्रेलियाई-रजिस्टर्ड वैक्सीन से बदल देना चाहिए। हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स को एटीएजीआई गाइडेंस का पालन करना चाहिए। इससे लगता है कि सरकारी कंपनी ने नकली दवा बनाई, बेची और सरकारी होने का लाभ भी उठाया। पकड़े जाने पर दवाइयां वापस भी लीं लेकिन कार्रवाई पूरी नहीं की या इसी से बदनामी हुई। यह एक मामला है दूसरा नियामक एजेंसी का जिसकी चर्चा द टेलीग्राफ ने आज की है। टेलीग्राफ में 27 दिसंबर को भी संबंधित खबर छपी थी। इसके अनुसार, आईआईएल ने एटीएजीआई को पत्र लिखकर मार्च 2024 में बने वैक्सीन के एक बैच के बारे में “ज़रूरत से ज़्यादा सावधानी वाली और गलत जानकारी” का ज़ोरदार खंडन किया है, और कहा है कि उसने जनवरी 2025 में एक खास बैच की पैकिंग में गड़बड़ी का खुद ही पता लगाया था। भारतीय नियामकों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सूचित किया, औपचारिक शिकायत दर्ज की और तेज़ी से कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया।
अगर वाकई ऐसा है और मामला इतना ही है तो भी यह स्पष्ट है कि सरकार, सरकारी कंपनी और विनियामक एजेंसियां यह सुनिश्चित नहीं कर पाईं कि इसे लेकर डर न फैले और दुनिया भर में भारत की बदनामी नहीं हो। वह भी तब जब कफ सिरप के मामले में पहले सब कुछ हो चुका है। ऐसी हालत में सरकार और सरकारी कार्रवाई का उदाहरण इंडियन एक्सप्रेस की खबर से मिलता है। नई दिल्ली डेटलाइन से अनोना दत्त की खबर के अनुसार सरकार ने 100 एमजी से ऊपर की एक दवा निमेसुलाइड (Nimesulide) को प्रतिबंधित कर दिया है और डॉक्टर की पर्ची के बिना कफ सिरप की बिक्री रुक सकती है। इससे नशे के लिए कफ सिरप का उपयोग भले कम हो जाए हो चुकी मौतों के लिए क्या गया है, पता नहीं है जबकि जो दवा प्रतिबंधित की गई है उससे किसी शिकायत की खबर नहीं है। जो दवा प्रतिबंधित की गई है वह यह दर्द और बुखार की सामान्य दवा है। (समाप्त)
इससे पहले की किस्त : द टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस की खबरें बताती हैं कि दवाइयों के क्षेत्र में भारी गड़बड़ है। लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/telegraph-aur-indian-express-kee-khabaren-batati-hain/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


