संजय कुमार सिंह
आज मेरे नौ में से सात अखबारों में उमर खालिद और शरजिल इमाम को जमानत नहीं मिलने की खबर लीड है। यही सभी अखबारों की लीड का शीर्षक है। द हिन्दू और दि एशियन एज में यह सेकेंड लीड है और यहां भी शीर्षक लगभग यही है। इससे आप समझ सकते हैं कि यह कितना बड़ा मामला या फैसला है। संयोग से आज ही फ्रेंड ट्रम्प के बयान की खबर है और द हिन्दू में जैसा है वैसा दि एशियन एज में नहीं है। द हिन्दू का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, ट्रम्प ने जोर देकर कहा कि भारत ने उन्हें खुश करने के लिए रूसी तेल (खरीदना) कम किया। उप शीर्षक है, अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें खुश करना चाहते हैं। यही नहीं, सिनेटर ग्राहम ने यह दावा भी किया है कि अमेरिका में भारत के राजदूत ने उनसे कहा कि वे पेनल्टी टैरिफ में 25 प्रतिशत की कटौती की सिफारिश करें। दि एशियन एज में लीड का शीर्षक है, अगर भारत ने रूसी तेल पर मदद नहीं की तो ट्रम्प ने ज्यादा टैरिफ की चेतावनी दी। फ्लैग शीर्षक में तीन बुलेट प्वाइंट हैं। मोदी मुझे खुश करना चाहते थे…. वे बहुत अच्छे आदमी हैं, व्यापार चर्चा के बीच दबाव की चाल और तीसरा अमेरिकी सिनेटर की नए विधेयक की योजना। कहने की जरूरत नहीं है कि एक ही मामले को दोनों अखबारों ने अलग तरह से प्रस्तुत किया है। द हिन्दू ने जो शीर्षक में कहा है वह दि एशियन एज में हाईलाइट भी नहीं किया गया है। खबर में हो तो बहुत कम लोगों को दिखेगा। मुझे लगता है कि मीडिया इस तरह नरेन्द्र मोदी का बचाव कर रहा है। यह हेडलाइन मैनेजमेंट से भी होता है हालांकि आज की ये दोनों खबरें ऐसी हैं जो मोदी सरकार का हाल बताती हैं। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, शरजील, उमर को जमानत नहीं। नवोदय टाइम्स में एक स्थानीय खबर, आर्थिक तंगी के कारण मां, बहन और भाई की हत्या कर थाने पहुंचा लीड जैसी खबर है लेकिन दूसरी लीड यही है। हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड तो जमानत की खबर ही है तीन कॉलम के बॉटम का शीर्षक है, मुस्तफिजुर रहमान को टीम से अलग करने के विवाद में बांग्लादेश ने आईपीएल का प्रसारण प्रतिबंधित किया। यह भी मोदी सरकार की नीतियों से संबंधित मामला है और आज की महत्वपूर्ण खबरों में है।
जमानत नहीं दिए जाने का मामला अपने आप में गंभीर है लेकिन ट्रम्प का यह दावा कि भारत ने उन्हें खुश करने के लिए रूसी तेल (खरीदना) कम किया। नरेन्द्र मोदी के प्रशंसकों की आंख खोलने वाला है। इससे पूरा देश प्रभावित होगा और यह न सिर्फ नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति का मामला है उनकी ट्रम्प से दोस्ती का सच या भारत को होने वाले नफा-नुकसान का भी उदाहरण है। दूसरी ओर उमर खालिद को जमानत नहीं मिलना और अदालत द्वारा उसके कारण बताना आज अखबारों में उसका से प्रमुखता से छपना – बताता है कि फैसला सामान्य नहीं है और जो स्थितियां हैं उसमें यह सरकार की चाहत की पूर्ति लगती है। ऐसे में एक खबर इस सरकार के शासन में या नीतियों के कारण जनता के एक वर्ग को हो रही परेशानी (या सताए जाने) का उदाहरण है तो दूसरी केंद्र सरकार की विदेश नीति, सरकार पर दबाव प्रधानमंत्री की मित्रता या निजी संबंध आदि से देश पर पड़ने वाले प्रभाव का मामला है। अखबारों ने सरकार के पक्ष में स्पष्टीकरण को प्रमुखता दी है सरकार की कमजोरी या असामान्यताओं को छिपा लिया है। इसमें टाइम्स ऑफ इंडिया का यह शीर्षक तथा उसके साथ की खबर गौरतलब है। उमर खालिद और शरजिल इमाम को जमानत नहीं मिलने की खबर लीड है और इसके साथ छपा है, आतंकवाद में राष्ट्रीय अखंडता के खिलाफ सभी काम शामिल हैं।’
खबर इस प्रकार है, उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए द्वारा परिभाषित आतंकवादी कृत्य की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि यह सिर्फ हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राष्ट्रीय अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने वाले सभी काम शामिल हैं, जिसमें आंदोलन या विरोध प्रदर्शन से ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई में रुकावट डालना भी शामिल है। बेंच ने यूएपीए की धारा 15 का जिक्र करते हुए कहा, “संसद ने जानबूझकर ‘किसी भी अन्य तरीके से, चाहे वह किसी भी प्रकृति का हो’ अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया है, जिसे बेकार नहीं माना जा सकता।” आरोपियों ने तर्क दिया था कि उनके खिलाफ आरोप ज़्यादा से ज़्यादा सार्वजनिक अव्यवस्था की स्थिति को दिखाते हैं और यूएपीए लगाना आतंकवाद की बहुत विस्तारित समझ के आधार पर है। अब अगर ट्रम्प के दावे को देखिए तो प्रधानमंत्री ने उन्हें खुश करने के लिए रूस से तेल का आयात कम कर दिया है। यह सिर्फ दावा नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने रात 1.39 बजे एक्स पर लिखा है, रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी को पिछले लगभग तीन हफ़्तों में अपनी रिफाइनरी में रूसी तेल का कोई कार्गो नहीं मिला है और उसे जनवरी में भी किसी रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी की उम्मीद नहीं है। इसी में आगे लिखा है, …. इनकार के बावजूद खबर छपने से हमारी छवि को धक्का लगा है। आप समझ सकते हैं कि ट्रम्प का दावा यूं ही नहीं है और होता तो राहुल गांधी की चुनौती के बावजूद प्रधानमंत्री ट्रम्प के पुराने दावों पर चुप नहीं रहते। रिलायंस को ऐसी पोस्ट (देर रात) करने की जरूरत नहीं थी और रूसी तेल आयात करने की खबरों से छवि तो नहीं ही खराब होती है। प्रथमदृष्टया यह सामान्य नहीं है। क्या इसकी जांच तो छोड़िए इसपर कोई स्पष्टीकरण आएगा? मुझे उम्मीद नहीं है।

दूसरी ओर, उमर खालिद और शरजिल इमाम के मामले में अदालत ने कहा है, जो अमर उजाला में छपा है, जमानत पर विचार करते समय अदालत का कर्तव्य है कि वह स्वतंत्रता और सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन बनाए रखे। कहने की जरूरत नहीं है कि अदालत की टिप्पणी सरकार की कार्रवाई पर या उसे सही ठहराते हुए आई है। देशबन्धु के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि सभी आरोपी समान नहीं हैं। द हिन्दू ने हाईलाइट किया है, कथित मास्टरमाइंड, यानी शरजील इमाम और उमर खालिद के मामले में, प्रॉसिक्यूशन मटेरियल में सीधे, पुष्टि करने वाले और उस समय के सबूत शामिल हैं… जहाँ आरोपी व्यक्तियों के बीच सबूतों की मज़बूती में काफ़ी अंतर होता है, वहाँ लगातार हिरासत में रखने की ज़रूरत भी उसी हिसाब से बदलती रहती है। इस तरह साफ है कि आम आदमी या एक्टिविस्ट या मुस्लिम स्कॉलर या कथित मास्टरमाइंड के मामले में तो यह जानकारी अदालत तक सरकार की कार्रवाई से पहुंची और लगभग ऐसा ही सोनम वांगचुक के मामले में है। लेकिन ट्रम्प ने जो कहा और रिलायंस इंडस्ट्रीज की विज्ञप्ति से जो दिख रहा है वह खबर नहीं है। अदालत की जानकारी में कौन ले जाएगा या कैसे पहुंचेगा। अगर पहुंचेगा तो इस मामले में अदालत का क्या रुख होगा वह तो बाद की बात है। इंडियन एक्सप्रेस ने आज जमानत नहीं मिलने की खबर को पांच कॉलम में लीड बनाया है और इसके साथ सिंगल कॉलम की खबरें हैं। इन्हें आज क्या हो रहा है, शीर्षक के तहत छापा गया है और इनमें पहली खबर है, सूरजपुर की एक अदालत अखलाक लिंचिंग मामले की सुनवाई करेगी।
सभी आरोपों को वापस लेने की उत्तर प्रदेश सरकार की अपील को खारिज करते हुए 23 दिसंबर को अदालत ने ट्रायल को तेज कर दिया था। तीसरी खबर है, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण के खिलाफ अदालत जाएंगी। उनका कहना है कि इससे डर का माहौल बना है, उत्पीड़न हो रहा है और प्रशासनिक मनमानी चल रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि एसआईआर से संबंधित ऐसी कई शिकायतें हैं, खबरों से लगता है कि चुनाव आयोग और सरकार की मिलीभगत है, अदालत में ऐसी दलीलें दी गई हों या नहीं तमाम लोगों की मौत हो चुकी है पर सरकार या उसके काम को लेकर अदालत का रवैया वैसा कभी नहीं रहा जैसा उमर खालिद या शरजिल इमाम के मामले में है। तथ्य यह है कि कुलदीप सेंगर को 2019 में एक नाबालिग़ लड़की के साथ बलात्कार के मामले में उम्र क़ैद की सजा हुई थी और एक हाईकोर्ट ने सजा निलंबित करते हुए जमानत दे दी (छह साल के भीतर)। ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कारण जो माना हो यह तथ्य है कि सेंगर को इस बलात्कार केस से जुड़े एक और मामले में सज़ा मिली हुई है। साल 2020 में उन्हें सर्वाइवर के पिता की हत्या के आरोप में 10 साल की सज़ा हुई थी। फिर भी अखलाक और शरजिल के मामले में कहा गया है और दि एशियन एज में छपा है, जमानत की अपील एक साल बाद कर सकते हैं। बचपन से सुनता रहा हूं कि कानून सबके लिए बराबर है। यहां कुछ और दिख रहा है। कारण जो हो, समझना मुश्किल है कि अरनब गोस्वामी को एक हफ्ते में जमानत मिल गई थी पत्रकार सिद्दीक कप्पन को दो साल में मिली और यह सरकार चाहती थी (है) कि, गिरफ्तार होने के 30 दिन बाद भी अगर इस्तीफा नहीं दिया तो 31वें दिन पीएम सीएम को भी पद से हटा हुआ माना जाएगा। कहने के लिए इसमें पीएम शामिल हैं लेकिन पीएम सीएम का अंतर हम देख चुके हैं। अब तो अदालत ने अपराधियों की भी हायारकी (पदानुक्रम) तय कर दी है। बेशक यह स्पष्टीकरण है लेकिन अब आया है।
मैं मानता रहा हूं कि हीरा और खीरा की चोरी अपराध के लिहाज से बराबर या एक ही है। पता नहीं अब अपराध इस बात से तो तय नहीं होगा कि चोरी किसके यहां की या एफआईआर किसने लिखवाई। जाहिर है, खबरों में यह सब चिन्ता नहीं होती है, नहीं है। पर मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट का काम सरकार पर नजर रखना भी है ही। मुख्य रूप से इसमें जनहित का ख्याल करना ही होता है। क्योंकि जनता के पास सरकार के खिलाफ अपील की यही एक व्यववस्था है। जरूरी है कि राज्य किसी को अनावश्यक न सताए, न परेशान करे तो किसी को अनुचित ईनाम भी नहीं दे। पहले की सरकार कुछेक मामले में जजों को ईनाम देती थी। उसका विरोध भी होता था अब तो इस हाथ दे उस हाथ ले जैसी स्थिति है और पेंशन के बावजूद रिटायरमेंट के बाद लाभ वाला पद ही नहीं उसके साथ बीएमडब्ल्यू जैसी कार देने की कोशिश भी हो चुकी है। अदालत वही देख रही है जो उसे सरकार दिखा रही है और यह खबर नहीं है। यही चिन्ता की बात है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


