
लाल घेरे वाली खबर किसी अखबार में वैसे ही छपती जैसे कल भास्कर में छपी थी तो इसका प्रभाव निश्चित रूप से कुछ और होता। लेकिन अब पत्रकारिता बदल गई है। कहने की जरूरत नहीं है कि इन दो खबरों में जो पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी वह अंदर है और अंदर वाली बाहर। हालांकि वह भी यहीं है बाकी अखबारों का हाल और बुरा है। पढ़ते रहिए। सरकार अगर काम नहीं करे तो लोकतंत्र में मीडिया की बड़ी भूमिका है।

संजय कुमार सिंह
इंदौर में जो लोग मरने वालों की सही संख्या नहीं बता रहे हैं उन्हीं पर जनगणना की जिम्मेदारी है और इससे भागते रहे हैं। लेकिन मतदाता सूची ठीक करना जरूरी है। उसे मिल रही प्राथमिकता देखिए और इसकी रिपोर्टिंग ढूंढ़िए। सवाल के जवाब में घंटा तो मुख्य चुनाव आयुक्त ने कई बार कई तरह से कहा है लेकिन खबर बनी कैलाश विजयवर्गीय की। यही मुद्दा है और यही लोग मतदाताओं की वंशावली जांच रहे हैं, मैप भी कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट को गलत नहीं लगा और जो गलत हो सकता था उसपर सुनवाई ही नहीं हो रही है। एसआईआऱ जारी है। इस आरोप के बावजूद कि चुनाव आयोग करवा ही नहीं सकता है। उसे अधिकार ही नहीं है। संबंधित रिपोर्ट गोदी मीडिया से लगभग नदारद है। आज इंदौर (की खबरें) भले पहले पन्ने पर नहीं है, बांग्लादेश में हिन्दू की मौत है। वह भी तीन दिन पहले के हमले के बाद। द हिन्दू ने पहले पन्ने पर छापने के लिए शीर्षक बनाया है, बांग्लादेश में हमले के तीन दिन बाद हिन्दू (व्यक्ति) की मौत। अमर उजाला में यह खबर चार कॉलम में है। उपशीर्षक है, नए साल की शाम जिन्दा जलाने की हुई थी कोशिश, परिवार ने की निष्पक्ष जांच की मांग। दि एशियन एज में दो कॉलम में है। इंदौर से संबंधित हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की खबर बताती है कि पानी में क्या कुछ मिला हुआ था। दूसरे शब्दों में सीवर में मिले मल का वैज्ञानिक नाम। इससे यह सूचना तो मिल गई कि सरकार जांच करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है और मौत का कारण ठीक से समझना जरूरी है। भले गिनती की चिन्ता या गिनने की योग्यता न हो। दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर इंदौर की जो खबरें छप रही हैं (या नहीं छप रही हैं) उनसे पता चल रहा है कि देश की पत्रकारिता वाकई घंटा हो गई है। कोई भी बजा दे, चाहे तो कभी न बजाये।
नवोदय टाइम्स में आज पहले पन्ने पर छपी खबर का शीर्षक है, “इंदौर : कांग्रेसी भाजपाई हुए गुत्थम-गुत्था, फेंकी चप्पलें”। मुझे लगता है कि वर्षों के अमृतकाल और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रशासक की डबल इंजन की सरकार होने के बाद देश के सबसे स्वच्छ प्रचारित शहर के लोग अगर सीवर मिला पानी पीकर मर जाएं तो बड़ी खबर है। इसमें लोगों का गुत्थम-गुत्था होना भले बड़ा मामला हो, 2456 लोगों के बीमार होने की भी खबर थी। उनका क्या हाल है, कौन बताएगा? पाठक जानना चाहेगा और खुश होगा कि छह ही मरे, 2450 ठीक होकर घर लौट गए। पर यह खबर नहीं है। खबर 250 से कम लोगों का इलाज जारी होने की है। 2000 के ठीक होकर घर लौटने की भी तो होनी चाहिए। ढूंढ़ने पर मुझे 36 लोगों के घर लौटने की खबर मिली। एक खबर ये भी हो सकती थी कि इनके इलाज पर कितना खर्च आया। मुफ्त हुआ या जेब से लगे या बीमा था। मामला सिर्फ पानी और मरने का नहीं, जिन्दा रहने का भी तो है? क्या हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार सबको साफ पानी मिलने लगा या कल जैसा शीर्षक था, हाईकोर्ट की सख्ती से कोई फायदा हुआ? देशबन्धु की खबर के अनुसार, मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने आरोप लगया है कि सीएजी की रिपोर्ट में इंदौर में गंदे पानी की आपूर्ति का खुलासा 2019 में ही हुआ था। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है, केंद्र सरकार के 2024 के सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी के असुरक्षित होने की सूचना थी। राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2016-17 में ही कहा था कि इंदौर के भगीरथपुरा समेत 58 अन्य जगहों पर पीने के पानी में सीवर का संक्रमण है। जाहिर है, किसी तरह चुनाव जीतने में लगी सरकार के लिए यह सब मुद्दा ही नहीं था। मीडिया ने भी दबाव नहीं बनाया।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज ही लिखा है, कम से कम 10 लोग मरे हैं सरकारी आंकड़ा छह का है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, 25 दिसंबर से अब तक कम से कम 210 लोग अस्पताल में दाखिल कराए गए हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, कम से कम 32 मरीजों का इलाज आईसीयू में चल रहा है। नवोदय टाइम्स ने जिलाधिकारी के हवाले से लिखा है, शहर के 41 अस्पतालों में कुल 203 मरीजों का इलाज जारी है और छह लोगों की मौत हो चुकी है। जिलाधिकारी से मिली इस खबर के अनुसार, 34 लोग आईसीयू में हैं। जाहिर है, कुछ सौ लोगों की गिनती ढंग से नहीं की जा रही है और बताई तो नहीं ही जा रही है। नवोदय टाइम्स ने कल लिखा था कि 19 लोगों की मौत हो गई आज नहीं बताया कि कल उसने किस आधार पर लिखा था और कल अखबार गलत था या आज जिलाधिकारी गलत हैं। कल कांग्रेस का कहा छपा था कि 15 लोगों की मौत हुई है। जाहिर है कि जिला प्रशासन संख्या सही से बता नहीं रहा है और जो बता रहा है उसपर खबर देने वालों को ही यकीन नहीं है। वास्तविकता यह है कि 100 के अंदर की गिनती का यह हाल है। पूरी पत्रकारिता को ‘घंटा’ साबित करने की कोशिश के बावजूद अखबारों ने यह पता करने और बताने की जहमत नहीं उठाई कि कितने लोग बीमार हुए, अस्पताल जाना पड़ा, दवाई खानी पड़ी, पैसे खर्चने पड़े, कितनों के पास इलाज के पैसे थे, कितनों के पास नहीं, जिनके पास नहीं थे उनने क्या किया, कैसे किया आदि। इंदौर की खबर कल ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर थी। इनके जरिए पाठकों को बताया गया कि कार्रवाई शुरू हो गई है, हाईकोर्ट सख्त है और फलां आदेश दिए गए हैं। लेकिन मुद्दा यह है कि जो प्रशासन पानी तक की व्यवस्था नहीं कर सकता है, मरने वालों की सही संख्या नहीं बता रहा है वह हाईकोर्ट के कहने पर या सख्ती पर पानी कैसे देगा या दिया अथवा नहीं उसे भी देख लिया जाता। कोई तो रिपोर्ट करता।
आज जब अखबारों का पहला पन्ना वेनेजुएला और मुस्तफिजुर रहमान की खबरों से भरा है तब इंदौर की खबरें पहले पन्ने पर न होना हेडलाइन मैनेजमेंट से ज्यादा खबरों की समझ और परिभाषा बदल जाने के साथ उसकी जरूरत नहीं मानना भी है। रिवाज तो यह रहा है कि जब कोई खबर आती है तो उससे संबंधित खबरों की बाढ़ आ जाती रही है। आज इंदौर और देश भर में पानी से संबंधित खबरें होनी चाहिए थी। यही बताया जाना चाहिए था कि प्रभावित क्षेत्र में बाहरी लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है और इसके लिए भाजपा कार्यकर्ता लगा दिए गए हैं। नवोदय टाइम्स की खबर यही है लेकिन जो शीर्षक है उससे शायद नोटिस ही नहीं लिया जाए और यह खबर की धार कुंद करना कहलाता है। अब बिल्कुल आम है। धार वाली खबरें होती नहीं हैं और जो होती हैं उन्हें पहले ही कुंद कर दिया जाता है। बहुत सारे अखबारों में आज इंदौर की कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है, लेकिन बांग्लादेश में हिन्दू की मौत की खबर है। भारत सरकार को बांग्लादेश के घुसपैठियों से परेशानी है लेकिन वहां के हिन्दुओं से सहानुभूति है। इसे तो समझा जा सकता है लेकिन शेख हसीना की इतनी लंबी मेहमानवाजी के बाद खालिदा जिया के निधन पर बेटे को चिट्ठी भेजने और वह भी विदेश मंत्री के हाथ समझना मुश्किल है। दिलचस्प यह है कि इसे छिपाया भी नहीं जाता है। दूसरी ओर, कोलकाता नाइट राइडर्स ने मस्तफिजुर को टीम में रख लिया तो बीसीसीआई को भी दिक्कत हो गई। जाहिर है कि यह नियम में नहीं होता तो रखा ही नहीं जाता पर रखा गया, उसका विरोध हुआ और फिर निर्देश हुआ तो समझना मुश्किल नहीं है कि हो क्या रहा है। यह सवाल नहीं है कि मस्तफिजुर की जगह कोई हिन्दू होता तो क्या होता और होने का क्या है जब हसीना और खालिदा पर सवाल नहीं है तो उसपर क्यों होता। घुसपैठियों पर सवाल क्यों और किसलिए है कौन नहीं जानता। पर अखबारों में वह भी मुद्दा नहीं है और पानी पर कल दैनिक भास्कर ने जैसी खबर की वैसे अब नहीं होती है। दैनिक भास्कर में कल छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के 60 करोड़ लोग दूषित जल के कारण संकट में हैं। ऐसी कोई और खबर कहीं और दिखी?
इंदौर का पानी संकट सामने आया (मौतों के बाद खबर दबाना मुश्किल था) तो डेक्कन हेरल्ड ने वोट चोरी पर सर्वेक्षण की रिपोर्ट छापी और प्रचारकों का पूरा गिरोह उसी की सूचना देने में लग गया जैसे इंदौर में कुछ हुआ ही नहीं हो। सर्वेक्षण की बात करूं तो ईवीएम पर लोगों का विश्वास बढ़ा – बताने वाला यह सर्वेक्षण अगस्त 2025 का है। इसमें हर विधानसभा क्षेत्र से औसतन 50 व्यक्ति और 101 विधानसभा क्षेत्र में 5100 लोग शामिल हुए थे। इसके आधार पर प्रचार किया जा रहा है कि वोट चोरी का राहुल गांधी का आरोप लोगों को प्रभावित नहीं कर पाया है। सत्यमेव जयते में यकीन करने वाले को सर्वेक्षण का यह सत्य बताने की क्या जरूरत और किसे होगी समझना मुश्किल नहीं है। देखना है कि ऐसे समय में टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज जिस सर्वेक्षण रिपोर्ट की खबर दी है उसपर संघी इकोसिस्टम क्या करता है। इसके अलावा, इंदौर की जो भी खबरें हैं उससे संबंधित कई सवाल हैं। कई खबरें की जा सकती हैं। लेकिन अब जब फॉलो अप नहीं होता है तो साइड स्टोरी कौन करे। इसके भिन्न कारण हो सकते हैं लेकिन मैं पहले पन्ने पर छपने वाली खबरों की ही चर्चा करूंगा। उदाहरण के लिए इतना बड़ा (और शर्मनाक) हादसा हुआ लेकिन खबर दिल्ली के मेरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं छपी। पानी गंदा होने,एसिड जैसा होने, उसमें से बदबू आने जैसी शिकायत दो महीने से थी और कार्रवाई नहीं हुई। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस ने दी। किसी और ने दी हो, ऐसी कोई और खबर हो तो उसकी चर्चा नहीं हुई, दिखा नहीं। इसी तरह, इंडियन एक्सप्रेस ने कल लिखा था, ….. यह सिलसिला 28 दिसंबर को भागीरथपुरा के अर्बन प्राइमरी हेल्थ सेंटर में छह मरीज़ों के भर्ती होने के साथ शुरू हुआ। 48 घंटे के अंदर, यह सिलसिला बाढ़ में बदल गया, जब आउटपेशेंट क्लीनिक में एक ही दिन में मरीज़ों की संख्या 129 से बढ़कर 300 से ज़्यादा हो गई। एक हफ़्ते के अंदर, जल्दबाज़ी में बनाई गई हेल्थ वर्कर्स की एक टीम ने लगभग 13,000 घरों में 66,107 लोगों की स्क्रीनिंग की। ये नज़ारे इंदौर के एक घनी आबादी वाले इलाके में देखने को मिल रहे थे, जो अपनी सफ़ाई और मैनेजमेंट के लिए भारतीय शहरों की रैंकिंग में बार-बार टॉप पर रहा है। लेकिन खबर? वह सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस और दैनिक भास्कर में!

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


