इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर बताती है कि इंदौर में जो हुआ उसका कारण मीडिया का पालतू बन जाना भी है। संवैधानिक संस्थाओं को टॉमी छू करने वाली सरकार अखबारों की खबरों से भी नहीं चेतती लेकिन खबर छपी ही नहीं तो उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। दूसरी ओर, खबरों से साफ है कि डबल इंजन वाले राज्यों में हादसों की स्थिति में भी सरकार और प्रशासन का बचाव किया जाता है। गंभीरता कम दिखाने और मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश नहीं छोड़ी जाती है। यह चुनाव जीतने के लिए की जाने वाली ‘सभी’ कोशिशों से कम नहीं होता है। हादसों में मरने वालों की संख्या छिपाना या कम बताना भी सत्तारूढ़ दल की राजनीति का भाग है। डबल इंजन का मतलब सैंया भये कोतवाल नहीं होना चाहिए।
संजय कुमार सिंह
देश के सबसे स्वच्छ प्रचारित शहर में दूषित पानी से मौत और खबर की गंभीरता को कम करने की तमाम स्पष्ट कोशिशों के बीच अमर उजाला और द हिन्दू में आज भी यह मुद्दा पहले पन्ने पर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने कल के विशेष खुलासे की ही तरह, आज फिर बताया है, यह सिलसिला 28 दिसंबर को भागीरथपुरा के अर्बन प्राइमरी हेल्थ सेंटर में छह मरीज़ों के भर्ती होने के साथ शुरू हुआ। 48 घंटे के अंदर, यह सिलसिला बाढ़ में बदल गया, जब आउटपेशेंट क्लीनिक में एक ही दिन में मरीज़ों की संख्या 129 से बढ़कर 300 से ज़्यादा हो गई। एक हफ़्ते के अंदर, जल्दबाज़ी में बनाई गई हेल्थ वर्कर्स की एक टीम ने लगभग 13,000 घरों में 66,107 लोगों की स्क्रीनिंग की। ये नज़ारे इंदौर के एक घनी आबादी वाले इलाके में देखने को मिल रहे थे, जो अपनी सफ़ाई और मैनेजमेंट के लिए भारतीय शहरों की रैंकिंग में बार-बार टॉप पर रहा है। लेकिन द हिन्दू ने पहले पन्ने पर बताया है कि खबर अंदर है और कांग्रेस ने इंदौर में मरने वालों की संख्या पर सरकार से सवाल किया है। पेज 9 पर छपी इस खबर का शीर्षक है, कांग्रेस ने इंदौर में 15 मौतों का आरोप लगाया जबकि आधिकारिक आंकड़ा पांच है। खबर के अनुसार कलेक्टर ने कहा है कि वरिष्ठ चिकित्सकों का एक दल पीने के दूषित पानी से हुई मौतों से संबद्ध मीडिया रपटों का (हाल में हुई मौत के कारणों का नहीं), विश्लेषण कर आधिकारिक आंकड़ों को अद्यतन करेगा। खबर के अनुसार नगर निगम के दो अधिकारियों को निलंबित किया गया है जबकि कांग्रेस ने इस मामले में जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की मांग की है।
अमर उजाला में खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो कारण विज्ञापन नहीं है। मेरा मानना है कि पहला पन्ना बहुत अश्लील न हो, खबरों का पन्ना ही लगे और एक ही खबर हो तो भी पहले पन्ने पर खबर छापने और छपने का अलग महत्व है। विज्ञापन के कारण या विज्ञापनों के लिए हिन्दी के कुछ अखबार पहले पन्ने जैसे दो (कई ज्यादा भी) पन्ने बनाते हैं। आज मैंने देख लिया अमर उजाला के दोनों पहले पन्नों पर इंदौर की खबर नहीं है और दोनों पन्नों को मिलाकर एक पहले पन्ने से ज्यादा जगह है। अमर उजाला की पहली लीड मौसम की खबर है। इसमें बताया गया है कि दिल्ली में 66 उड़ानें रद्द हुईं और हवा की गुणवत्ता में सुधार से दिल्ली-एनसीआर से ग्रेप-3 हटा। दूसरी लीड का शीर्षक है, ग्रोक को एआई जनित अश्लील सामग्री तत्काल हटाने के निर्देश। उपशीर्षक है, सरकार सख्त : एक्स को नोटिस यूजर्स पर भी कार्रवाई के निर्देश, 72 घंटे में मांगी रिपोर्ट। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, महिलाओं के खिलाफ ग्रोक का उपयोग : सरकार ने तीन दिन में एक्स का जवाब मांगा। द हिन्दू का शीर्षक है, केंद्र ने एक्स को निर्देश दिया कि तस्वीरों की मॉर्फिंग में ग्रोक के दुरुपयोग को रोके। मुझे लगता है कि अंग्रेजी के दो शीर्षक विज्ञप्ति यानी प्रचार को खबर बनाने की कोशिश है जबकि अमर उजाला ने विज्ञप्ति को जस का तस छाप दिया है और विज्ञप्ति का मकसद तो सरकार का प्रचार ही होगा। द हिन्दू की लीड ईरान-अमेरिका की अंतरारष्ट्रीय खबर है।
नवोदय टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, दूषित पानी का कहर जारी। इंदौर में मरने वाले 19 हुए। उपशीर्षक है, स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि चार लोग मरे, मेयर बोले 10 की जानकारी है। देशबन्धु में यह खबर लीड है। इसमें कहा गया है, अब तक 14 से ज्यादा मौतों का दावा। स्टेटस रिपोर्ट में केवल चार मौतों का उल्लेख। शीर्षक है, दूषित पानी मामले में हाईकोर्ट की फटकार। हाईकोर्ट ने दो अधिकारियों को भेजा नोटिस, 6 को अगली सुनवाई। देशबन्धु ने सरकार से उमा भारती के सवाल को भी पहले पन्ने पर छापा है और शीर्षक है, सरकार को घोर प्रायश्चित करना होगा। आप इसका मतलब जो लगाइये, देखिए कि आपके अखबार में इंदौर पर क्या खबर है और किस पन्ने पर कितनी बड़ी है। अखबार अगर सरकार की कमजोरी नहीं बता रहे है तो खरीदकर पढ़ने और बच्चों को पढ़ने देने का कोई मतलब नहीं है।
अंग्रेजी अखबारों में दि इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और दि एशियन एज में इंदौर की खबर लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने पर चार कॉलम में है जबकि द टेलीग्राफ में यह टॉप पर तीन कॉलम में है। इसका शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने पानी से मौत के लिए गुस्से का सामना किया। अखबार में संक्रमित पानी भरे कांच के एक ग्लास की फोटो भी छपी है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, महीनों की उपेक्षा के बाद इंदौर के घातक जल संकट के लिए प्रमुख अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। यहां यह गौर तलब है कि जब लोग मर रहे थे, सरकार मौतें छिपाने और कम बताने की कोशिश कर रही थी तब खबर नहीं छपी, पहले पन्ने पर नहीं थी या इतनी प्रमुखता नहीं मिली। कल तक हादसे और मौत की खबर नहीं छापने वाले आज बता रहे हैं कि सरकार ने कार्रवाई की यानी अपना काम किया जबकि ऐसे हादसे न हों, इसे सुनिश्चित करना भी सरकार का काम है और मीडिया का काम है कि किसी गड़बड़ी की आशंका हो तो उसकी रिपोर्ट करे। सरकार के साथ-साथ नागरिकों को भी सतर्क करे। इंडियन एक्सप्रेस ने कल खबर दी थी कि पानी की शिकायत दो महीने से थी किसी ने कार्रवाई नहीं की। कारण जो रहा हो, अखबारों का काम था कि शिकायत को तो महत्व देते, नगर निगम अधिकारियों ने सुनवाई नहीं की उसकी खबर देते तो सरकार के नाराज होने का कोई मतलब नहीं था। और अगर सरकारें ऐसे नाराज होंगी या नाराज होने का इतना डर रहेगा तो मंदिर ही बनेंगे नागरिकों की जान जाती रहेगी और यही हो रहा है। हालांकि, मध्य प्रदेश में मंदिर मामले में सुरक्षा का ख्याल नहीं रखने से तो मौत हो ही चुकी है इसबार मंदिर के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं होने का भी मामला था और उसपर भी ध्यान नहीं दिया गया। संभव है यह ईश्वर के नाराज होने का मामला हो। अगर ऐसा होगा तो भाजपा ख्याल रख सकती है, सक्षम है। पर खबर के मामले में समझौता नहीं किया जाता तो आम आदमी की जानें नहीं जातीं बच्चे नहीं मरते जो पूरी तरह निर्दोष थे।
दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, इंदौर की मौतों पर सियासी जंग छिड़ी तो कार्रवाई शुरू। फ्लैग शीर्षक के कुछ बुलेट प्वाइंट इस तरह हैं 1) मुख्यमंत्री ने स्थिति की समीक्षा की 2) कांग्रेस ने भाजपा को आड़े हाथों लिया 3) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने रिपोर्ट मांगी और 4) आधिकारिक जांच के अनुसार पानी दूषित होने का स्रोत पुलिस चौकी थी। कहने की जरूरत नहीं है कि ये सारी सूचनाएं मामले को सामान्य बनाने और बताने वाली हैं जो बता रही हैं कि हादसा जो भी था उसपर कार्रवाई हो रही है, एनएचआरसी ने भी संज्ञान लिया है आदि आदि। इंडियन एक्सप्रेस ने कल पहले पन्ने की खबर से बताया था कि दो महीने से ज्यादा से शिकायत थी और शिकायतें सुनी नहीं गईं या उनपर कार्रवाई नहीं हुई। कारण चाहे जो हो। आज भी इंडियन एक्सप्रेस की खबर ऐसी ही है। यह सरकारी कार्रवाई का प्रचार नहीं करती है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, पानी से मौत के मामले में इंदौर के म्युनिसिपल कमिश्नर हटाए गए। इंट्रो है, मरने वालों की संख्या बढ़कर 10 हुई तो अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई। यहां गौर तलब है कि सरकार मरने वालों की संख्या कम बता रही है। यह भी आधिकारिक आंकड़ा नहीं है और आज ही (अभी तक) 14 लोगों की मौत की खबर है। ऐसे में टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर से उसके पाठक 10 मौतों की संख्या को अधिकृत मान लेंगे और संदेश यह जाएगा कि कार्रवाई हो गई। जबकि मामला ऐसा नहीं है और इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक यही है। यह पूरे मामले को समग्रता में भी बताने वाला शीर्षक है। खबर के एक पहलू को शीर्षक में कहकर अंदर पूरी खबर हो भी तो बात नहीं बनती है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, इंदौर की मौतों के पीछे नागरिक व्यवस्था का खत्म हो जाना है। स्वास्थ्य प्रणाली मरीजों की बड़ी संख्या से संघर्ष कर रही है।
आज की खबरों से यह संकेत तो मिलता ही है कि मरने वालों की संख्या कम करके बताई जा रही है और इसे छिपाने की कोशिश चल रही है। ऐसे में बीमार लोगों की संख्या भी बताई जानी चाहिए। इससे भी पाठकों को पता चल जाएगा कि इंदौर में स्थिति क्या है। अगर वह सामान्य है तो संख्या सामान्य होगी। वैसे भी, ऐसे मामलों में बीमार लोगों की संख्या भी बताई जानी चाहिए। ये भी तो व्यवस्था के शिकार हैं। बताया जाना चाहिए कि इनके इलाज की सरकारी व्यवस्था क्या है, ये लोग अपने पास से पैसे दे रहे हैं या नहीं आदि आदि। यह सब आज की खबरों में नहीं के बराबर हाईलाइट किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक ही बताता है कि खबर में कुछ और सूचनाएं हो सकती हैं। यह मेरा पूर्वग्रह भी हो तो आज का शीर्षक दूसरे अखबारों के मुकाबले ऐसा ही है आप एक बार पढ़कर मान लेंगे। खबर का इंट्रो है – 66,000 से ज्यादा लोगों की जांच (स्क्रीनिंग) की गई। इसमें कहा गया है, बहुत सारे लोगों को पहले छोटे क्लिनिक में ले जाया गया जो बमुश्किल इस संकट से निपटने के लिए आवश्यक संसाधनों या उपकरणों से युक्त हैं। इससे लगता है कि इंदौर को चिकित्सा सहायता की जरूरत हो सकती है। मौजूदा व्यवस्था में इसकी मांग करना, जरूरत बताना भी सिस्टम की नाराजगी मोल लेना है। जो व्यवस्था बनी है उसमें कोई बताएगा नहीं, व्यवस्था होगी नहीं तो मामला और बढ़ेगा तथा मीडिया को नियंत्रण में रखने और सूचना तंत्र पर अंकुश का मतलब समझ आएगा। ईश्वर अगर है तो सुनिश्चित करे कि समय पर व्यवस्था हो जाए ना लोग मरें ना पर्ची और प्रचार से मुखिया बने लोगों का सच उजागर हो।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


